दीया 🪔 हो के न हो दिल जला के रखते हैं
हम आँधियों में भी तेवर बला के रखते हैं
मिला दिया है पसीना भले ही मिट्टी में
हम अपनी आँख का पानी बचा के रखते हैं
बस एक ख़ुद से ही अपनी नहीं बनी वरना
ज़माने भर से रिश्ता हमेशा निभा के रखते हैं
हमें पसंद नहीं जंग में भी चालाकी
जिसे निशाने पे रखते बता के रखते हैं
कहीं ख़ुलूस कहीं दोस्ती कहीं पे वफ़ा
बड़े क़रीने से घर को सजा के रखते हैं
KITNI ANBUN HO GYI HAI KHUD SE
KHUD KO MNATE MNATE
EK TUM HO JO THAKTE NAHIN
PYAR CHHUPATE CHHUPATR
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें