अपरिभाषित कृष्णा

जेल में जन्मा लिखूं ,
या गोकुल का पलना लिखूं।
देवकी की गोदी लिखूं ,
या यशोदा का ललना लिखूं ।।
रहोगे तुम फिर भी अपरिभाषित चाहे जितना लिखूं....

 

गोपियों का प्रिय लिखूं,
या राधा का प्रियतम लिखूं।
रुक्मणि का श्री लिखूं 
या सत्यभामा का श्रीतम लिखूं।।
रहोगे तुम फिर भी अपरिभाषित चाहे जितना लिखूं....

 
देवकी का नंदन लिखूं,
 या यशोदा का लाल लिखूं।
वासुदेव का तनय लिखूं,
 या नंद का गोपाल लिखूं।।
रहोगे तुम फिर भी अपरिभाषित चाहे जितना लिखूं....

 


 



आपको अखण्ड ब्रह्मांड के नायक कृष्ण-कन्हैया के
जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं..
🙏

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इतनी ठोकरे देने के लिए                 शुक्रिया ए-ज़िन्दगी,  चलने का न सही         सम्भलने का हुनर तो आ गया ।। Shayaripub.in