🌷छोड़ समर समरस हो जाना
ये कितना ही मुश्किल है 🌷
अपने भीतर खुद को पाना
ये कितना ही मुश्किल है 🌷
बातें कभी खुदा की करना
कभी राम पर आ जाना
धर्म का ठेका ले कर के
कत्ले आम मचा देना
पर बनना इन्सान यहां पर
ये कितना ही मुश्किल है 🌹
रिश्ते रोज बनाते लोग
रिश्तों का खून वहाते लोग
मतलब को तलवे चाट रहे
मजबूर को यहां दबाते लोग
सबको प्रेम से गले लगाना
ये कितना ही मुश्किल है 🌹
प्रेम की अब परिभाषा बदली
जज्बातों की भाषा बदली
आशा में निराशा बदली
वासना को उपासना बनाना
ये कितना ही मुश्किल है🌹
एकाग्रता टिक नहीं पाती
चंचलता सरपट दौड़ाती
कल्पना कहां कहां ले जाती
अचला से अचल हो जाना
ये कितना ही मुश्किल है 🌹
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
अचला एस गुलेरिया
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