जय माता दी # मां #

साधन-संवाद 

'श्रीभुशुण्डि-गरुड़-संवाद' (तृतीय प्रसंग)
(श्रीरुद्राष्टकम्)

'निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेहं।।'
(स्वतन्त्र एवं स्वयं प्रकट होने वाले, त्रिगुणरहित, निर्विकल्प, चेष्टारहित, चैतन्य आकाशरूप और आकाश में वास करनेवाले आपको मैं भजता हूँ।)

यहाँ जितने भी विशेषण दिये गये हैं, उनके अनन्त अर्थ हैं। कुछ की ओर हम संकेत करेंगे, बाकी आप इसे अपनी साधना का अभिन्न अंग बना लीजिए। प्रतिदिन कुछ समय शान्त बैठकर इस स्तुति पर विचार कीजिए। इससे अद्भुत रहस्य उजागर होने लगेंगे। जो भी हमारे आग्रह को स्वीकार करते हुए ऐसा करेंगे, वे अवश्य ही इसकी अलौकिकता से परिचित होंगे।

'निज' का एक अर्थ होता है स्वतन्त्र। प्रभु अपने-आप हैं, वो किसी के अंश नहीं हैं। फिर इसका अर्थ यह भी है कि प्रभु सब-के-सब अर्थात् सर्वरूप हैं। वे सबके निज स्वामी हैं। वे सभी में समाये हैं। सत्ता का आधार वहीं हैं। कुछ है तो वही हैं और कुछ नहीं है तो भी वही हैं।

प्रभु 'निर्विकल्प' अर्थात् तर्कवर्जित हैं। मन उनकी कल्पना नहीं कर सकता है। वाणी उनकी चर्चा नहीं कर सकती है। उनमें कोई विकल्प नहीं घट सकता है। वो एकरस सर्वत्र व्याप्त हैं। प्रभु सदा निर्विकल्पं-समाधि अवस्था में रहने वाले हैं। प्रभु सबकुछ करते हुए भी कर्ता नहीं हैं अर्थात् 'निरीह' हैं।

प्रभु नित्यचैतन्य ब्रह्मस्वरूप आकाशवत् हैं। आकाश तो जड़ है, इसलिए प्रभु को चैतन्यस्वरूप आकाश कहा गया है। आकाश तीन प्रकार का माना गया है- भूताकाश, चित्ताकाश और चिदाकाश। ब्रह्म ही चिदाकाश है। प्रभु सबमें हैं और सबसे पृथक् भी हैं। 

'चिदाकाशमाकाशवासं' के बहुत सारे अर्थ हैं, कुछ को देखिये। प्रभु अत्यन्त सूक्ष्म आकाश में भी सूक्ष्मरूप से बसे हुए हैं। प्रभु के स्वरूप का विस्तार आकाशवत् है। चैतन्यस्वरूप आकाश भी उन प्रभु में बसता है। वो प्रभु अन्तरिक्षवासी हैं। सूक्ष्म और महा आकाश में उनका वास है अथवा उनमें दोनों आकाश बसते हैं। फिर एक अर्थ यह भी है कि वो प्रभु  सत्तारूप दिगम्बर हैं, आकाश ही उनका वस्त्र है।



श्रीराम प्रपत्ति पीठाधीश्वर 
स्वामी (डाॅ.) सौमित्रिप्रपन्नाचार्य 
देवराहा बाबा आश्रम, हरदोई।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता, 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। 
 
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता, 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
 
या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता, 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
 
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता, 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
 
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता, 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
 
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता, 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
 
या देवी सर्वभूतेषु शांतिरूपेण संस्थिता, 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
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जामवंत जी हैं ब्रह्म का अवतार

ब्रह्मा जी के  अंशावतार ऋक्षराज जामवंत 

ब्रह्मा जी के  अंशावतार ऋक्षराज जामवंत
स्वारथ सांच जीव कहुं एहा ,मन  क्रम वचन राम पद नेहा ।।
भगवान ब्रह्मा ने देखा कि सृष्टि के कार्य में लगे रहते पूरा समय भगवान की सेवा में नहीं दिया जा सकता  अतः वह एक रुप से ऋक्ष राज जाम्बवान्‌  होकर पृथ्वी पर आ गए ।
भगवान की सेवा भगवान के नित्य मंगलमय रूप का ध्यान भगवान की लीलाओं का चिंतन यही जामवंत की दिनचर्या थी

सतयुग में जब भगवान बामन ने विराट रूप धारण करके बलि को बांध लिया उस समय उस विराट रूप प्रभु को देखकर जामवंत जी बहुत आनंदित हुए ।
वे भेरी लेकर विराट भगवान का जयघोष करते हुए दिशाओं में सर्वत्र महोत्सव की घोषणा कर आए और दो घड़ी में ही दौड़ते हुए उन्होंने सात प्रदक्षिणाएं विराट भगवान की कर ली।

त्रेता में जामवंत जी सुग्रीव के मंत्री हो गए आयु ,बुद्धि, बल और नीति में सबसे श्रेष्ठ होने के कारण वे ही सब को उचित सम्मति देते थे।

वानर जब सीता को ढूंढने निकले और समुद्र के तट पर हताश होकर बैठ गए तब जामवंत जी ने ही हनुमान जी को उनके बल का स्मरण दिला कर लंका जाने के लिए प्रेरित किया भगवान श्री राम के युद्ध काल में तो जैसे यह प्रधान सचिव ही थे सभी कार्य में भगवान इनकी सम्मति लेते और इनका आदर करते थे। भगवान अयोध्या लौट आए और राज्य अभिषेक के बाद सब को विदा करने लगे तब जामवंत जी ने अयोध्या से जाना तभी सरकार किया जब प्रभु ने उन्हें द्वापर में  दर्शन देने का वचन दिया ।
जामवंत जी की इच्छा थी कि कोई मुझे द्वंद युद्ध  में संतुष्ट करे लंका के युद्ध में रावण भी उनके सम्मुख टिक नहीं सका था ।

द्वापर में श्री कृष्ण चंद्र का अवतार हुआ द्वापर में  द्वारका आने पर यादव श्रेष्ठ सत्राजित जिसने सूर्य की आराधना करके स्यमन्तक मणि प्राप्त की।
एक दिन श्रीकृष्ण ने सत्राजित से कहा कि वह मणि महाराज उग्रसेन को दे दें। किंतु लोभ वश सत्राजित ने यह बात स्वीकार नहीं की ।

संयोगवश उस मणि को गले में बांधकर सत्राजित का भाई प्रसेनजित आखेट के लिए वन में गया और वहां उसे शेर ने खा लिया।
शेर मणि लेकर गुफा में गया तो जामवंत जी ने शेर को मार कर मणि ले ली और गुफा के भीतर अपने बच्चों को खेलने के लिए दे दी।

द्वारका में जो प्रसेनजित नहीं लौटा तब सत्राजित को शंका हुई कि श्री कृष्ण चंद्र ने मेरे भाई को मारकर मणि छीन ली है ।

धीरे-धीरे यह बात फैलने लगी इस अपयश को दूर करने के लिए भगवान श्री कृष्ण मणि का पता लगाने निकले वह  मरे घोड़े को फिर मृत सिंह को देखते हुए जामवंत की गुफा में पहुंचे एक अपरिचित पुरुष को देख बच्चे की धार मां चिल्ला उठी जामवंत उस चिल्लाहट को सुन क्रोध में भर दौड़े ।
कृष्ण के साथ उनका द्वंद युद्ध होने लगा था ।
सत्ताइस दिन रात बिना विश्राम कि ये दोनों एक-दूसरे पर वज्र के समान आघात करते रहे अंत में जामवंत का शरीर मधुसूदन के  प्रहारों से शिथिल होने लगा
जामवंत जी ने सोचा मुझे पराजित कर सके ऐसा कोई देवता या राक्षस तो हो नहीं सकता अवश्य ही यह मेरे भगवान श्रीराम ही हैं।

वे यह सोचकर रुक गए भगवान ने उसी समय उन्हें अपने धनुषधारी राम स्वरूप का दर्शन दिया जामवंत जी प्रभु के चरणों में गिर पड़े। श्री कृष्ण चंद्र ने अपना हाथ उनके शरीर पर फेरकर समस्त पीड़ा और क्लेश दूर कर दिया जामवंत ने अपनी कन्या जामवंती को श्री कृष्ण के चरणों में समर्पित किया और वह मणि भी दे दी इस प्रकार उन्होंने अपने जीवन को भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया 

ग़ज़ल # attitude shayari # dil shayrana#

मुझे तुम तुम ही रहने दो !कभी तुम आप मत कहना!
  तेरी चाहत रहे मुझको मुझे बस इतना ही ...चाहना ।।
मेरे चेहरे पे नूर है तेरी मोहब्बत का
मेरा रुतबा बढ़ाता है तेरा  यह इश्क का  गहना ।।
तू दूर है मुझसे ...दिल पास है तेरे
बड़ा मुश्किल सा लगता है यह दर्द जुदाई का सहना।।
मेरी जन्नत मेरी मन्नत मेरी हर आरजू हो तुम
कभी ना घर बदलना यह सदा दिल में मेरे रहना।।
चलेंगे तेरी राहों पर मरेंगे तेरी बाहों में
तेरे  कानों में धीरे से यही है अचला का कहना।।                                                          Achlasguleria 
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ramayan # भरत # विष्णु के अंशावतार भरत लाल

             विष्णु के अंशावतार श्री भरत जी

भरत सरिस को रामसनेही जगु-जप राम रामु जप जेही।।
श्री भरत जी श्री राम जी के स्वरूप हैं यह  व्यूहावतार माने जाते हैं। और उनका वर्ण ऐसा है कि
भरतु रामही की अनुहारी सहसा लखि न सकहिं नर नारी

विश्व का भरण पोषण करने वाले होने से ही उनका नाम भरत पड़ा है। धर्म के आधार पर सृष्टि है।
जौं न होत जग जन्म भरत को ।सकल धरम धुर धरनि भरत को

जन्म से ही भरत  श्री राम के प्रेम की मूर्ति थे।
वे सदा श्रीराम के सुख और उनकी प्रसन्नता में प्रसन्न रहते थे ।
महुं स्नेह सकोच बस सन्मुख कहीं ना वैन
दरसन तृप्ति ना आजु लगि प्रेम पिआसे नैन।।

बड़ा ही संकोची स्वभाव था भरत लाल का अपने बड़े भाई के सामने भी संकोच की मूर्ति बने रहते थे ऐसे संकोची ऐसे अनुरागी भाई को जब पता लगा कि माता कैकई ने उन्हें राज्य देने के लिए श्री राम जी को वनवास दिया है तब उनको बहुत दुख हुआ ।
कैकई को उन्होंने बड़े कठोर वचन कहे परंतु ऐसी अवस्था में भी  दयानिधि किसी को कष्ट नहीं देते हैं ।जिस मंथरा ने यह सब उत्पात किया था उसी को जब शत्रुघ्न दंड देने लगते हैं तो वे उसकी जान बचाते  हैं ।अयोध्या का जो साम्राज्य देवताओं को भी लुभाता है उस राज्य को उस संपति को भरत ने तृण से भी तुच्छ मानकर छोड़ दिया।
वे बार-बार यह सोचते हैं श्री राम माता जानकी और लक्ष्मण अपने  सुकुमार चरणों से वन के कठोर मार्ग में भटकते होंगे यही व्यथा उन्हें व्याकुल किए थी  

वह भारद्वाज से कहते हैं.......
⚘राम लखन सिय बिनु पग पनहीं करि मुनि वेष फिरहिं बन बनहीं।। अजिन वसन   फल असन महि सयन डासि कुस पात।
बस तरु तर नित सहत हिम आते बरसात बात
एहि दुख दांह दहइ दिनछाती।भूख न बासर नीद न राती⚘

वे स्वयं मार्ग में उपवास करते कंदमूल खाते और भूमि पर शयन करते थे । साथ में घोड़े चलते थे किंतु भरत पैदल ही चलते थे उनके लाल-लाल कोमल चरणों में छाले पड़ गए थे ,किंतु उन्होंने सवारी अस्वीकार कर दी ।भरत का प्रेमभाव रामचरितमानस के अयोध्याकांड कांड में देखने योग्य है। ऐसा अलौकिक अनुराग कि जिसे देखकर पत्थर तक पिघल सकते हैं। कोई श्री राम कह दे कहीं श्री राम के स्मृति चिन्ह मिले किसी से सुन पड़े श्री श्रीराम का समाचार वहीं उसी से भरत व्याकुल होकर लिपट जाते थे।
हरषहिं निरखि रामपद अंका  मानहुं पारसु पायउ रंका।।
रज  सिर धरि हिंय नयनहिं  लावहिं  रघुवर मिलन सरिस  सुख पावहिं

महर्षि भारद्वाज ने ठीक ही कहा है
तुम्ह तौ भरत मोर मत एहु  धरें देह जनु रामसनेहु
महाराजा जनक  भरत जी के बारे में अपनी पत्नी सुनयना से कहते हैं
परमारथ स्वारथ सुख सारे भरत न सपनेहुँ मनहुं  निहारे
साधन सिद्धि राम पग नेहु मोहिलखि  परत भरत मत एहु

  श्री राम क्या आज्ञा दें? वे भक्तवत्सल हैं। भरत पर उनका असीम स्नेह है ।वे भरत के लिए सब कुछ त्याग सकते हैं उन्होंने स्पष्ट कह दिया
मनु प्रसन्न करि सकुच  तजि कहहुं करौं सोइ आजु
परंतु धन्य है भरत लाल !धन्य है उनका अनुराग! जिसमें श्री राम की प्रसन्नता हो जो करने में रघुनाथ जी को संकोच ना हो वही उन्हें प्रिय है।उन्हें चाहे जितना कष्ट सहना पड़े किंतु श्री राम को तनिक भी संकोच नहीं होना चाहिए ।अतएव राम की प्रसन्नता के लिए उनकी चरण पादुका लेकर भरत अयोध्या लौट आए सिंहासन पर पादुकाएं पधरायी गयीं। राम वन में रहे और भरत राज सदन के सुख भोगें यह संभव नहीं _अयोध्या से बाहर नंदीग्राम में भूमि में गड्ढा खोदकर कुश का आसन बिछाकर भरत जी ने वहां पर तपस्वी का जीवन व्यतीत किया ।चौदह बर्ष उनकी अवस्था कैसी रही है गोस्वामी तुलसीदास जी बताते हैं
पुलक  गात हिंय सिय रघुबीरू जीह नामु जप लोचन नीरू ।।
भरत जी ने इसी प्रकार अवधि के वे वर्ष बिताए। उनका दृढ़ निश्चय था
बीतें अवधि रहहिं  जौ प्राना  अधम कवन जग मोहि समाना
श्रीराम भी इसी इस बात को भलीभांति जानते थे उन्होंने विभीषण से कहा
बीतें अवधि जांउ जौं जिअत न पावउं वीर ।।
इसलिए रघुनाथ जी हनुमान जी को पहले ही भरत के पास भेज देते हैं ।जब पुष्पक विमान से राघवेंद्र आए उन्होंने तपस्या से कृश हुए जटा बढ़ाए अपने भाई को देखा उन्होंने देखा कि भरत जी उनकी चरण पादुका है अपने सिर पर रख कर आ रहे हैं ।
प्रेम व्याकुल राम ने भाई को हृदय से लिपटा लिया ।
तत्वतः भरत और श्री राम नित्य अभिन्न हैं।अयोध्या में या नित्य साकेत में भरत लाल सदा श्री राम की सेवा में सलंग्न उनके समीप ही रहते हैं ।
स्रोत.... कल्याण
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हरे कृष्णा



श्री राधा जी के बारे में प्रचलित है कि वह बरसाना की थीं लेकिन सच्चाई है कि उनका जन्‍म बरसाना से पचास किलोमीटर दूर हुआ था। यह गांव रावल के नाम से प्रसिद्ध है। यहां पर राधा जी का जन्‍म स्‍थान है।

*कमल के फूल पर जन्‍मी थीं राधा*

रावल गांव में राधा जी का मंदिर है। माना जाता है कि यहां पर राधा जी का जन्म हुआ था। पांच हजार वर्ष पूर्व रावल गांव को छूकर यमुना जी बहती थी। राधा जी की मां कृति यमुना में स्‍नान करते हुए अराधना करती थी और पुत्री की लालसा रखती थी। पूजा करते समय एक दिन यमुना से कमल का फूल प्रकट हुआ। कमल के फूल से सोने की चमक सी रोशनी निकल रही थी। इसमें छोटी बच्‍ची के नेत्र बंद थे। अब वह स्‍थान इस मंदिर का गर्भगृह है। इसके ग्यारह माह पश्चात् तीन किलोमीटर दूर मथुरा में कंस के कारागार में भगवान श्री कृष्‍ण जी का जन्‍म हुआ था व रात में गोकुल में नंदबाबा के घर पर पहुंचाए गए। तब नंद बाबा ने सभी स्थानों पर  संदेश भेजा और कृष्‍ण का जन्‍मोत्‍सव मनाया गया। जब बधाई लेकर वृषभानु जी अपनी गोद में राधारानी को लेकर यहां आए तो राधारानी जी घुटने के बल चलते हुए बालकृष्‍ण के पास पहुंची। वहां बैठते ही तब राधारानी के नेत्र खुले और उन्‍होंने पहला दर्शन बालकृष्‍ण का किया।

*राधा और कृष्‍ण क्‍यों गए बरसाना*

कृष्‍ण के जन्‍म के बाद से ही कंस का प्रकोप गोकुल में बढ़ गया था। यहां के लोग परेशान हो गए थे। नंदबाबा ने स्‍थानीय राजाओं को एकत्रित किया। उस समय ब्रज के सबसे बड़े राजा वृषभानु जी थे। इनके पास ग्यारह लाख गाय थीं। जबकि नंद जी के पास नौ लाख गाय थीं। जिसके पास सबसे अधिक गाय होतीं थीं, वह वृषभान कहलाते थे। उससे कम गाय जिनके पास रहती थीं, वह नंद कहलाए जाते थे। बैठक के बाद निर्णय हुआ कि गोकुल व रावल छोड़ दिया जाए। गोकुल से नंद बाबा और जनता पलायन करके पहाड़ी पर गए। उसका नाम नंदगांव पड़ा। वृषभान, कृति जी राधारानी को लेकर पहाड़ी पर गए। उसका नाम बरसाना पड़ा।

*रावल में मंदिर के सामने बगीचा, इसमें पेड़ स्‍वरूप में हैं राधा व श्‍याम*

रावल गांव में राधारानी के मंदिर के ठीक सामने प्राचीन उपवन है। कहा जाता है कि यहां पर पेड़ स्‍वरूप में आज भी श्री राधा जी और श्री कृष्‍ण जी विद्यमान हैं। यहां पर एक साथ दो वृक्ष हैं। एक श्‍वेत है तो दूसरा श्‍याम रंग का। इसकी पूजा होती है। माना जाता है कि श्री राधा जी और श्री  कृष्‍ण जी वृक्ष स्‍वरूप में आज भी यहां से यमुना जी को निहारते हैं।                                              

चहक उठी है सृष्टि सारी।
बज उठी है देखो शहनाई।
  कीरत जू के अंगना में।
 नन्ही-सी लाली है जाई।
सब मिल कर गाओ बधाई।

आँखों मे बस गया नज़ारा आज अटारी का। 
धरती पर अवतार हुआ वृषभानु दुलारी का।
झूमो नाचो गाओ जन्मदिन श्यामा प्यारी का।
🙏🌷जय श्री राधे राधे।🌷🙏
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सप्तर्षियों का अवतरण # जाने कौन है सप्तऋषि

                     सप्त ऋषियों का अवतरण
⚘⚘⚘⚘⚘"परम ऋषि यों को नमस्कार!!⚘⚘⚘⚘⚘

सप्तर्षियों का प्रादुर्भाव श्री ब्रह्मा जी के मानस संकल्प से हुआ है। सृष्टि के विस्तार के लिए ब्रह्मा जी ने अपने ही समान 10 मानस पुत्रों को उत्पन्न किया उनके नाम हैं
मरीचि
अत्रि
अंगिरा
पुलस्त्य
पुलह
क्रतु
भृगु
वशिष्ठ
दक्ष
  नारद
यह ऋषि गुणों में श्री ब्रह्मा जी के समान ही है अतः इन्हें पुराणों में ⚘नौ ब्रह्मा⚘ भी कहा जाता है। यह सब  भगवान के अनन्य भक्त हैं और उन्हीं के कृपा प्रसाद से समर्थ होकर जीवों का कल्याण करते रहते हैं। यह एक रूप से "नक्षत्र लोक" में सप्त ऋषि मंडल में स्थित रहते हैं और दूसरे रूप में तीनों लोकों में विशेष रुप से" भूलोक" में स्थित रह कर लोगों को धर्म आचरण तथा सदाचार की शिक्षा देते हैं।
तथा ज्ञान, भक्ति ,वैराग्य, तप ,पर भगवत प्रेम ,सत्य ,परोपकार, क्षमा, अहिंसा, आदि।सात्विक गुणों की प्रतिष्ठा करते हैं ।
प्रति चार युगबीतने पर ...वेदविप्लव... होता है, इसलिए सप्त ऋषि गण भूतल पर अवतीर्ण होकर वेद का उद्धार करते हैं।  अलग-अलग मन्वंतरों में सप्त ऋषि बदल जाते हैं।
मनु काल ही मन्वंतर कहलाता है ।ब्रह्मा जी के 1 दिन में 14 मनु होते हैं 14 मनु और मनु पुत्र एक-एक कर समस्त पृथ्वी के राजा होकर धर्म पूर्वक प्रजा का पालन करते हैं ।मनुओं के नामानुसार ही 14 मन्वंतरों 14 भिन्न-भिन्न नाम पड़े हैं ।
इन 14 मनुओं में प्रथम मनु का नाम *स्वायंभू मनु* है ।
भगवान विष्णु के नाभिपदम से चतुर्मुख ब्रह्मा जी ने आविर्भूत होकर मैथुनी  सृष्टि के संकल्प को लेकर अपने ही शरीर से *स्वायंभू मनु* तथा महारानी *शतरूपा *को प्रकट किया ।यह आदि मनु ही प्रथम मनु हैं जिसके नाम से स्वायंभुव मन्वंतर का नाम पड़ा।

प्रत्येक मन्वंतर में सप्त ऋषि भिन्न-भिन्न रामरूपों से अवतरित होते हैं पुराणों में इस बात का विस्तार से वर्णन है यहां विष्णु पुराण के अनुसार 14 मन्वंतरों के सप्तर्षियों का प्रथक प्रथक नाम दिया जा रहा है
1: प्रथम स्वायंभुव मन्वंतर में
मरीचि
अत्रि ,
अंगिरा
पुलस्त्य
पुलह
विशिष्ट आते हैं
2: द्वितीय सवारोचिष मन्वंतर में
ऊर्ज्ज
स्तंभ
वात
प्राण
पृषभ
निरय
और परीवान
3:  तृतीय उत्तम मन्वंतर में
महर्षि वशिष्ठ के सातों पुत्र
4: चतुर्थ तामस मन्वंतर में
ज्योतिर्धामा
पृथु
काव्य
चैत्र
अग्नि
वनक
और पीवर
5: पंचम रैवत मन्वंतर में
हिरण निरुमा वेद श्री उधर बाहु वेद बाहु सुदामा भजन और महामुनी

6: षष्ठ चाक्षुष मन्वंतर में
सुमेधा
बिरजा
हविष्मान
उत्तम
मधु
अति नामा
और सहिष्णु
                    वर्तमान.......✍
7: सप्तम वैवस्वत मन्वंतर में
कश्यप
अत्रि
वशिष्ठ
विश्वामित्र
गौतम
जमदग्नि
भारद्वाज
8:अष्टम सावर्णिक मन्वंतर में
गालव
दीप्तिमान
राम
अश्वथामा
कृप
व्यास
9: नवम दक्षसावर्णी  मन्वंतर में
मेधातिथि
बसु
सत्य
ज्योतिष्मान
द्युतिमान
सवन
भव्य
10: दशम ब्रह्मासावर्णि मन्वंतर में
तपोमूर्ति
हविष्मान
सुकृत
सत्य
नाभाग
अप्रतिमौझा
सत्यकेतु ।
11: एकादश धर्मसावर्णी मन्वंतर में
वपुष्मान
घृणि
आरुणि
निःस्वर
हविष्मान
अनघ
अग्नितेजा
12: द्वादश रूद्र सावर्णी मन्वंतर में
तपोद्युती
तपस्वी
सुतपा
तपोमूर्ति
तपोधन
तपोरति
तपोधृति
13: त्रयोदश देव सावर्णी मन्वंतर में
धृतिमान
अव्यय
तत्वदर्शी
निरुत्सुक
निर्मोह
सुतपा
  निष्प्रकम्प
14:  चतुर्दश इन्द्रसावर्णी मन्वंतर में
अग्निध्र
अग्निबाहु
शुची
युक्त
मागध
शुक्र
जित
इस प्रकार 14 मन्वंतरों  में सप्तऋषियों का परिगणन पृथक पृथक नाम रूप से हुआ है
इन ऋषियों की अपार महिमा है यह सभी तपोधन है।
     स्रोत  कल्याण 
       गीताप्रेस                          सौजन्य अचलाएसगुलेरिया
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Good morning

*उम्रदराज न बनें*

*उम्र को दराज़ में रख दें...
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ओम नमः शिवाय

"स्वार्थ "की रफ्तार भले ही तेज हो    "किन्तु"
 मंजिल तक" निःस्वार्थ "ही पहुँचता है..!!
 इसलिये अपनो के बीच निःस्वार्थ रहने का प्रयास करे..
    ⚘⚘ओम नमः शिवाय.  ⚘⚘                                                     ⚘⚘shayaripub.com⚘⚘ 

Goodmorning # सुप्रभात

“ हंसना ,मुस्कुराना ,खुश रहना, ये सब अभ्यास की चीजें हैं, 
लगातार करते रहना चाहिए..,
अगर एक बार इन्हें भूल गए तो दोबारा याद करने में बहुत प्रयास लगते हैं..!”
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Good morning # सुप्रभात

*ज़िन्दगी की राहों में*
*ऐसा अक्सर होता है....*
*फैसला जो मुश्किल हो*
 *वही बेहतर होता है...!!*
   
🌹💐 *Jai Shree Krishna*💐🌹 
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Goodmorning

🌹 सुप्रभात  🌹

बहुत फर्क होता है किसी को "जानने" और "समझने" में..
जानता वो है जो "पास" होता है।
                और
समझता वो है जो "खास" होता है !!
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Good evening

कौन समझेगा यहां की वीरानी देख के... इस जगह भी ठहरे थे  कभी काफ़िले मोहब्बत के...... Shayaripub.in पूछा जो उसने कैसे रहोगे ताउम्र तुम मेरे सा...