औरत

अबला जीवन । हाय तुम्हारी यही कहानी
आंचल में है दूध और आंखों में पानी
मैथिली शरण गुप्त
स्त्री
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दर्द में डूबा किरदार हूँ
पर यह किसी से क्यूं कहूँ
[ ] मिट जाती हूँ मकान को घर बनाने में
फिर अहसान किसी, का सहूं क्यूं
[ ] मेरे भी पंख हैं . आकाश मेरा भी है
पिंजरे में कैद फिर रहूँ क्यूं
[ ] बेशकीमती तोहफा हूँ कुदरत का
खिलौनों की तरह तरह सजूं कयूं
[ ] चरित्र है चित्र नहीं साहब
निजता है, प्रमाणित करूँ कयूं
[ ] मुझसे है अस्तित्व का अस्तित्व
माँ हूँ राम,कृष्ण की फिर किसी डरूं कयूं। 
[]जो खिचड़ी बनाता है ससुराल मिल कर
पकाते उसे मैं जलूं कयूं 
प्रश्न फिर वही है 
पकाते पकाते जलूं कयूं                
                             अचला एस गुलेरिया

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