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पगडंडियाँ अब सिमटने लगी हैं।
कहीं घास कहीं खरपात से ढकने लगी हैं

जो जीवन रेखा सी संगिनी थी सफर की
, आज खुद ही जीवन से मिटने लगी हैं।

कम करती थी पथरीले ऊंचे नीचे रास्ते को
आज खुद कम होकर घटने लगी हैं

कदमों को चूमने से जिसके चमक उठते थे पत्थर
अब बस इंतजार में थकने लगी हैं

अठखेलियां करती गुजरती थी जंगलों से
अब जंगल की गोदी में  सिसकने  लगी हैं।

सीढ़ियां लगा कर चढ़ जाती थी पर्वतों को
   अब सड़कों के आगे झुकने लगी हैं।
हिन्द शायरी दिल से

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