बेटा

मुझे कुछ न कुछ सुनाता है
अपनी बात जिद से मनवाता है
कभी गलत को सही
सही को गलत ठहराता है
मेरा दिमाग गर्म करके ही
गर्म गर्म खाना खाता है
गलत कोई भी हो
वो मुझ पर ही चिल्लाता है
वो जो मुझे माँ कह के बुलाता है
मुझे मेरे होने का अहसास दिलाता है
कमरे को प्लेटफार्म (रेल) बना देता है
किताबों जुराबों की मण्डी सजा सजा देता है
English गाने सुनते सुनते गर्दन बहुत हिलाता है
जाने फिरंगी शब्दो को कितना समझ पाता है
वो जो मुझे माँ कह के बुलाता है
पंजाबी गाने उसको बहुत लुभाते हैं
हाँ समझ जरा कम आते हैं
शब्दों के मतलब मुझसे निकलवाता है
वो जो मुझे माँ कह के बुलाता है
मुझसे ऊंचा है मेरा स्वाभिमान हो गया है
पिता के जूते डालने लगा है
बेटा जवान हो गया है
पापा की चीज़ें चुपके से उठाता है
पूरे घर में महाभारत करवाता है
वो जो मुझे माँ कह के बुलाता है
वो दूर जाता है तो घबरा जाती हूँ
जाने कैसे कैसे दिल को समझाती हूँ
फोन करती हूँ बार बार
वो तंग हो जाता है
खुश हूँ कहता है ,आंसू भी छुपाता है
खाना खा लेता हूँ भरोसा दिलाता है
वो जो मुझे माँ कह के बुलाता
वो जो मुझे माँ कह के बुलाता
अचला एस गुलेरिया
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Good night

जुबांनों के पीछे मत चलो, कोई तुम्हें ऐसी..! कहानी नहीं सुनायेगा जिसमें वो खुद गद्दार हो..!!shayaripub.in!!