इल्मो अदब के
सारे खजाने गुजर गए...
क्या खूब थे वो लोग
पुराने गुजर गए,
बाकी है जमीं पे
फकत आदमी की भीड़,
इन्सां मरे हुए तो
ज़माने गुजर गए...
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अब ये सोचूँ तो भँवर ज़ेहन में पड़ जाते हैं
कैसे चेहरे हैं जो मिलते ही बिछड़ जाते हैं
क्यूँ तेरे दर्द को दें तोहमत-इस हाल की
ज़लज़लों में तो भरे शहर उजड़ जाते हैं
पतझड़ में इक दिल को बचाऊँ कैसे
ऐसी रुत में तो घने पेड़ भी झड़ जाते हैं
अब कोई क्या मेरे क़दमों के निशाँ ढूंढेगा
तेज़ आँधी में तो ख़ेमे भी उखड़ जाते हैं
सोच का आइना धुँदला हो तो फिर वक़्त के साथ
चाँद चेहरों के भी अक्स।बिगड़ जाते हैं
शिद्दत-ए-ग़म में भी ज़िंदा हूँ तो हैरत कैसी
कुछ दिए तेज हवाओं से भी लड़ जाते हैं
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