बच्चे बडे हो रहे हैं


मैैं  कुछ नहीं कहती वह सब समझ जाता है
जिसे चलना सिखाया वह मुझे उड़ना सिखाता है

बच्चे बड़े हो रहे है आगे बढ़ रहे हैं
अब अपनी जंग खुद लड़ रहे हैं
जिसे बोलना सिखाया वह बड़ी-बड़ी बातें बनाता है

डर के गोदी में छुप जाने वाला
नटखट हरकतों से हंसाने वाला
मेरी परेशानी पल में भांप जाता है

अचानक डराता है मुझसे लिपटता है
वो छोटा सा बेटा खम्भे सा दिखता है
लंबा हो गया है लंबाई पर इतराता है

पापा के जूते खाने से ज्यादा पहनना पसंद है
डांट में दुलार, ढूंढता आनंद है
कभी स्कूटी कभी गाड़ी मोहल्ले में घूम आता है

भाई से झगड़ा कुश्ती टांग खींचने का रिश्ता है
प्रेम तो कभी कभार दिखता है
दोनों के चिल्लाने से हर घर बन जाता है

उसकी चाय के सब दीवाने हैं
उसे पता है बदले में क्या-क्या काम करवाने हैं
अपनी चाय का गुणगान दिन भर गाता है

आर्यों की संतान हो हर मुश्किल से लड़ना
हनुमान चालीसा सुबह शाम पढ़ना
मां को अच्छा लगता है जब तू
मंदिर में दिया जलाता है .......
उस रब को शीश झुकाता है
अचला एस गुलेरिया 

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