एक खूबसूरत कविता

दूर ही रहते हैं कुछ ख्वाब हकीकत से, 
हर ख्वाब मुक्कमल हो ज़रूरी तो नहीं ।
 दोस्त बन कर देतें है  जो अपनेपन का भरोसा ,
 यक़ीन कितना भी कर लो वो हम नवाँ   नहीं ।

छुपा के रखते हैं खंजर, आंखों में प्यार लिए फिरते हैं !
 वो मतलबी बहुत है, जुबां में चाशनी सही ।
डरते बहुत हैं हम  भी  मगर परहेज नहीं करते !
मीठे के शौकिन है लहू में शक्कर ही  सही ।

आदत में शुमार है  हर दर्द को पी जाना !
अपनी महरूमियों की अब कोई इंतहा  नहीं!
ग़म गैरों का भी हो अपना सा लगता है !
इंसान हैं अखिर हम भी, कोई पत्थर तो नहीं ।
                        रूमा गगन गुलेरिया
               Shayaripub.in

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