जिंदगी को लेकर हमारी शिकायतें जितनी कम होती जायेंगी। हमारा जीवन उतना ही बेहतर बनता जायेगा। shayaripub.in
Shayari means "poetry" in english. But even after being synonymous to each other , both represent a very different depth to expression of the writer. Shayari is magical as it can mean different for every set of eyes that taste it through the sense of sight. It has no topic or a targeted demographic. It is made for everyone and everything. Though the great works in Shayari cannot be replicated but yes a new content based on our modern society can be created. The timelessness of shayari awaits.
अमृता
प्रेम में डूबी हर स्त्री अमृता होती है या फिर होना चाहती है पर सबके हिस्से कोई इमरोज नहीं होता, शायद इसलिए भी कि इमरोज होना आसान नहीं।खासकर हमारी सामाजिक संरचना में एक पुरुष के लिए यह अच्छा खासा मुश्किल काम है कि किसी ऐसी स्त्री से से प्रेम करना और उस प्रेम में बंधकर जिन्दगी गुजार देना, जिसके लिए यह पता हो कि वह आपकी नहीं है।
एक बार अमृता ने इमरोज़ से कहा था -
" तुम मुझे जिंदगी की शाम में क्यों मिले,
मिलना था तो दोपहर में मिलते "
जब इमरोज और अमृता ने साथ साथ रहने का निर्णय लिया तो उन्होंने इमरोज से कहा था,
‘ एक बार तुम पूरी दुनिया घूम आओ
फिर भी तुम मुझे अगर चुनोगे
तो मुझे कोई उज्र नहीं
मैं तुम्हें यहीं इंतजार करती मिलूंगी ’
इसके जवाब में इमरोज़ ने उस कमरे के सात चक्कर लगाए और कहा, ‘हो गया अब तो...’ इमरोज के लिए अमृता का आसपास ही पूरी दुनिया थी।
उनके प्यार की समझदारी देखिये कि सालो तक एक ही घर में साथ रहने के बाद भी दोनों अलग अलग कमरों में रहते थे , इमरोज़ बताते है कि अमृता को रात में लिखने कि आदत थी क्योंकि उस वक़्त ना कोई आवाज़ होती थी ना फोन बजता और ना ही कोई आता जाता।
हालांकि लिखते समय उनको चाय चाहिए होती थी।अब लिखने में मशरूफ अमृता खुद तो उठकर चाय बना नहीं सकती थी तो इमरोज़ ने रात में 1 बजे उठना शुरू कर दिया।इमरोज़ चाय बनाते और चुपचाप उनके बगल में रख आते वो लिख़ने में इतनी खोई हुई रहती कि इमरोज़ की तरफ देखती भी नहीं थी ।और ये सिलसिला इसी तरह बदस्तूर चालीस- पचास सालों तक चलता रहा।
एक किस्सा बताते हुए इमरोज़ कहते है
एक बार जब वो अमृता को अपने स्कूटर पर बैठा कर कही जा रहे थे, तो पूरे रास्ते अमृता कि उंगलियां उनके पीठ पर कुछ लिख रही थी। इमरोज़ जानते थे वो शब्द साहिर का नाम था। वो कहते इस बात से उनको कोई नराज़गी नहीं थी ,वो बोले - मैं भी अमृता का, मेरी पीठ भी अमृता की।
इमरोज़ होना आसान नहीं, और मैने प्रेम में इमरोज़ होना चुना।
इसीलिए अमृता जी की अंतिम नज्म ‘मैं तुम्हें फिर मिलूंगी’ इमरोज़ के नाम थी, केवल इमरोज़ के लिए।
" मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं
शायद तेरे कल्पनाओं की प्रेरणा बन
तेरे केनवास पर उतरुँगी
या तेरे केनवास पर
एक रहस्यमयी लकीर बन
ख़ामोश तुझे देखती रहूँगी
मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं। "
अमृता-इमरोज़ •
अमृता -इमरोज की पत्नी
और साहिर लुधियानवी अमृता का प्रेमी.....!!!
Good morning
मन में हर भाव रहे जिंदा
चुरा सागर से दिल में ......लहर रखना
जाने कब तन्हाई तन्हा कर दे
जाने कब तन्हाई तन्हा कर दे
तू फोन में सारा ......शहर रखना
अचला
Good morning
वह सब कुछ स्वयं ही करता है
इस बात की यार खबर रखना
तुझे सही लगे या गलत लगे
बस दिल में यार सब्र रखना
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Good morning
“एक अरसे बाद हुई खुल के गुफ़्तगू उससे,
एक अरसे बाद वो चुभा हुआ काँटा निकला हो जैसे।”
दिलों को दिलो से मिलाते चलो!
,,,,,,,,,,,,,,,मुहब्बत के नगमें सुनाते चलो!!
अगर हो मुहब्बत किसी से कभी,
,,,,,,,,,,,,,,,,,,उसी से सदा तुम निभाते चलो !
दिलों में रहेगी मुहब्बत जवा,
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,वफा के सदा गीत गाते चलो!
न हो नफरतों का अधेरा कभी,
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,चरागे मुहब्बत जलाते चलो!
मिलेगी सफलता कभी ना कभी ,
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,हमेशा कदम को बढ़ाते चलो!
कभी भी दिलो में ना नफरत पले,
,,,,,,,,,,,,,,वतन के लिए जा लुटाते चलो!
हयात-ए सफर है घड़ी दो घड़ी,वफा रश्मे उल्फत निभाते चलो।
,,,Apka ये भरोसा सलामत रहे, यही बात सबको बताते चलो!
मैं प्रेम बन जाऊँ और तुम रूह की तलब
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,बस यूँ ही जी लेगे हम मोहब्बत बनकर ।
Romantic shayari
देढे मेढ़े ऊँचें नीचे रास्तों पर ....
किसी के साथ चलना चाहूँ तो तुम्हें ढूँढती हूँ,🌹
समेट कर रखती हूँ हसीन पल
कुछ जिंदगी के....
किसी के साथ बिताना चाहूँ
तो तुम्हें ढूँढती हूँ,🌹🌹
उड़ा ले जाती है नींदे जब उलझनें जीवन की
किसी के कांधे पर सर रख सोना चाहूँ
तो तुम्हें ढूंढती हूँ...🌹
छा जाते हैं बादल उदासियों के
जब पलकों पर ...
नमी में भी आँखों की
हँसना चाहूँ . ..
तो तुम्हें ढूंढती हूँ🌹🌹
कंपकंपाते होठों पर कभी,कलियाँ मुस्कान की,
सजाना चाहूँ तो तुम्हे ढूँढती हूँ....🌹
सुप्रभात
तकदीर और फकीर का कोई पता नहीं होता.!
कब क्या ले जाएं, और कब क्या दे जाएं..!!
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳
*💐💐प्रोफेसर की सीख💐💐*
प्रोफ़ेसर साहब बड़े दिनों बाद आज शाम को घर लौटते वक़्त अपने दोस्त नवीन से मिलने उसकी दुकान पर गए।
इतने दिनों बाद मिल रहे दोस्तों का उत्साह देखने लायक था…दोनों ने एक दुसरे को गले लगाया और बैठ कर गप्पें मारने लगे।
चाय-वाय पीने के कुछ देर बाद प्रोफ़ेसर बोले, “यार एक बात बता, पहले मैं जब भी आता था तो तेरी दुकान में ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी और हम बड़ी मुश्किल से बात कर पाते थे। लेकिन आज बस इक्का-दुक्का ग्राहक ही दिख रहे हैं और तेरा स्टाफ भी पहले से कम हो गया है…”
दोस्त मजाकिया लहजे में बोला, “अरे कुछ नहीं, हम इस मार्केट के पुराने खिलाड़ी हैं…आज धंधा ढीला है…कल फिर जोर पकड़ लेगा!”
इस पर प्रोफ़ेसर साहब कुछ गंभीर होते हुए बोले, “देख भाई, चीजों को इतना हलके में मत ले…मैं देख रहा हूँ कि इसी रोड पर कपड़े की तीन-चार और दुकाने खुल गयी हैं, कम्पटीशन बहुत बढ़ गया है…और ऊपर से…”
प्रोफ़ेसर साहब अपनी बात पूरी करते उससे पहले ही, दोस्त उनकी बात काटते हुए बोला, “अरे ये दुकाने आती-जाती रहती हैं, इनसे कुछ फरक नहीं पड़ता।”
प्रोफ़ेसर साहब कॉलेज टाइम से ही अपने दोस्त को जानते थे और वो समझ गए कि ऐसे समझाने पर वो उनकी बात नहीं समझेगा।
इसके बाद उन्होंने अगले रविवार, बंदी के दिन; दोस्त को चाय पे बुलाया।
दोस्त, तय समय पर उनके घर पहुँच गया।
कुछ गपशप के बाद प्रोफ़ेसर साहब उसे अपने घर में बनी एक प्राइवेट लैब में ले गए और बोले, “देख यार! आज मैं तुझे एक बड़ा ही इंटरस्टिंग एक्सपेरिमेंट दिखता हूँ..”
प्रोफ़ेसर साहब ने एक जार में गरम पानी लिया और उसमे एक मेंढक डाल दिया। पानी से सम्पर्क में आते ही मेंढक खतरा भांप गया और कूद कर बाहर भाग गया।
इसके बाद प्रोफ़ेसर साहब ने जार से गरम पानी फेंक कर उसमे ठंडा पानी भर दिया, और एक बार फिर मेंढक को उसमे डाल दिया। इस बार मेंढक आराम से उसमे तैरने लगा।
तभी प्रोफ़ेसर साहब ने एक अजीब सा काम किया, उन्होंने जार उठा कर एक गैस बर्नर पर रख दिया और बड़ी ही धीमी आंच पर पानी गरम करने लगे।
कुछ ही देर में पानी गरम होने लगा। मेंढक को ये बात कुछ अजीब लगी पर उसने खुद को इस तापमान के हिसाब से एडजस्ट कर लिया…इस बीच बर्नर जलता रहा और पानी और भी गरम होता गया….पर हर बार मेढक पानी के टेम्परेचर के हिसाब से खुद को एडजस्ट कर लेता और आराम से पड़ा रहता….लेकिन उसकी भी सहने की एक क्षमता थी! जब पानी काफी गरम हो गया और खौलने को आया तब मेंढक को अपनी जान पर मंडराते खतरे का आभास हुआ…और उसने पूरी ताकत से बाहर छलांग लगाने की कोशिष की….पर बार-बार खुद को बदलते तापमान में ढालने में उसकी काफी उर्जा लग चुकी थी और अब खुद को बचाने के लिए न ही उसके पास शक्ति थी और न ही समय…देखते-देखते पानी उबलने लगा और मेंढक की मौत हो गयी।
एक्सपेरिमेंट देखने के बाद दोस्त बोला-
यार तूने तो मेंढक की जान ही ले ली…खैर, ये सब तू मुझे क्यों दिखा रहा है?
प्रोफ़ेसर बोले, “ मेंढक की जान मैंने नहीं ली…उसने खुद अपनी जान ली है। अगर वो बिगड़ते हुए माहौल में बार-बार खुद को एडजस्ट नहीं करता बल्कि उससे बचने का कुछ उपाय सोचता तो वो आसानी से अपनी जान बचा सकता था। और ये सब मैं तुझे इसलिए दिखा रहा हूँ क्योंकि कहीं न कहीं तू भी इस मेढक की तरह व्यवहार कर रहा है।
तेरा अच्छा-ख़ासा बिजनेस है पर तू चेंज हो रही मार्केट कंडीशनस की तरफ ध्यान नहीं दे रहा, और बस ये सोच कर एडजस्ट करता जा रहा है कि आगे सब अपने आप ठीक हो जाएगा…पर याद रख अगर तू आज ही हो रहे बदलाव के ऐकौर्डिंग खुद को नहीं चेंज करेगा तो हो सकता है इस मेंढक की तरह कल को संभलने के लिए तेरे पास ना एनर्जी हो और ना ही समय!”
प्रोफ़ेसर की सीख ने दोस्त की आँखें खोल दीं, उसने प्रोफ़ेसर साहब को गले लगा लिया और वादा किया कि एक बार फिर वो मार्केट लीडर बन कर दिखायेगा।
*💐💐शिक्षा💐💐*
दोस्तों, प्रोफ़ेसर साहब के उस दोस्त की तरह बहुत से लोग अपने आस-पास हो रहे बदलाव की तरफ ध्यान नहीं देते। लोग जिन skills के कारण नोकरी के लिए चुने जाते हैं बस उसी पर अटके रहते हैं खुद को update नहीं करते…और जब company में layoffs होते हैं तो उन्हें ही सबसे पहले निकाला जाता है…लोग जिस ढर्रे पर 10 साल पहले व्यवसाय कर रहे होते हैं बस उसी को पकड़कर बैठे रहते हैं और देखते-देखते नए खिलाड़ी सारा बाजार कवर कर लेते हैं!
यदि आप भी खुद को ऐसे लोगों से सम्बंधित कर पा रहे हैं तो संभल जाइए और इस कहानी से सीख लेते हुए मजबूत बनिए और आस-पास हो रहे बदलावों के प्रति सतर्क रहिये, ताकि बदलाव की बड़ी से बड़ी आंधी भी आपकी जड़ों की हिला न पाएं!
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Good night
इतनी ठोकरे देने के लिए शुक्रिया ए-ज़िन्दगी, चलने का न सही सम्भलने का हुनर तो आ गया ।। Shayaripub.in
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जग तो देखे महज प्रस्तुतीकरण तुम्हारा ईश्वर सदा ही देखे अंतः करण तुम्हारा धर्म-कर्म सब उसको अर्पित कर दो अपने सहज भाव से पूरे हो...
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वो हमारे दिल से निकलने का रास्ता भी नहीं ढूंढ सके जो कहते थे.. तुम्हारी रग रग से वाकिफ हैं हम.. Shayaripub.in