गूँजती हो तुम मन में,
जैसे कोई सात्विक मंत्र गूँजता हो त्रिभुवन में...
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जब नहीं सोचती हूँ तुम्हें
तब मैं कुछ नहीं सोचती
पैर के नखों से कुरेदती हूं
ज़मीं का पथरीलापन
तब तक जब तक
अंगूठे दर्द से बिलबिला ना उठे
जब मैं नहीं मिलती तुमसे
तब मैं किसी से नहीं मिलती
ज़रा से बादलों को खीचकर
ढक देती हूँ आईना
तुम धुंधले हो जाते हो
और जब मिलते हो तुम
मैं आसमानी ख़्वाबों में लिपटी
पूरी दुनिया को बदला हुआ देखती हूँ
कि जैसे पेड़ कुछ बड़े और हरे हो गए
पोखर का पानी साफ़ है
बिन मौसम ही खिले हैं खूब सारे कमल,
दहकते रंग के,
मेरी आँखों में खूब सारी
ज़िंदगी छलक रही है
मेरे हाथों में मेहदी का
रंग और महक
ऊपर आसमान में उड़ते
दो पतंग एक दूसरे से
गले मिलती हैं
जब मैं तुमसे मिलती हूँ
तब मैं मिलती हूं
अपने आप से...
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