कितने भी बंधन हों
दिल को फिर भी उड़ता परिंदा रखना
कितने भी english वाले shock मिलें
पर तू हिंदी वाले अपने शौक जिंदा रखना
मुझे पसंद है,
तुमसे बातें करना..
जबकि मेरे पास कहने को,,
कुछ भी नहीं होता..!!..
अब्र बरसे तो इनायत उस की
शाख़ तो सिर्फ़ दुआ करती है
ज़िंदगी फिर से फ़ज़ा में रौशन
मिशअल-ए-बर्ग-ए-हिना करती है
हम ने देखी है वो उजली साअ'त
रात जब शेर कहा करती है
शब की तन्हाई में अब तो अक्सर
गुफ़्तुगू तुझ से रहा करती है
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें