emotional shayari

1🌼सारा वुजूद 🌼खुशबुओं से तरबतर 🌼

🌼🌼🌼🌼🌼हो गया,🌼🌼

🌼🌼वो मेरे ज़ेहन से🌼 गुज़री और मैं 🌼

🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼इतर हो गया।🌼
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 🪴🪴जिसकी अनुपस्थिति में भी तुम उससे मानसिक संवाद करते हो,
उसके साथ तुम्हारा प्रेम होना तय है।🪴🪴

🌼🌼🌼जब कोई खास याद आता है 
           फिर कुछ भी खास नही लगता ।।जब कोई खास याद आता है 🌼🌼🌼
          🌼 फिर कुछ भी खास नही लगता ।।🌼                                                   shayaripub.com 

हरे कृष्ण #

.देने के लिये 'दान'

लेने के लिये 'ज्ञान'

और

त्यागने के लिये 'अभिमान' सर्वश्रेष्ठ हैं!
    
  Jay  Shree Krishna 
    Have a great day ahead.


                     ।। "टालो मत।"।।
       
    

टालो मत। जो करना है उसे आज कर लो। कल पर भी मत टालो; क्योंकि कल मृत्यु है, जीवन आज है। जीवन सदा आज है।

 मृत्यु सदा कल है। अभी तक तुम मरे नहीं। आज तो जीवन है। अभी उतद्वो जलीवन। है।

क्षण भर के बाद की कौन कहे! क्षण भर बाद तुम हो या न हो, इस जीवन का उपयोग इस जीवन का उपयोग तुम करते हो क्षुद्र में, व्यर्थ में; और सोचते हो : कल, जब सब काम चुक जायेगा, जीवन की दूकान बंद करने का समय आ जायेगा, तब फिर याद कर लेंगे परमात्मा को। तुम धोखा दे रहे हो, अपने को धोखा दे रहे हो।

मुक्त होना है तो अभी होना है। ध्यान करना है तो अभी करना है। प्रार्थना से भरना है तो अभी भरना है।

एक—एक क्षण में तुम धीरे—धीरे प्रार्थना के मनके पिरोते चले जाओ तो मृत्यु के समय तक तुम्हारे जीवन की माला तैयार हो जायेगी।
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jai siyaram जय सियाराम # राम शबरी संबाद

माता शबरी बोली- यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो राम तुम यहाँ कहाँ से आते?"

राम गंभीर हुए। कहा, "भ्रम में न पड़ो अम्मा! राम क्या रावण का वध करने आया है? छी... अरे रावण का वध तो लक्ष्मण अपने पैर से वाण चला  कर भी कर सकता है। राम हजारों कोस चल कर इस गहन वन में आया है तो केवल तुमसे मिलने आया है अम्मा, ताकि हजारों वर्षों बाद जब कोई पाखण्डी भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिल कर गढ़ा था !जब कोई कपटी भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो तो काल उसका गला पकड़ कर कहे कि नहीं ! यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक दरिद्र वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है। राम वन में बस इसलिए आया है ताकि जब युगों का इतिहास लिखा जाय तो उसमें अंकित हो कि सत्ता जब पैदल चल कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे तभी वह रामराज्य है। राम वन में इसलिए आया है ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतिक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं !!!

सबरी एकटक राम को निहारती रहीं। राम ने फिर कहा- " राम की वन यात्रा रावण युद्ध के लिए नहीं है माता! राम की यात्रा प्रारंभ हुई है भविष्य के लिए आदर्श की स्थापना के लिए। राम आया है ताकि भारत को बता सके कि अन्याय का अंत करना ही धर्म है l राम आया है ताकि युगों को सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाय, और खर-दूषणो का घमंड तोड़ा जाय। और राम आया है ताकि युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी सबरी के आशीर्वाद से जीते जाते हैं।"

सबरी की आँखों में जल भर आया था। उसने बात बदलकर कहा- कन्द खाओगे राम?

राम मुस्कुराए, "बिना खाये जाऊंगा भी नहीं अम्मा..."

सबरी अपनी कुटिया से झपोली में कन्द ले कर आई और राम के समक्ष रख दिया। राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा- मीठे हैं न प्रभु?

यहाँ आ कर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ अम्मा! बस इतना समझ रहा हूँ कि यही अमृत है...

सबरी मुस्कुराईं, बोलीं- "सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो राम! गुरुदेव ने ठीक कहा था..."

   . .   ...........shayaripub.com 





।। जय सियाराम* ।।
बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा। 
पुनि नृप बचन राज रस भंगा॥
पुनि रघुपति बहु बिधि समुझाए। 
लै पादुका अवधपुर आए॥
भावार्थ:-फिर श्री रामजी के राज्याभिषेक का प्रसंग फिर राजा दशरथजी के वचन से राजरस (राज्याभिषेक के आनंद) में भंग पड़ना,
फिर श्री रघुनाथजी ने उनको बहुत प्रकार से समझाया, जिससे वे खड़ाऊँ लेकर अयोध्यापुरी लौट आए।
...बापू*
।। मानस - अयोध्याकांड ।।
अयोध्या जी ,रामकथा.

जीवन की सफलता केवल सबको खुश करने मे नहीं, जीवन की सफलता इसमें है कि   आपके कारण  कोई  दुखी ना हो  ।।                            shayaripub.com 

emotional shayari

⚘*तुझसे⚘ नाराज ⚘होकर⚘,*
           ⚘*तुझसे ⚘ही ⚘बात ⚘करने ⚘का⚘ मन।⚘*
⚘*ये ⚘दिल ⚘का ⚘सिलसिला ⚘भी,⚘*
              *⚘कभी⚘ न⚘ समझ ⚘पाये⚘ हम⚘।।*
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attitude shayari

            🍁🍁 लगा  हूंँ हाथ  तेरे, तो अब संँभाल मुझे 
             मैं एक बार ही मिलता हूंँ बार-बार नहीं🍁🍁
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      🍁🍁🍁आज हर तरफ़ परेशानियाँ  मेहमान है 🍁🍁
  🍁🍁  कोई अपने लिए तो 🍁🍁
                 🍁🍁कोई अपनो के लिए परेशान हैं🍁🍁 
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            🍁🍁किंचित भी बदले नहीं रहिमन तेरे पाठ

             अब भी धागे टूटते अब भी पड़ती गाँठ🍁🍁
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emotional shayari ,good night, good evening

⚘⚘कौन कहता है मुहुब्बत की जुबाँ होती है⚘⚘
⚘⚘ये हकीक़त तो निगाहों से बयाँ होती है।⚘⚘
⚘⚘वो न आये तो सताती है खलिश सी दिल को⚘⚘
⚘⚘वो जो आये तो खलिश और जवाँ होती है।⚘⚘
⚘⚘⚘रूह को शाद करे, दिल को जो सुकून दे⚘⚘⚘
    ⚘⚘⚘हर रिश्ते में ये बात कहाँ होती है।⚘⚘⚘                                   shayaripub.in
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जय सियाराम # विनय पत्रिका

              ⚘⚘सुमिरु सनेह सहितसीतापति। ⚘⚘
               ⚘⚘रामचरन तजि नहिंन आनि गति॥ 1⚘⚘
                  ⚘⚘जय, तप, तीरथ, जोग समाधी।⚘⚘
              ⚘⚘ कलिमति बिकल, न कछ निरुपाधी ॥ 2⚘⚘
                    ⚘⚘ करतहुं सुकृत न पाप सिराहीं।⚘⚘  
                   ⚘⚘रकतबीज जिमि बाढ़त जाहीं ॥3⚘⚘
                      ⚘⚘हरति एकअध-असुर-जालिका⚘⚘
                    ⚘⚘तुलसिदास प्रभु-कृपा-कालिका।4⚘⚘
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रे मन! प्रेमके साथ श्रीजानकी- वल्लभ रामजीका स्मरण
कर क्योंकि  रामचन्द्रजीके चरणोंको छोडकर तुझेऔर कहीं गति नहीं है।
जप, तप, तीर्थ, योगाभ्यास, समाधि आदि साधन हैं; परन्तु
कलियुग में जीवोंकी बुद्धि स्थिर नहीं है इससे इन साधनोंमेंसे कोई भी
विघ्नरहित नहीं रहा ॥ २ ॥ आज पुण्य करते भी (बुद्धि ठिकाने न होनेसे)
पापों का नाश नहीं होता। रक्तबीज राक्षसकी भांति ये पाप तो बढ़ते ही जा रहे हैं। भाव यह है कि बुद्धिकी विकलतासे पापमें पुण्य-बुद्धि और पुण्यमें पाप-बुद्धि हो रही है, इससे पुण्य करते भी पाप ही बढ़ रहे हैं ॥ ३ हे
हे तुलसीदास ! इस पापरूपी राक्षसोंके समूह का नाश तो केवल प्रभुकी कृपारूपी कालिकाजी ही करेंगी। (भगवत्कृपाकी शरण लेनेके सिवा अब अन्य किसीसाधनसे काम नहीं निकलेगा) ॥ ४ ॥
 
हिन्दी शायरी दिल से 

हरे कृष्णा #hare krishna



                 

   🌹 *दो सौ बावन वैष्णवों की वार्ता* 🌹

⛰️  *श्रीगोवर्धननाथायनमः*⛰️

      *[ वैष्णव - 3️⃣ प्रसङ्ग - 6️⃣ ]*

❗  *"श्रीगुसांईजी के सेवक चतुर्भुज दास , ( कुम्भनदास के बेटा ) की वार्ता "* ❗
 

🦜    एक दिन श्रीगुसांईजी ने चतुर्भुजदास से आज्ञा की "अप्सरा कुण्ड पर - जाकर रामदास भीतरिया को लिवाकर लाओ और तुम फूल ले आना।” चतुर्भुजदासजी ने पहले तो रामदास भीतरिया को समाचार दिया और फिर आप स्वयं फूल बीनने लगे।

🦚     जब वहाँ से चलने लगे तो उन्हें श्रीगोवर्धन पर्वत की कन्दरा से, श्रीनाथजी को स्वामिनीजी के साथ बाहर आते हुए देखा। श्रीस्वामिनी के मन में आया कि हमारी इस लीला के कोई दर्शन नहीं करे तो अधिक अच्छा हो। उसी समय चतुर्भुजदास ने दर्शन करके निम्न पद गाया

“गोवर्धन गिरि सघन कन्दरा रैन निवास कियो पियय्यारी” फिर दूसरा पद गया

"रजनी राज कियो निकुंज नगर की रानी ।। ”

🦚    यह पद सुनकर श्रीस्वामिनीजी बहुत प्रसन्न हुई। फिर चतुर्भुजदासजी फूल लेकर श्रीगुसांईजी के पास गए। ये चतुर्भुजदास श्रीनाथजी तथा श्रीस्वामिनीजी के मन के भाव को जानने वाले, ऐसे कृपा पात्र भगवदीय थे।

      .......
                 ✍🏻 *मालिनी*


*गंगा में विसर्जित अस्थियां आखिर जाती कहां हैं.?बहुत ही ज्ञानवर्धक लेख*

पतितपावनी गंगा को देव नदी कहा जाता है क्योंकि शास्त्रों के अनुसार गंगा स्वर्ग से धरती पर आई है। मान्यता है कि गंगा श्री हरि विष्णु के चरणों से निकली है और भगवान शिव की जटाओं में आकर बसी है।
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श्री हरि और भगवान शिव से घनिष्ठ संबंध होने पर गंगा को पतित पाविनी कहा जाता है। मान्यता है कि गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सभी पापों का नाश हो जाता है।
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एक दिन देवी गंगा श्री हरि से मिलने बैकुण्ठ धाम गई और उन्हें जाकर बोली," प्रभु ! मेरे जल में स्नान करने से सभी के पाप नष्ट हो जाते हैं लेकिन मैं इतने पापों का बोझ कैसे उठाऊंगी? मेरे में जो पाप समाएंगे उन्हें कैसे समाप्त करूंगी?"
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इस पर श्री हरि बोले,"गंगा! जब साधु, संत, वैष्णव आ कर आप में स्नान करेंगे तो आप के सभी पाप घुल जाएंगे।"
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गंगा नदी इतनी पवित्र है की प्रत्येक हिंदू की अंतिम
इच्छा होती है उसकी अस्थियों का विसर्जन गंगा में ही
किया जाए लेकिन यह अस्थियां जाती कहां हैं?
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इसका उत्तर तो वैज्ञानिक भी नहीं दे पाए क्योंकि असंख्य मात्रा में अस्थियों का विसर्जन करने के बाद भी गंगा जल पवित्र एवं पावन है। गंगा सागर तक खोज करने के बाद भी इस प्रश्न का पार नहीं पाया जा सका।
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सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा की शांति के लिए मृत व्यक्ति की अस्थि को गंगा में विसर्जन करना उत्तम माना गया है। यह अस्थियांं सीधे श्री हरि के चरणों में बैकुण्ठ जाती हैं।
जिस व्यक्ति का अंत समय गंगा के समीप आता है उसे
मरणोपरांत मुक्ति मिलती है। इन बातों से गंगा के प्रति हिन्दूओं की आस्था तो स्वभाविक है।
.
वैज्ञानिक दृष्टि से गंगा जल में पारा अर्थात (मर्करी)
विद्यमान होता है जिससे हड्डियों में कैल्सियम और
फोस्फोरस पानी में घुल जाता है। जो जलजन्तुओं के लिए एक पौष्टिक आहार है। वाइग्निक दृष्टि से हड्डियों में गंधक (सल्फर) विद्यमान होता है जो पारे के साथ मिलकर पारद का निर्माण होता है। इसके साथ-साथ यह दोनों मिलकर मरकरी सल्फाइड साल्ट का निर्माण करते हैं। हड्डियों में बचा शेष कैल्शियम, पानी को स्वच्छ रखने का काम करता है। धार्मिक दृष्टि से पारद शिव का प्रतीक है और गंधक शक्ति का प्रतीक है। सभी जीव अंततःशिव और शक्ति में ही विलीन हो जाते हैं।.....गंगा माता की जय  ॥॥॥
                      ॐ नमो नारायण 
 
     


*🥀हे प्रभु !⚘*

*सबकी खुशी में हो, मेरी खुशी*
*ऐसा मेरा नजरिया कर दो ।*

*सबके चेहरे पर*
*एक छोटी सी खुशी ला सकूँ,*
*तुम मुझे ऐसा जरिया कर दो ।* 

🌹*सुप्रभात*🌹
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हिन्दी शायरी दिल से 

हरे कृष्ण # भगवान के भक्त

                🪴श्रीसूरदासजीकी प्रार्थना🪴
               तुम तजि और कौन पै जाऊँ।
   काके द्वार जाइ सिर नाऊँ, पर हथ कहाँ बिकाऊ।
     ऐसो को दाता है समरथ, जाके दिये अघाऊँ।
   अंतकाल तुमरो सुमिरन गति, अनत कहूँ नहिं पाऊँ।।
  रंक अयाची कियो सुदामा, दियो अभय पद ठाऊँ।
     कामधेनु चिंतामनि दीनो, कलप- बृच्छ तर छाऊँ॥
  भवसमुद्र अति देखि भयानक, मनमें अधिक डराऊँ।
कीजै कृपा सुमिरि अपनो पन, सूरदास बलि जाऊँ।॥
               
                       ⚘⚘ करमैती बाई⚘⚘
पण्डित परशुरामजी जयपुरके अन्तर्गत खण्डेलाके
सेखावत सरदारके राजपुरोहित थे। इनकी पुत्री करमैतीका
मन बचपनसे ही भगवान् में लग गया था। वह बालिका
निरन्तर श्रीकृष्णका ध्यान तथा नाम-जप किया करती थी।
कभी वह 'हा नाथ! हा नाथ! कहकर क्रन्दन करती,
कभी कीर्तन करते हुए नाचने लगती और कभी हँसते-
हँसते लोटपोट हो जाती। नन्ही -सी बच्चीके भगवत्प्रेमको
देखकर घरके लोग प्रसन्न हुआ करते थे।                         ⚘ shayaripub.com ⚘
करमैतीकी इच्छा विवाह करनेकी नहीं थी; परंतु लज्जावश
वह कुछ कह नहीं सकी। पिताने उसका विवाह कर दिया;
लेकिन जब ससुरालवाले उसे लेने आये, तब वह व्याकुल
हो उठी। जो शरीर श्यामसुन्दरका हो चुका, उसे दूसरेके
अधिकारमें कैसे दिया जा सकता है! उसने अपने प्रभुसे
से प्रार्थना प्रारम्भ की और जो कातर होकर उन श्रीवृन्दावनचन्द्रको
पुकारता है, उसे अवश्य मार्ग मिल जाता है। करमैतीको
, एक उपाय सूझ गया। आधी रातको जब कि सब लोग
सो रहे थे, वह अकेली बालिका चुपचाप घरसे निकल पड़ी और
वृन्दावनके लिये चल पड़ी।

सबेरे घरमें करमैतीके न मिलनेपर हलचल मच गयी।
परशुराम पण्डित जानते थे कि उनकी पुत्री कितनी पवित्र है.
किंतु लोकलाजके भयसे अपने यजमान राजाके पास गये।
राजाने अपने पुरोहितकी सहायताके लिये चारों ओर घुड़्सवार
भेजे कि वे करमैतीको ढूँढ़ लावें । करमैती दौड़ी चली जा
क रही थी। रात्रिभरमें वह कितनी दूर निकल आयी, सो उसे
पता ही नहीं। सबेरा होनेपर भी वह भागी ही जा रही थी कि
उसने घोड़ोंकी टापका शब्द सुना। उसे डर लगा कि घुड़सवार
उसे ही पकड़ने आ रहे हैं। आस-पास न कोई वृक्ष था और
न कोई दूसरा छिपनेका स्थान; किंत् एक ऊँंट मरा पड़ा था
और रात्रिमें श्रगालोंने उसके पेटका भाग खा लिया था।
करमैतीकी दृष्टि ऊँटके पेटमें बनी कन्दरापर गयी । इस समय
वह सांसारिक विषयोंकी भयंकर दुर्गन्थसे भाग रही थी। मरे
ऊँटके शरीरसे निकलनेवाली गन्थ उसे विषयोंकी दर्गन्ध के
सामने तुच्छ जान पड़ी। भागकर वह ऊँटके पेटमें छिप गयी।
घुड़सवार पास आये तो दुर्गन्धके मारे उन्होंने उस ऊँटकी ओर
देखातक नहीं। वहाँसे शीघ्रतापूर्वक वे आगे बढ़ गये और
अन्तमें हताश होकर लौट गये। माता-पिता आदि भी पुत्रीके
सम्बन्धमें निराश हो गये।

जिसकी कृपासे विष अमृत हो जाता है, अग्नि शीतल
हो जाती है, उसीकी कृपावर्षा करमैतीपर हो रही थी। ऊँटके
, शरीरमें वह भूखी-प्यासी तीन दिन छिपी रही। उस सड़े
ऊँटके शरीरकी गन्ध उसके लिये सुगन्धमें बदल गयी थी।
चौथे दिन वह वहाँसे निकली। मार्ग उसका जाना हुआ नहीं
था; किंतु जो सबका एकमात्र मार्गदर्शक है, उसकी ओर
जानेवालेको मार्ग नहीं ढूँढ़ना पड़ता। मार्ग ही उसे ढूँढ़ लेता
; है। करमैतीको साथ मिल गया और वह वृन्दावन पहुँच गयी।
वहाँ पहुँँचकर मानो वह आनन्दके समद्रमें मग्न हो गयी।

जब परशुराम पण्डितको अपनी पुत्रीका कहीं पता न
लगा, तब वे वृन्दावन आये; लेकिन भला वृन्दावनमें करमैतीको
जानता-पहचानता कौन था कि पता लगता । एक दिन वृक्षपर
चढ़कर परशुराम पण्डित इधर उधर देख रहे थे । ब्रह्मकुण्ड पर
उन्हें एक वैरागिनी दिखायी पड़ी। वहाँ जानेपर उन्होंने देखा
कि साधुवेशमें करमैती ध्यानमग्न बैठी है । पुत्रीकी दीन- हीन
बाहरी दशा देखकर पिताको शोक तो हुआ; परंतु उसके
भगवत्प्रेमको देखकर वे अपनेको धन्य मानने लगे। कई घण्टे
बैठे रहनेपर भी जब करमैतीका ध्यान भंग नहीं हुआ, तब
पिताने उसे हिला-डुलाकर जगाया। वे उससे घर चलकर
भजन करनेका आग्रह करने लगे। करमैतीने कहा-'पिताजी!
यहाँ आकर भी कोई कभी लौटा है। मैं तो ब्रजराजकुमारके
प्रेमें डूबकर मर चुकी हूँ। अब मुर्दा यहाँसे उठे कैसे ?"

अन्तत: परशुरामजी उसके भक्तिभावको देखकर वापस
घर लौट गये। राजाने जब यह समाचार सुना, तब वह भी
करमैतीके दर्शन करने वृन्दावन आया। राजाके बहुत आग्रह
करनेपर करमैतीबाईने एक छोटी कृुटिया बनवाना स्वीकार
कर लिया। राजाने करमैतीबाईके लिये ब्रह्मकुण्डके पास एक
मठिया बना दी । करमैतीबाईकी भक्तिने राजाको भी भक्त बना
दिया।
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                             कृष्ण भक्त  करमैती

जय सियाराम

निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। 
रूप बिंदु जल होहिं सुखारी॥
तिन्ह कें हृदय सदन सुखदायक। 
बसहु बंधु सिय सह रघुनायक॥ 

अर्थ:-तथा जो भारी-भारी नदियों, समुद्रों और झीलों का निरादर करते हैं और आपके सौंदर्य (रूपी मेघ) की एक बूँद जल से सुखी हो जाते हैं (अर्थात आपके दिव्य सच्चिदानन्दमय स्वरूप के किसी एक अंग की जरा सी भी झाँकी के सामने स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों जगत के अर्थात पृथ्वी, स्वर्ग और ब्रह्मलोक तक के सौंदर्य का तिरस्कार करते हैं), हे रघुनाथजी! उन लोगों के हृदय रूपी सुखदायी भवनों में आप भाई लक्ष्मणजी और सीताजी सहित निवास कीजिए॥ 

श्री रामचरित मानस 
अयोध्याकांड (१२७) 

*🙏🌹जय जय श्री सीताराम🌹🙏*

एक बार एक राजा ने गाव में रामकथा करवाई और कहा की सभी  ब्राह्मणो को रामकथा के लिए आमत्रित किया जय , राजा ने सबको रामकथा पढने के लिए  यथा स्थान बिठा दिया। 

एक ब्राह्मण अंगुटा छाप था उसको पठना लिखना कुछ आता नही था , वो ब्राह्मण सबसे पीछे बैठ गया , और सोचा की जब पास वाला पन्ना पलटेगा तब मैं भी पलट दूंगा।

काफी देर देखा की पास बैठा व्यक्ति पन्ना नही पलट रहा है, उतने में राजा श्रदा पूरवक सबको नमन करते चक्कर लगाते लगाते उस सज्जन के समीप आने लगे, तो उस ने एक ही रट लगा दी की "अब राजा पूछेगा तो क्या कहूँगा "
"अब राजा पूछेगा तो क्या कहूँगा "

उस सज्जन की ये बात सुनकर पास में बैठा व्यक्ति भी रट लगाने लग गया  ,
की "तेरी गति सो मेरी गति 
तेरी गति सो मेरी गति ,"

उतने में तीसरा व्यक्ति बोला ,
" ये पोल कब तक चलेगी !
ये पोल कब तक चलेगी !

चौथा बोला
जबतक चलता है चलने दे ,
जबतक चलता है चलने दे , 
वे चारो अपने सिर निचे किये इस तरह की रट लगाये बैठे है 
की,
1 "अब राजा पूछेगा तो क्या कहूँगा.. 
2 "तेरी गति सो मेरी गति.. 
3 "ये पोल कब तक चलेगी.. 
4 "जबतक चलता है चलने दे..

जब राजा ने उन  चारो के स्वर सुने , राजा ने पूछा की ये सब क्या गा रहे है, ऐसे प्रसंग तो रामायण में हम ने पहले कभी नही सुना ,

उतने में , एक महात्मा उठे और बोले महाराज ये सब रामायण का ही प्रसंग बता रहे है , 
पहला व्यक्ति है ये बहुत विद्वान है ये , बात सुमन ने ( अयोध्याकाण्ड ) में कही , राम लक्ष्मण सीता जी को वन में छोड़ , घर लोटते है तब ये बात सुमन कहता है की 
"अब राजा  पूछेंगे तो क्या कहूँगा ? 
अब राजा  पूछेंगे तो क्या कहूँगा ?

फिर पूछा की ये दूसरा कहता है की तेरी गति सो मेरी गति , महात्मा बोले महाराज ये तो इनसे भी ज्यादा  विद्वान है ,( किष्किन्धाकाण्ड ) में जब हनुमान जी, राम लक्ष्मण जी को अपने दोनों कंधे पर बिठा कर सुग्रीव के पास गए तब ये बात राम जी ने कही थी की , सुग्रीव ! तेरी गति सो मेरी गति , तेरी पत्नीको बाली ने रख लिया और मेरी पत्नी का रावण ने हरण कर लिया..

राजा ने आदरसे फिर पूछा , की महात्मा जी ! ये तीसरा बोल रहा है की ये पोल कब तक चलेगी , ये बात कभी किसी संत ने नही कही ? , बोले महाराज ये तो और भी ज्ञानी है ,( लंकाकाण्ड ) में अंगद जी ने रावण की भरी सभा में अपना पैर जमाया  , तब ये प्रसंग मेधनाथ ने अपने पिता रावन से किया की, पिता श्री ! ये पोल कब तक चलेगी , पहले एक वानर आया और वो हमारी लंका जला कर चला गया , और अब ये कहता है की मेरे पैर को कोई यहाँ से हटा दे तो भगवान श्री राम बिना युद्ध  किये वापिस   लौट जायेंगे।

फिर राजा बोले की ये चौथा  बोल रहा है ? वो बोले  महाराज ये इतना बड़ा विद्वान है की कोई इनकी बराबरी कर ही नही सकता ,ये मंदोदरी की बात कर रहे है , मंदोदरी ने कई बार रावण से कहा की , स्वामी ! आप जिद्द छोड़, सीता जी को आदर सहित राम जी को सोप दीजिये अन्यथा अनर्थ हो जायगा ,
तब ये बात रावण ने मंदोदरी से कही
की ( जबतक चलता है चलने दे )

मेरे तो दोनों हाथ में लड्डू है ,अगर में राम के हाथो मारा गया तो मेरी मुक्ति हो जाएगी , इस अदम शरीर से भजन -वजन तो कुछ होता नही , और में युद्ध  जीत गया तो त्रिलोकी में भी मेरी जय जयकार हो जाएगी

राजा इन सब बातोसे चकित रह गए बोले की आज हमे ऐसा अध्बुत प्रसंग सूनने को मिला की आज तक हमने नही सुना , राजा इतने प्रसन्न  हुए की उस महात्मा से बोले की आप कहे वो दान देने को राजी हु ,
उस महात्मा ने उन अनपढ़ अंगुटा  छाप ब्रहमिन भक्तो को अनेको दान दक्षणा दिल वा दी

इन सब बातो का एक ही सार है  की कोई अज्ञानी , कोई नास्तिक , कोई कैसा भी क्यों न हो , रामायण , भागवत ,जैसे महान ग्रंथो को श्रदा पूर्वक छूने मात्र से ही सब संकटो से मुक्त हो जाते है , 
और भगवान का सच्चा प्रेमी हो जाये उन की तो बात ही क्या है , मत पूछिये की वे कितने धनि हो जाते ।।
🙏जय श्री सीताराम🙏

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good morning # हरे कृष्ण

भरोसा अगर कृष्ण पर हो
तो वे सिर्फ कृपा ही नहीं करते,
बल्कि सारथी भी बन जाते है !!

.                         ⚘⚘आनन्दी बाई⚘⚘

         गोकुल के पास ही किसी गाँव में एक महिला थी जिसका नाम था आनंदीबाई। देखने में तो वह इतनी कुरूप थी कि देखकर लोग डर जायें। गोकुल में उसका विवाह हो गया, विवाह से पूर्व उसके पति ने उसे नहीं देखा था। विवाह के पश्चात् उसकी कुरूपता को देखकर उसका पति उसे पत्नी के रूप में न रख सका एवं उसे छोड़कर उसने दूसरा विवाह रचा लिया। आनंदी ने अपनी कुरूपता के कारण हुए अपमान को पचा लिया एवं निश्चय किया कि 'अब तो मैं गोकुल को ही अपनी ससुराल बनाऊँगी।
         वह गोकुल में एक छोटे से कमरे में रहने लगी। घर में ही मंदिर बनाकर आनंदीबाई श्रीकृष्ण की भक्ति में मस्त रहने लगी। आनंदीबाई सुबह-शाम घर में विराजमान श्रीकृष्ण की मूर्ति के साथ बातें करती, उनसे रूठ जाती, फिर उन्हें मनाती, और दिन में साधु सन्तों की सेवा एवं सत्संग-श्रवण करती। इस प्रकार कृष्ण भक्ति एवं साधुसन्तों की सेवा में उसके दिन बीतने लगे।
         एक दिन की बात है गोकुल में गोपेश्वरनाथ नामक जगह पर श्रीकृष्ण-लीला का आयोजन निश्चित किया गया था। उसके लिए अलग-अलग पात्रों का चयन होने लगा, पात्रों के चयन के समय आनंदीबाई भी वहाँ विद्यमान थी। अंत में कुब्जा के पात्र की बात चली। उस वक्त आनंदी का पति अपनी दूसरी पत्नी एवं बच्चों के साथ वहीं उपस्थित था, अत: आनंदीबाई की खिल्ली उड़ाते हुए उसने आयोजकों के आगे प्रस्ताव रखा "सामने यह जो महिला खड़ी है वह कुब्जा की भूमिका अच्छी तरह से अदा कर सकती है, अतः उसे ही कहो न, यह पात्र तो इसी पर जँचेगा, यह तो साक्षात कुञ्जा ही है।"
         आयोजकों ने आनंदीबाई की ओर देखा, उसका कुरूप चेहरा उन्हें भी कुब्जा की भूमिका के लिए पसंद आ गया। उन्होंने आनंदीबाई को कुब्जा का पात्र अदा करने के लिए प्रार्थना की। श्रीकृष्णलीला में खुद को भाग लेने का मौका मिलेगा, इस सूचना मात्र से आनंदीबाई भाव विभोर हो उठी। उसने खूब प्रेम से भूमिका अदा करने की स्वीकृति दे दी। श्रीकृष्ण का पात्र एक आठ वर्षीय बालक के जिम्मे आया था।
         आनंदीबाई तो घर आकर श्रीकृष्ण की मूर्ति के आगे विह्वलता से निहारने लगी, एवं मन-ही-मन विचारने लगी कि 'मेरा कन्हैया आयेगा, मेरे पैर पर पैर रखेगा, मेरी ठोड़ी पकड़कर मुझे ऊपर देखने को कहेगा। वह तो बस, नाटक में दृश्यों की कल्पना में ही खोने लगी। 
         आखिरकार श्रीकृष्णलीला रंगमंच पर अभिनीत करने का समय आ गया। लीला देखने के लिए बहुत से लोग एकत्रित हुए। श्रीकृष्ण के मथुरागमन का प्रसंग चल रहा था, नगर के राजमार्ग से श्रीकृष्ण गुजर रहे हैं, रास्ते में उन्हे कुब्जा मिली। आठ वर्षीय बालक जो श्रीकृष्ण का पात्र अदा कर रहा था उसने कुब्जा बनी हुई आनंदी के पैर पर पैर रखा और उसकी ठोड़ी पकड़कर उसे ऊँचा किया। किंतु यह कैसा चमत्कार..। कुरूप कुब्जा एकदम सामान्य नारी के स्वरूप में आ गयी। वहाँ उपस्थित सभी दर्शकों ने इस प्रसंग को अपनी आँखों से देखा। आनंदीबाई की कुरूपता का पता सभी को था, अब उसकी कुरूपता बिल्कुल गायब हो चुकी थी। यह देखकर सभी दाँतो तले ऊँगली दबाने लगे। आनंदीबाई तो भाव विभोर होकर अपने कृष्ण में ही खोयी हुई थी।
         उसकी कुरूपता नष्ट हो गयी यह जानकर कई लोग कुतुहल वश उसे देखने के लिए आये। फिर तो आनंदीबाई अपने घर में बनाये गये मंदिर में विराजमान श्रीकृष्ण में ही खोयी रहतीं। यदि कोई कुछ भी पूछता तो एक ही जवाब मिलता "मेरे कन्हैया की लीला कन्हैया ही जाने"।
         आनंदीबाई ने अपने पति को धन्यवाद देने में भी कोई कसर बाकी न रखी। यदि उसकी कुरूपता के कारण उसके पति ने उसे छोड़ न दिया होता तो श्रीकृष्ण में उसकी इतनी भक्ति कैसे जागती ? श्रीकृष्णलीला में कुब्जा के पात्र के चयन के लिए उसका नाम भी तो उसके पति ने ही दिया था, इसका भी वह बड़ा आभार मानती थी।
         प्रतिकूल परिस्थितियों एवं संयोगों में शिकायत करने की जगह प्रत्येक परिस्थिति को भगवान की ही देन मानकर धन्यवाद देने से प्रतिकूल परिस्थिति भी उन्नतिकारक हो जाती है।

हिन्दी शायरी दिल से 

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Good evening

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