jai siya ram

दरनि धामु धनु पुर परिवारू। 
सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू॥
देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। 
मोह मूल परमारथु नाहीं॥

अर्थ:-धरती, घर, धन, नगर, परिवार, स्वर्ग और नरक आदि जहाँ तक व्यवहार हैं, जो देखने, सुनने और मन के अंदर विचारने में आते हैं, इन सबका मूल मोह (अज्ञान) ही है। परमार्थतः ये नहीं हैं॥

श्री रामचरित मानस 
अयोध्याकांड (९१)
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                       हिन्दी शायरी दिल से 


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