कविता,

मन बंजारा मन बंजारा 
यह बेचारा दर्द का मारा

कड़ी धूप में निकल पड़ा है
हाथ है खाली पर मन तो भरा है
जीत की चाह में फिर से हारा

खुश दिखता है !पर खुश तो नहीं है
सब तो मिला है !और सबकी कमी है
भाग्य लिखे अब कौन दोबारा

एक कलम ही लिखे सबकी कहानी
कुछ सांसे लिख दे कुछ दाना पानी
लेखों के भंवर में फंसा दिल बेसहारा
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