emotional shayari

जिंदगी के लिये जान ज़रूरी है,
इश्क के लिये अरमान ज़रूरी है,
हमारे पास हो चाहे कितना भी गम,
लेकिन तेरे चहरे पर मुस्कान ज़रूरी है
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जय सीयाराम # jai siya ram# jai shree ram

*चाँद* को *भगवान् राम* से यह शिकायत है की दीपवली का त्यौहार अमावस की रात में मनाया जाता है और क्योंकि अमावस की रात में चाँद निकलता ही नहीं है इसलिए वह कभी भी दीपावली मना नहीं सकता। यह एक मधुर कल्पना है की चाँद किस प्रकार खुद को *राम* के हर कार्य से जोड़ लेता है और फिर राम से शिकायत करता है और *राम* भी उस की बात से सहमत हो कर उसे वरदान दे बैठते हैं आइये देखते हैं ।
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जब चाँद का धीरज छूट गया ।
वह *रघुनन्दन* से रूठ गया ।
बोला रात को आलोकित हम ही ने करा है ।
स्वयं शिव ने हमें अपने सिर पे धरा है ।

तुमने भी तो उपयोग किया हमारा है ।
हमारी ही चांदनी में सिया को निहारा है ।
सीता के रूप को हम ही ने सँभारा है ।
चाँद के तुल्य उनका मुखड़ा निखारा है ।

जिस वक़्त याद में *सीता* की ,
तुम चुपके - चुपके रोते थे ।
उस वक़्त तुम्हारे संग में बस ,
हम ही जागते होते थे ।

संजीवनी लाऊंगा ,
लखन को बचाऊंगा ,.
हनुमान ने तुम्हे कर तो दिया आश्वश्त
मगर अपनी चांदनी बिखरा कर,
मार्ग मैंने ही किया था प्रशस्त ।
तुमने हनुमान को गले से लगाया ।
मगर हमारा कहीं नाम भी न आया ।

रावण की मृत्यु से मैं भी प्रसन्न था ।
तुम्हारी विजय से प्रफुल्लित मन था ।
मैंने भी आकाश से था पृथ्वी पर झाँका ।
गगन के सितारों को करीने से टांका ।

सभी ने तुम्हारा विजयोत्सव मनाया।
सारे नगर को दुल्हन सा सजाया ।
इस अवसर पर तुमने सभी को बुलाया ।
बताओ मुझे फिर क्यों तुमने भुलाया ।
क्यों तुमने अपना विजयोत्सव
अमावस्या की रात को मनाया ?

अगर तुम अपना उत्सव किसी और दिन मानते ।
आधे अधूरे ही सही हम भी शामिल हो जाते ।
मुझे सताते हैं , चिड़ाते हैं लोग ।
आज भी दिवाली अमावस में ही मनाते हैं लोग ।

तो *राम* ने कहा, क्यों व्यर्थ में घबराता है ?
जो कुछ खोता है वही तो पाता है ।
जा तुझे अब लोग न सतायेंगे ।
आज से सब तेरा मान ही बढाएंगे ।
जो मुझे *राम* कहते थे वही ,
आज से *रामचंद्र* कह कर बुलायेंगे...!!!


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कृपासिंधु बोले मुसुकाई। 
सोइ करु जेहिं तव नाव न जाई॥
बेगि आनु जलपाय पखारू। 
होत बिलंबु उतारहि पारू॥

अर्थ:-कृपा के समुद्र श्री रामचन्द्रजी केवट से मुस्कुराकर बोले भाई! तू वही कर जिससे तेरी नाव न जाए। जल्दी पानी ला और पैर धो ले। देर हो रही है, पार उतार दे॥

श्री रामचरित मानस 
अयोध्याकांड (१००.१)

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्येतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥

और जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति योग (केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर वासुदेव भगवान को ही अपना स्वामी मानता हुआ, स्वार्थ और अभिमान को त्याग कर श्रद्धा और भाव सहित परम प्रेम से निरन्तर चिन्तन करने को 'अव्यभिचारी भक्तियोग' कहते हैं) द्वारा मुझको निरन्तर भजता है, वह भी इन तीनों गुणों को भलीभाँति लाँघकर सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त होने के लिए योग्य बन जाता है

............भगवद गीता.....
   .....प्रकृति के तीन गुण
           .  (अध्याय १४) 
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attitude shayari

हो तुम भी पूरे चाँद की तरह.......
नूर भी उतना.......
 , ग़ुरूर भी उतना ...
..और  मुझसे दूर भी उतना ।।
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jai siya ram # जय सियाराम


   *क्या आप ऐसी किसी महिला के बारे में जानते हैं 


जिसने.........


*1.* हावड़ा में गंगा पर पुल बनाकर कलकत्ता शहर बसाया

*2.* अंग्रेजों को ना तो नदी पर टैक्स वसूलने दिया और ना ही दुर्गा पूजा की यात्रा को रोकने दिया

*3.* कलकत्ता में दक्षिणेश्वर मंदिर बनवाया

*4.* कलकत्ता में गंगा नदी पर बाबू घाट, नीमतला घाट बनवाया

*5.* श्रीनगर में शंकराचार्य मंदिर का पुनरोद्धार करवाया

*6.* मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि की दीवार बनवाई

*7.* ढाका में मुस्लिम नवाब से 2000 हिंदुओं की स्वतंत्रता खरीदी

*8.* रामेश्वरम से श्रीलंका के मंदिरों के लिए नौका सेवा शुरू किया

*9.* कलकत्ता का क्रिकेट स्टेडियम इनके द्वारा दान दी गई भूमि पर बना है।

*10.* सुवर्ण रेखा नदी से पुरी तक सड़क बनाया

*11.* प्रेसिडेंसी कॉलेज और नेशनल लाइब्रेरी के लिए धन दिया

क्या इस महान हस्ती को *नेहरू, मौलवी, पादरी,वमियों* ने आपके सिलेबस में शामिल किया ?

मुझे पूरा विश्वास है कि 99% भारतीय इस महिला को नहीं जानते होंगे 😢

इन महान हस्ती का नाम है *रानी रासमणि* । ये कलकत्ता के जमींदार की विधवा थी। 1793 से 1863 तक के जीवन काल में रानी ने इतना यश कमाया है कि इनकी बड़ी बड़ी प्रतिमाएं दिल्ली और शेष भारत में लगनी चाहिए थी।

*रानी रासमणि* कैवर्त जाति की थी जो आजकल अनुसूचित जाति में शामिल है। 

 भारत के कांगियों , वमियों ,रोम के चाटुकार  इतिहासकारों ने *रानी रासमणि* को अपेक्षित सम्मान क्यों नहीं दिया यह तो समझ आता है किंतु देश के दलित नेताओं ने *रानी रासमणि* को नायिका क्यों नहीं बनाया यह समझ के परे है 



   
  सुखी जीवन जीने का सिर्फ एक ही रास्ता है वह है अभाव की तरफ दृष्टि ना डालना। आज हमारी स्थिति यह है जो हमे प्राप्त है उसका आनंद तो लेते नहीं, वरन जो प्राप्त नहीं है उसका चिन्तन करके जीवन को शोकमय कर लेते हैं।
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Goodmorning



🌹जिंदगी को बिल्कुल कॉफी  की तरह      
                जियो.....✍

🌹जब तक ख़तम न हो जाए तब तक मजे   
          लेकर पियो....✍
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emotional shayari

कुछ गहरा सा लिखना था, 
             प्रेम से ज्यादा क्या लिखूँ..?

कुछ ठहरा सा लिखना था, 
                दर्द से ज्यादा क्या लिखूँ..?
 
कुछ समन्दर सा लिखना था, 
             आँसू से ज्यादा क्या लिखूँ..?

कुछ अपना सा लिखना था, 
            आँखो से ज्यादा क्या लिखूँ..?

कुछ खुशबू सा लिखना था, 
           किरदार से ज्यादा क्या लिखूँ..?

अब जीवन सा प्यारा लिखना था
           तुमसे ज्यादा क्या लिखूँ..?
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jai siya ram # सुप्रभात

🦋मागी नाव न केवटु आना। 🦋
🌹कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥🌹
🦋चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। 🦋
🌹मानुष करनि मूरि कछु अहई॥🌹

अर्थ:-श्री राम ने केवट से नाव माँगी, पर वह लाता नहीं। वह कहने लगा- मैंने तुम्हारा मर्म (भेद) जान लिया। तुम्हारे चरण कमलों की धूल के लिए सब लोग कहते हैं कि वह मनुष्य बना देने वाली कोई जड़ी है,॥

श्री रामचरित मानस 
अयोध्याकांड (९९.२)

अर्जुन उवाच कैर्लिङ्‍गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते॥

अर्जुन बोले- इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष किन-किन लक्षणों से युक्त होता है और किस प्रकार के आचरणों वाला होता है तथा हे प्रभो! मनुष्य किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है?

भगवद गीता
प्रकृति के तीन गुण
(अध्याय १४) 
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emotional shayari # हिन्दी शायरी

 हम पुकारेंगे तुम्हें ,
साँसों के अंतिम छोर तक ।
तपते दिवस बैरी निशा 
व्याकुल विरह की भोर तक ।।
आना तुम्हें होगा प्रिय ,
जगत के बंधन तोड़कर।
है प्रणय संबंध अपना ,
चिर समय की डोर तक ।
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emotional shayari

*तुम जायदाद हो मेरी इस जिंदग़ी की...*

*जो तुम्हे भूल गया तो फ़क़ीर हो जाऊँगा...


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emotional shayari

हम ये कैसे बताये आपको कैसे  हमारे हाल हैं।।
बस इतना समझ लीजिये 
आप खुश है तो  हम भी खुशहाल हैं।।
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जय सियाराम. # ..jai siya ram

                 लड्डू गोपालजी कृपा 

कमल किशोर सोने और हीरे के जवाहरात बनाने और बेचने का काम करता था। उसकी दुकान से बने हुए गहने दूर-दूर तक मशहूर थे। लोग दूसरे शहर से भी कमल किशोर की दुकान से गहने लेने और बनवाने आते थे। चाहे हाथों के कंगन हो, चाहे गले का हार हो, चाहे कानों के कुंडल हो उसमें हीरे और सोने की बहुत सुंदर मीनाकारी होती कि सब देखने वाले देखते ही रह जाते। 

इतना बड़ा कारोबार होने के बावजूद भी कमल किशोर बहुत ही शांत और सरल स्वभाव वाला व्यक्ति था। उसको इस माया का इतना रंग नहीं चढ़ा हुआ था।

एक दिन उसका कोई मित्र उसकी दुकान पर आया जो कि अपने पत्नी सहित वृंदावन धाम से होकर वापस आ रहा था तो उस मित्र ने सोचा कि चलो थोड़ा सा प्रसाद अपने मित्र कमल किशोर को भी देता चलूं। 

उसकी दुकान पर जब वह पहुंचा तब कमल किशोर का एक कारीगर एक सोने और हीरे जड़ित बहुत सुंदर हार बना कर कमल किशोर को देने के लिए आया था।

कमल किशोर उस हार को देख ही रहा था कि उसका मित्र उसकी दुकान पर पहुंचा। कमल किशोर का मित्र अपने साथ वृंदावन से एक बहुत सुंदर लड्डू गोपाल जिसका सवरूप अत्यंत मनमोहक था साथ लेकर आया था। 

जब उसका मित्र दुकान पर बैठा तो उसकी गोद में लड्डू गोपाल जी विराजमान थे। कमल किशोर लड्डू गोपाल जी के मनमोहक रुप सोंदर्य को देखकर अत्यंत आंनदित हुआ। उसने अपने हाथ में पकड़ा हुआ हार उस लड्डू गोपाल के गले में पहना दिया और अपने मित्र को कहने लगा कि देखो तो सही इस हार की शोभा लड्डू गोपाल के गले में पढ़ने से कितनी बढ़ गई है।  

उसका मित्र और कमल किशोर आपस में बातें करने लगे बातों बातों में ही उसका मित्र लड्डू गोपाल को हार सहित लेकर चला गया। दोनों को ही पता ना चला कि हार लड्डू गोपाल के गले में ही पड़ा रह गया है।
 कमल किशोर का मित्र अपनी पत्नी सहित एक टैक्सी में सवार होकर अपने घर को रवाना हो गया। जब वह टैक्सी से उतरे तो भूलवश लड्डू गोपाल जी उसी टैक्सी में रह गए।

टैक्सी वाला एक गरीब आदमी था जिसका नाम बाबू था जो कि दूसरे शहर से यहां अपने परिवार का पालन पोषण करने के लिए टैक्सी चलाता था और वह टैक्सी लेकर काफी आगे निकल चुका था। आज उसको अपने घर वापस जाना था जो कि दूसरे शहर में था। जब टैक्सी लेकर बाबू अपने घर पहुंचा तो उसने जब अपनी टैक्सी की पिछली सीट पर देखा तो उसका ध्यान लड्डू गोपाल जी पर पड़ा जो के बड़े शाही तरीके से पिछली सीट पर गले में हार धारण करके सुंदर सी पोशाक पहनकर हाथ में बांसुरी पकड़े हुए पसर कर बैठे हुए हैं।

बाबू यह देखकर एकदम से घबरा गया कि यह लड्डू गोपाल जी किसके हैं, लेकिन अब वह दूसरे शहर से अपने शहर जा चुका था जो कि काफी दूर था और वह सवारी का घर भी नहीं जानता था तो वह दुविधा में पड़ गया कि वह क्या करें लेकिन फिर उसने बड़ी श्रद्धा से हाथ धो कर लड्डू गोपाल जी को उठाया और अपने घर के अंदर ले गया जैसे ही उसने घर के अंदर प्रवेश किया उसकी पत्नी ने उसके हाथ में पकड़े लड्डू गोपाल जी को जब देखा को इतनी सुंदर स्वरूप वाले लड्डू गोपाल जी को देखकर उसकी पत्नी ने झट से लड्डू गोपाल जी को अपने पति के हाथों से ले लिया।

उसकी पत्नी जिसकी 8 साल शादी को हो चुके थे उसके अभी तक कोई संतान नहीं थी। लेकिन गोपाल जी को हाथ में लेते ही उसका वात्सालय भाव जाग उठा उसकी ममतामई और करुणामई आंखें झर झर बहने लगी। ममता वश और वात्सल्य भाव के कारण ठाकुर जी को गोद में उठाते ही उसको ऐसे लगा उसने किसी अपने ही बच्चे को गोद में उठाया है उसके स्तनों से अपने आप दूध निकलने लगा।

अपनी ऐसी दशा देखकर बाबू की पत्नी मालती बहुत हैरान हुए उसने कसकर गोपाल जी को अपने सीने से लगा लिया और आंखों में आंसू बहाती बोलने लगी अरे बाबू तुम नहीं जानते कि आज तुम मेरे लिए कितना अमूल्य रत्न लेकर आए हो।

बाबू कुछ समझ नहीं पा रहा था कि मेरी पत्नी को अचानक से क्या हो गया है लेकिन उसकी पत्नी तो जैसे बांवरी सी हो गई थी वह गोपाल जी को जल्दी-जल्दी अंदर ले गई और उससे बातें करने लगी।

अरे लाला.... इतनी दूर से आए हो तुम्हें भूख लगी होगी और उसने जल्दी जल्दी मधु और घी से बनी चूरी बनाकर और दूध गर्म करके ठाकुर जी को भोग लगाया।

उधर कमल किशोर ने जब अपनी दुकान पर हार को ना देखा तो उसको याद आया कि हार तो ठाकुर जी के गले में ही रह गया है तो उसने अपने मित्र को संदेशा भेजा तो मित्र ने आगे से जवाब दिया। अरे मित्र! वह  माखन चोर और चित् चोर; हार सहित खुद ही चोरी हो गया है। मैं तो खुद इतना परेशान हूं।

कमल किशोर अब थोड़ा सा परेशान हो गया कि ईतना कीमती हार ना जाने कहां चला गया। मुझे तो लाखों का नुकसान हो गया लेकिन फिर भी अपने सरल स्वभाव के कारण उसने अपने मित्र को कुछ नहीं कहा और उसने अपने मन में सोचा कि कोई बात नहीं मेरा हार तो ठाकुर जी के ही अंग लगा है अगर मेरी भावना सच्ची है तो ठाकुर जी उसको पहने रखें।

उधर बाबू और उसकी पत्नी मालती दिन-रात ठाकुर जी की सेवा करते अब तो मालती और बाबू को लड्डू गोपाल जी अपने बेटे जैसे ही लगने लगे। 

लड्डू गोपाल जी की कृपा से अब मालती के घर एक बहुत ही सुंदर बेटी ने जन्म लिया। इन सब बातों का श्रेय वह लड्डू गोपाल जी को देते कि यह हमारा बेटा है और अब हमारी बेटी हुई है अब हमारा परिवार पूरा हो गया।

मालती लड्डू गोपाल जी को इतना स्नेह करती थी कि रात को उठ उठ कर देखने जाती थी कि लड्डू गोपाल जी को कोई कष्ट तो नहीं है।

ऐसे ही एक दिन कमल किशोर व्यापार के सिलसिले में दूसरे शहर आना पड़ा, जहां पर बाबू रहता था।

लेकिन दुर्भाग्यवश जब वो उस शहर में पहुंचा तो अचानक से इतनी बारिश शुरू हो गई कि कमल किशोर को जहां पहुंचना था वहां पहुंच ना सका।

और तब वहां बाबू अपनी टैक्सी लेकर आ गया और उसने परेशान कमल किशोर को पूछा बाबूजी आप यहां क्यों खड़े हो बारिश तो रुकने वाली नहीं और सारे शहर में पानी भरा हुआ है। आप अपनी मंजिल तक ना पहुंच पाओगे और ना ही कहीं और रुक पाओगे मेरा घर पास ही है अगर आप चाहो तो मेरे घर आ सकते हो।

कमल किशोर जिसके पास सोने और हीरे के काफी गहने थे वह   अनजान टैक्सी वाले के साथ जाने के लिए थोड़ा सा घबरा रहा था। लेकिन उसके पास और कोई चारा भी नहीं था और वह बाबू के घर उसके साथ टैक्सी में बैठ कर चला गया।

घर पहुंचते ही बाबू ने मालती को आवाज दी कि आज हमारे घर मेहमान आए हैं उनके लिए खाना बनाओ।

कमल किशोर ने देखा कि बाबू का घर एक बहुत छोटा सा लेकिन व्यवस्थित ढंग से सजा हुआ है। घर में अजीब तरह के इत्र की खुशबू आ रही है जो कि उसके हृदय को आनंदित कर रही थी। 

जब मालती ने उनको भोजन परोसा तो कमल किशोर को उसमें अमृत जैसा स्वाद आया।

 उसका ध्यान बार-बार उस दिशा की तरफ जा रहा था,जहां पर ठाकुर जी विराजमान थे वहां से उसको एक अजीब तरह का प्रकाश नजर आ रहा था तो हार कर कमल किशोर ने बाबू को पूछा कि अगर आपको कोई एतराज ना हो तो क्या आप बता सकते हो कि उस दिशा में क्या रखा है? मेरा ध्यान उसकी तरफ आकर्षित हो रहा है।

तो बाबू और मालती ने एक दूसरे की तरफ मुस्कुराते हुए कहा कि वहां पर तो हमारे घर के सबसे अहम सदस्य लड्डू गोपाल जी विराजमान है। तो कमल किशोर ने कहा क्या मैं उनके दर्शन कर सकता हूं। तो मालती उनको उस कोने में ले गई जहां पर लड्डू गोपाल जी विराजमान थे।

 कमल किशोर लड्डू गोपाल जी को और उनके गले में पड़े हार को देखकर एकदम से हैरान हो गया यह तो वही लड्डू गोपाल है और यह वही हार है,जो मैंने अपने मित्र के लड्डू गोपाल जी को डाला था।

कमल किशोर ने बड़ी विनम्रता से पूछा कि यह गोपाल जी तुम कहां से लाए? बाबू जिसके मन में कोई  छल कपट नहीं था उसने कमल किशोर को  सारी बात बता दी कि कैसे उसको  सोभाग्य से गोपाल जी मिले और उनके हमारे घर आने से हमारा दुर्भाग्य सौभाग्य में बदल गया।

तो कमल किशोर ने कहा क्या तुम जानते हो कि जो हार ठाकुर जी के गले में पड़ा है उसकी कीमत क्या है? तो बाबू और मालती ने बड़ी विनम्रता से हाथ जोड़कर कहा कि जो चीज हमारे लड्डू गोपाल जी के अंग लग गई हम उसका मूल्य नहीं जानना चाहते और हमारे लाला के सामने किसी चीज किसी हार का कोई मोल नहीं है तो कमल किशोर एकदम से चुप हो गया और उसने मन में सोचा कि चलो अच्छा है मेरा हार ठाकुर जी ने अपने अंग लगाया हुआ है।

अगले दिन जब वह चलने को तैयार हुआ और बाबू उनको टैक्सी में लेकर उनके मंजिल तक पहुंचाने गया।

जब कमल किशोर टैक्सी से उतरा और जाने लगा तभी बाबू ने उनको आवाज लगाई कि ज़रा रुको यह आपका कोई सामान हमारी टैक्सी में रह गया है। लेकिन कमल किशोर ने कहा मैंने तो वहां कुछ नहीं रखा, लेकिन बाबू ने कहा कि यह बैग तो आपका ही है जब कमल किशोर ने उसको खोलकर देखा तो उसमें बहुत सारे पैसे थे।

कमल किशोर एकदम से हक्का-बक्का रह गया कि यह तो इतने पैसे हैं जितनी कि उस हार की कीमत है। उसकी आंखों में आंसू आ गए कि जब तक मैंने निश्छल भाव से ठाकुर जी को वह हार धारण करवाया हुआ था तब तक उन्होंने पहने रखा। मैंने उनको पैसों का सुनाया तो उन्होंने मेरा अभिमान तोड़ने के लिए पैसे मुझे दे दिए हैं।

वह ठाकुर जी से क्षमा मांगने लगा लेकिन अब हो भी क्या सकता था?

 *कथासार* 

*इसलिए हमारे अंदर ऐसे भाव होने चाहिए कि: उसमें अहंकार न होकर विनम्रता होनी चाहिए और ठाकुर जी जैसा चाहते हैं वैसा ही होता है हम तो निमित्त मात्र हैं। कौन ठाकुर जी को वृंदावन से लाया और किसके घर आकर वह विराजमान हुए यह सब ठाकुर जी की लीला है जिसके घर रहना है जिसके घर सेवा लेनी है यह सभी जानते हैं हम लोग तो निमित्त मात्र हैं बस हमारे भाव शुद्ध होने चाहिए। ठाकुर जी तो बड़े बड़े पकवान नहीं बल्कि भाव से खिलाई छोटी से छोटी चीज को भी ग्रहण कर लेते हैं। आपसे अनुरोध करता हूँ कि जितना हो सके इस कथा को आगे बढ़ाने की कृपा करें!!*

      *_🙏🏻जय श्री कृष्णा🙏🏻_*
RADHE RADHE JAI SHREE KRISHNA JI
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Good evening

कौन समझेगा यहां की वीरानी देख के... इस जगह भी ठहरे थे  कभी काफ़िले मोहब्बत के...... Shayaripub.in पूछा जो उसने कैसे रहोगे ताउम्र तुम मेरे सा...