जय सीयाराम

पति देवर सँग कुसल बहोरी। 
आइ करौं जेहिं पूजा तोरी॥
सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी। 
भइ तब बिमल बारि बर बानी॥

अर्थ:-जिससे मैं पति और देवर के साथ कुशलतापूर्वक लौट आकर तुम्हारी पूजा करूँ। सीताजी की प्रेम रस में सनी हुई विनती सुनकर तब गंगाजी के निर्मल जल में से श्रेष्ठ वाणी हुई-॥

श्री रामचरित मानस 
अयोध्याकांड (१०२)
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