sad shayari # emotional shayari

ढूंढा करोगे हर किसी में मुझको, देखना वो मंजर भी आएगा ..
हम याद भी आएंगे और आँखों में समंदर भी आएगा …!!
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त्याग की यही परिभाषा है, जो बैचैन करता हो ,
                     छोड़ो फिर उसके पीछे कभी मत दौड़ो।।
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Goodnight # thought of the day

हवाओं की भी अपनी अजब सियासत है...

कहीं बुझी राख भड़का दे,कहीं जलते दीये बुझा दे...!
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              औरत की जाति भी होती है क्या ??

किसी ने पूछा औरत की जाति क्या है, बताओ ? 
मैंने भी पूछा : एक मां की या एक महिला की ..?

उसने कहा - चल दोनों की बता .. 
और कुटिल मुस्कान बिखेरी ।

मैंने भी पूरे धैर्य से बताया.......

एक महिला जब माँ बनती  है 
तो वो जाति विहीन हो जाती है..

उसने फिर आश्चर्य चकित होकर पूछा - 
वो कैसे..?

मैंने कहा .....
जब एक मां अपने बच्चे का 
लालन पालन करती है, 
अपने बच्चे की गंदगी साफ करती है , 
तो वो शूद्र हो जाती है..

वो ही बच्चा बड़ा होता है तो मां बाहरी नकारात्मक ताकतों से उसकी रक्षा करती है, 
तो वो क्षत्रिय हो जाती है..

जब बच्चा और बड़ा होता है, 
तो मां उसे शिक्षित करती है, 
तब वो ब्राह्मण हो जाती है..

और अंत में जब बच्चा और बड़ा  होता है 
तो मां उसके आय और व्यय में 
उसका उचित मार्गदर्शन कर
अपना वैश्य धर्म निभाती है ..

जब.. शूद्र "क्षत्रिए "ब्राह्मण और वैश्य 
सभी नारी में समाहित है, 
तो हुई ना एक महिला या मां जाति विहीन..
तो कैसे कह दे की औरत की कोई जाती होती ।

👌

            " चार पैसे " का रहस्य 

बचपन में बुजुर्गों से एक कहानी सुनते थे कि...
इंसान 4 पैसे कमाने के लिए मेहनत करता है या... 
बेटा कुछ काम करोगे तो 4 पैसे घर में आएँगे या... 
आज चार पैसे होते तो कोई ऐसे ना बोलता, 
आदि-आदि ऐसी बहुत सी बातें हम अक्सर सुनते थे।

आख़िर क्यों चाहिए ये चार पैसे और चार ही क्यों तीन या पाँच क्यों नहीं? 

तीन पैसों में क्या कमी हो जायेगी या पाँच से क्या बढ़ जायेगा? 

आइये... 
समझते हैं कि इन चार पैसों का क्या करना है?

*पहला पैसा खाना है,* 
*दूसरे पैसे से पिछला क़र्ज़ उतारना है,*
*तीसरे पैसे का आगे क़र्ज़ देना है और...* 
*चौथे पैसे को कुएं में डालना है।*

*4 पैसों का रहस्य*

*1) खाना:-*
अर्थात अपना तथा अपने परिवार पत्नी, बच्चों का भरण-पोषण करना, पेट भरने के लिए।

*2) पिछला क़र्ज़ उतारना:-*
अपने माता-पिता की सेवा के लिए उनके द्वारा किए गये हमारे पालन-पोषण क़र्ज़ उतारने के लिए।

*3) आगे क़र्ज़ देना:-*
सन्तान को पढ़ा-लिखा कर क़ाबिल बनाने के लिए ताकि आगे वृद्धावस्था में वे आपका ख़्याल रख सके।

*4) कुएं में डालने के लिए:-*
अर्थात शुभ कार्य करने के लिए दान, सन्त सेवा, असहायों की सहायता करने के लिए, यानि निष्काम सेवा करना, क्योंकि हमारे द्वारा किए गये इन्ही शुभ कर्मों का फल हमें इस जीवन के बाद मिलने वाला है।

इन कार्यों के लिए हमें चार पैसों की ज़रूरत पड़ती है,
यदि तीन पैसे रह गए तो कार्य पूरे नहीं होंगे और पाँचवे पैसे की ज़रूरत ही नहीं है..!! 
                      यही है 4 पैसों का गणित....
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                              हिन्दी शायरी दिल से

jai siya ram # जय सीयाराम


        इतिहास प्रसिद्ध बनारस की सत्य घटना

🌹*जब 52 सीढी उपर चढकर मां गंगा ने "पण्डितराज को अपनी गोद में लिया*🌹

सत्रहवीं शताब्दी का पूर्वार्ध था, दूर दक्षिण में गोदावरी तट के एक छोटे राज्य की राज्यसभा में एक विद्वान ब्राह्मण सम्मान पाता था, नाम था जगन्नाथ शास्त्री।
साहित्य के प्रकांड विद्वान, दर्शन के अद्भुत ज्ञाता। इस छोटे से राज्य के महाराज चन्द्रदेव के लिए जगन्नाथ शास्त्री सबसे बड़े गर्व थे। कारण यह, कि जगन्नाथ शास्त्री कभी किसी से शास्त्रार्थ में पराजित नहीं होते थे। दूर-दूर के विद्वान आये और पराजित हो कर जगन्नाथ शास्त्री की विद्वता का ध्वज लिए चले गए।
पण्डित जगन्नाथ शास्त्री की चर्चा धीरे-धीरे सम्पूर्ण भारत में होने लगी थी। उस समय दिल्ली पर मुगल शासक शाहजहाँ का शासन था। शाहजहाँ मुगल था, सो भारत की प्रत्येक सुन्दर वस्तु पर अपना अधिकार समझना उसे जन्म से सिखाया गया था। पण्डित जगन्नाथ की चर्चा जब शाहजहाँ के कानों तक पहुँची तो जैसे उसके घमण्ड को चोट लगी। "मुगलों के युग में एक तुच्छ ब्राह्मण अपराजेय हो, यह कैसे सम्भव है ?" शाह ने अपने दरबार के सबसे बड़े मौलवियों को बुलवाया और जगन्नाथ शास्त्री तैलंग को शास्त्रार्थ में पराजित करने के आदेश के साथ महाराज चन्द्रदेव के राज्य में भेजा। " जगन्नाथ को पराजित कर उसकी शिखा काट कर मेरे कदमों में डालो...." शाहजहाँ का यह आदेश उन चालीस मौलवियों के कानों में स्थायी रूप से बस गया था।
सप्ताह भर पश्चात मौलवियों का दल महाराज चन्द्रदेव की राजसभा में पण्डित जगन्नाथ को शास्त्रार्थ की चुनौती दे रहा था। गोदावरी तट का ब्राह्मण और अरबी मौलवियों के साथ शास्त्रार्थ, पण्डित जगन्नाथ नें मुस्कुरा कर सहमति दे दी। मौलवी दल ने अब अपनी शर्त रखी, "पराजित होने पर शिखा देनी होगी..."। पण्डित की मुस्कराहट और बढ़ गयी, "स्वीकार है, पर अब मेरी भी शर्त है। आप सब पराजित हुए तो मैं आपकी दाढ़ी उतरवा लूंगा।" 
मुगल दरबार में "जहाँ पेड़ न खूंट वहाँ रेड़ परधान" की भांति विद्वान कहलाने वाले मौलवी विजय निश्चित समझ रहे थे, सो उन्हें इस शर्त पर कोई आपत्ति नहीं हुई।
शास्त्रार्थ क्या था; खेल था। अरबों के पास इतनी आध्यात्मिक पूँजी कहाँ जो वे भारत के समक्ष खड़े भी हो सकें। पण्डित जगन्नाथ विजयी हुए, मौलवी दल अपनी दाढ़ी दे कर दिल्ली वापस चला गया...
दो माह बाद महाराज चन्द्रदेव की राजसभा में दिल्ली दरबार का प्रतिनिधिमंडल याचक बन कर खड़ा था, "महाराज से निवेदन है कि हम उनकी राज्य सभा के सबसे अनमोल रत्न पण्डित जगन्नाथ शास्त्री तैलंग को दिल्ली की राजसभा में सम्मानित करना चाहते हैं, यदि वे दिल्ली पर यह कृपा करते हैं तो हम सदैव आभारी रहेंगे"।
मुगल सल्तनत ने प्रथम बार किसी से याचना की थी। महाराज चन्द्रदेव अस्वीकार न कर सके। पण्डित जगन्नाथ शास्त्री दिल्ली के हुए, शाहजहाँ नें उन्हें नया नाम दिया "पण्डितराज"।
दिल्ली में शाहजहाँ उनकी अद्भुत काव्यकला का दीवाना था, तो युवराज दारा शिकोह उनके दर्शन ज्ञान का भक्त। दारा शिकोह के जीवन पर सबसे अधिक प्रभाव पण्डितराज का ही रहा, और यही कारण था कि मुगल वंश का होने के बाद भी दारा मनुष्य बन गया।
मुगल दरबार में अब पण्डितराज के अलंकृत संस्कृत छंद गूंजने लगे थे। उनकी काव्यशक्ति विरोधियों के मुंह से भी वाह-वाह की ध्वनि निकलवा लेती।
यूँ ही एक दिन पण्डितराज के एक छंद से प्रभावित हो कर शाहजहाँ ने कहा- अहा! आज तो कुछ मांग ही लीजिये पंडितजी, आज आपको कुछ भी दे सकता हूँ।
पण्डितराज ने आँख उठा कर देखा, दरबार के कोने में एक हाथ माथे पर और दूसरा हाथ कमर पर रखे खड़ी एक अद्भुत सुंदरी पण्डितराज को एकटक निहार रही थी। अद्भुत सौंदर्य, जैसे कालिदास की समस्त उपमाएं स्त्री रूप में खड़ी हो गयी हों। पण्डितराज ने एक क्षण को उस रूपसी की आँखों मे देखा, मस्तक पर त्रिपुंड लगाए शिव की तरह विशाल काया वाला पण्डितराज उसकी आँख की पुतलियों में झलक रहा था। पण्डित ने मौन के स्वरों से ही पूछा- चलोगी ?
लवंगी की पुतलियों ने उत्तर दिया- अविश्वास न करो पण्डित ! प्रेम किया है....
पण्डितराज जानते थे यह अन्य के गर्भ से जन्मी शाहजहाँ की पुत्री 'लवंगी' थी। एक क्षण को पण्डित ने कुछ सोचा, फिर ठसक के साथ मुस्कुरा कर कहा-
न याचे गजालीम् न वा वजीराजम् न वित्तेषु चित्तम् मदीयम् कदाचित।
इयं सुस्तनी मस्तकन्यस्तकुम्भा, लवंगी कुरंगी दृगंगी करोतु।।
शाहजहाँ मुस्कुरा उठा ! कहा- लवंगी तुम्हारी हुई पण्डितराज। यह भारतीय इतिहास की "एकमात्र घटना" है जब किसी मुगल ने किसी हिन्दू को बेटी दी थी। लवंगी अब पण्डित राज की पत्नी थी।
युग बीत रहा था। पण्डितराज दारा शिकोह के गुरु और परम् मित्र के रूप में ख्यात थे। समय की अपनी गति है। शाहजहाँ के पराभव, औरंगजेब के उदय और दारा शिकोह की निर्मम हत्या के पश्चात पण्डितराज के लिए दिल्ली में कोई स्थान नहीं रहा।
पण्डित राज दिल्ली से बनारस आ गए, साथ थी उनकी प्रेयसी लवंगी।
बनारस तो बनारस है, वह अपने ही ताव के साथ जीता है। बनारस किसी को इतनी सहजता से स्वीकार नहीं कर लेता। और यही कारण है कि बनारस आज भी बनारस है, नहीं तो अरब की तलवार जहाँ भी पहुँची वहाँ की सभ्यता-संस्कृति को खा गई। यूनान, मिश्र, फारस, इन्हें सौ वर्ष भी नहीं लगे समाप्त होने में, बनारस हजार वर्षों तक प्रहार सहने के बाद भी "ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्वर्यमा...." गा रहा है। बनारस ने एक स्वर से पण्डितराज को अस्वीकार कर दिया। कहा- लवंगी आपके विद्वता को खा चुकी, आप सम्मान के योग्य नहीं।
तब बनारस के विद्वानों में पण्डित अप्पय दीक्षित और पण्डित भट्टोजि दीक्षित का नाम सबसे प्रमुख था, पण्डितराज का विद्वत समाज से बहिष्कार इन्होंने ही कराया।
पर पण्डितराज भी पण्डितराज थे, और लवंगी उनकी प्रेयसी। जब कोई कवि प्रेम करता है तो कमाल करता है। पण्डितराज ने कहा- लवंगी के साथ रह कर ही बनारस की मेधा को अपनी सामर्थ्य दिखाऊंगा।
पण्डितराज ने अपनी विद्वता दिखाई भी, पंडित भट्टोजि दीक्षित द्वारा रचित काव्य "प्रौढ़ मनोरमा" का खंडन करते हुए उन्होंने " प्रौढ़ मनोरमा कुचमर्दनम" नामक ग्रन्थ लिखा। बनारस में धूम मच गई, पर पण्डितराज को बनारस ने स्वीकार नहीं किया।
पण्डितराज नें पुनः लेखनी चलाई, पण्डित अप्पय दीक्षित द्वारा रचित "चित्रमीमांसा" का खंडन करते हुए " चित्रमीमांसाखंडन" नामक ग्रन्थ रच डाला।
बनारस अब भी नहीं पिघला, बनारस के पंडितों ने अब भी स्वीकार नहीं किया पण्डितराज को।
पण्डितराज दुखी थे, बनारस का तिरस्कार उन्हें तोड़ रहा था।
असाढ़ की सन्ध्या थी। गंगा तट पर बैठे उदास पण्डितराज ने अनायास ही लवंगी से कहा- गोदावरी चलोगी लवंगी? वह मेरी मिट्टी है, वह हमारा तिरस्कार नहीं करेगी।
लवंगी ने कुछ सोच कर कहा- गोदावरी ही क्यों, बनारस क्यों नहीं?  स्वीकार तो बनारस से ही करवाइए पंडीजी।
पण्डितराज ने थके स्वर में कहा- अब किससे कहूँ, सब कर के तो हार गया...
लवंगी मुस्कुरा उठी, "जिससे कहना चाहिए उससे तो कहा ही नहीं।  *गंगा से कहो, वह किसी का तिरस्कार नहीं करती। गंगा ने स्वीकार किया तो समझो शिव ने स्वीकार किया।"*
पण्डितराज की आँखे चमक उठीं। उन्होंने एकबार पुनः झाँका लवंगी की आँखों में, उसमें अब भी वही बीस वर्ष पुराना उत्तर था-"प्रेम किया है पण्डित! संग कैसे छोड़ दूंगी?"
पण्डितराज उसी क्षण चले, और काशी के विद्वत समाज को चुनौती दी-" आओ कल गंगा के तट पर, तल में बह रही गंगा को सबसे ऊँचे स्थान पर बुला कर न दिखाया, तो पण्डित जगन्नाथ शास्त्री तैलंग अपनी शिखा काट कर उसी गंगा में प्रवाहित कर देगा......"
पल भर को हिल गया बनारस, पण्डितराज पर अविश्वास करना किसी के लिए सम्भव नहीं था। जिन्होंने पण्डितराज का तिरस्कार किया था, वे भी उनकी सामर्थ्य जानते थे।
अगले दिन बनारस का समस्त विद्वत समाज दशाश्वमेघ घाट पर एकत्र था।
*पण्डितराज घाट की सबसे ऊपर की सीढ़ी पर बैठ गए, और गंगालहरी का पाठ प्रारम्भ किया।*
लवंगी उनके निकट बैठी थी।
गंगा बावन सीढ़ी नीचे बह रही थी। *पण्डितराज ज्यों ज्यों श्लोक पढ़ते, गंगा एक एक सीढ़ी ऊपर आती।*
बनारस की विद्वता आँख फाड़े निहार रही थी।
*गंगलहरी के इक्यावन श्लोक पूरे हुए, गंगा इक्यावन सीढ़ी चढ़ कर पण्डितराज के निकट आ गयी थी।*
पण्डितराज ने पुनः देखा लवंगी की आँखों में,
अबकी लवंगी बोल पड़ी- क्यों अविश्वास करते हो पण्डित ? प्रेम किया है तुमसे...
*पण्डितराज ने मुस्कुरा कर बावनवाँ श्लोक पढ़ा। गंगा ऊपरी सीढ़ी पर चढ़ी और पण्डितराज-लवंगी को गोद में लिए उतर गई।*
बनारस स्तब्ध खड़ा था, पर गंगा ने पण्डितराज को स्वीकार कर लिया था।
तट पर खड़े पण्डित अप्पाजी दीक्षित ने मुंह में ही बुदबुदा कर कहा- क्षमा करना मित्र, तुम्हें हृदय से लगा पाता तो स्वयं को सौभाग्यशाली समझता, पर धर्म के लिए तुम्हारा बलिदान आवश्यक था। बनारस झुकने लगे तो सनातन नहीं बचेगा।
*युगों बीत गए।*
*बनारस है, सनातन है, गंगा है तो उसकी लहरों में पण्डितराज भी है....।*
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यन्मायावशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा
यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रजौ यथाहेभ्रर्मः। यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्॥

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jai siya ram # जय सियाराम

मेरे भाई बहन ..दुनिया में आत्मबल से भी ऊँचा है ..भजन बल...... 
विश्व का कोई श्रेष्ठ बल हो तो तलगाजरडी दृष्टि से है ..भजन बल .....
कुछ ज़्यादा सीखने की ज़रूरत नहीं है ...जो थोड़ा सीख गये हो ...भूल जाओ ....और राम नाम याद कर लो ....इतनी ही ज़रूरत है .....
हम ज़्यादा सीख गये हैं. ..खाली रहो ...और हरि नाम ....प्रभु का नाम ....

बापू के शब्द 
मानस श्रीदेवी
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*मानस मुक्तिनाथ।।* दिन २ दिनांक ८अक्टूबर
*ज्ञान कैसे प्रगट हो?मुक्ति कैसे प्राप्त हो?वैराग्य कैसे जन्मे?*
*महापुरुषों की बानी में अनुवाद नहि,अनुनाद होता है।।*
*क्षमा,सरलता,दया,संतोष और सत्य ये मुक्ति के पंचामृत है।।*
 मां भवानी के शारदीय नवरात्र के परम पावन दिनों में रामकथा का आज दूसरा दिन।कल आमुख, भूमिका,प्रस्तावना के रूप में संवाद किया गया।जो राम चरण में रति रखें उसे मुक्ति या भक्ति दोनों फल प्राप्त होते हैं।। बापू ने बताया की वेद ग्रंथों में चार प्रकार की मुक्ति में जटायु को सारुप्य मुक्ति मिली हरी का रूप धारण किया,साधक नारायण रूप हो गया। विभीषण को सालुक्य मुक्ति मिलि।हरि के लोक में निवास।सायुज्य अथवा साष्ट्री वह परमात्मा में विगलित हो जाना, जो रावण को प्राप्त हुआ। नमक की पुतली जैसे सागर में विगलित हो जाए। और सामिप्य मुक्ति गंगा जी को जो निरंतर शिव के संग,शेष को मिली,हलाहल विष को प्राप्त हुई,दुर्वा और पुष्प भगवान के शीश पर चढ़ते हैं,गरुड़ निरंतर भगवान के पास,लक्ष्मीजी,सुदर्शनचक्र,गदा,पद्म ये सामिप्य मुक्ति है, भगवान का सारंग महादेव का त्रिशूल।।
ज्ञान परक ग्रंथोमें  यह मुक्ति को परिभाषित किया है और यहां जो हरि भक्त है और सयाने- समझदार-शिलवान है वह निरादर कैसे करें? यह निरादर शब्द,अवग्या,धक्का देना,अनदेखा करना, अवोइड करना, इग्नोर करना साधु के शब्दकोश में नहीं होता।।मुक्ति इतनी महिमा वंत पद है। और कई पर्यायवाची शब्द भी मिले हैं जैसे कि:मोक्ष-मोह का क्षय हो जाए उसी को मैं मोक्ष कहता हूं।मुक्ति भूमि नहीं भूमिका है।। साधक की अवस्था का नाम है। अष्टावक्र गीता जो क्लिस्ट ग्रंथ है,जनक के दरबार में अष्टावक्र आए तो राजसभा में पंडित लोग हंसने लगे,मजाक किया अष्टावक्र मुस्कुरा कर बोला ए जनक! में गलत जगह पर आ गया यहां तो सब चर्मकार बैठे हैं!ज्ञानी कहां है!!और जनक ने ३ प्रश्न पूछे: ज्ञान कैसे प्रगट हो ?मुक्ति कैसे प्राप्त हो? वैराग्य का जन्म कैसे हो? पूछने योग्य तीन ही बात है बाकी सब बकवास है। तर्क की दुनिया में एक पूछता है दूसरा काट देता है सब टाइमपास है।यदि पूछना चाहे तो ज्यादा से ज्यादा ७ प्रश्न ही पूछे।। और फिर जवाब क्रम में नहि मिले। महापुरुषों की वाणी में अनुवाद नहीं अनुनाद होता है।। गुरु जो बोले वह अनुनाद ही करना,अपनी कोई बुद्धि तर्क वितर्क न करना, जैसे बालक दर्पण के सामने चेष्टा करें तो उसका प्रतिबिंब वही चेष्टा करेगा। मोक्ष पाना है तो सभी विषय को विषवत- विष की तरह छोड़ दे। लेकिन हम देहधारी वह विदेह है। हम जैसे नहीं छोड़ सकते।भंवरा चंपा के पुष्प पर बैठता नहीं आसपास मंडराता गुनगुनाता है वैसे ही भोजन त्याग नहीं,ठाकुर को भोग लगाकर प्रसाद के रूप में ले! अच्छे कपड़े पहनना,अच्छे गहने पहने कोई आलोचना नहीं होनी चाहिए मगर ठाकुर को सजाकर करो!
 चंपा तुझ में तीन गुण, रूपरंग और बास एक अवगुण एसो भयो भवर न आवे पास।
तो हम यह नेगेटिव बात छोड़ दे,कुछ  छूटे तो मोक्ष नहीं लेकिन कुछ ग्रहण करें तो मुक्ति हो।। तो यहां पांच अमृत,जैसे वहां पंच विष को त्याग को कहा है और यह पंचामृत:-क्षमा जीते जी मुक्ति चाहिए तो यह अमृत है।बापू ने बताया की स्वभाव चार प्रकार के होते हैं:विरोधी स्वभाव,बोधी स्वभाव,निरोधी स्वभाव और सुबोध स्वभाव। बापू ने कहा कि आज कल रात भर सोता नहीं। रात भर पीता हूं और पिलाता हूं!दो ही काम करता हूं। तो क्या पीता हूं मैं और क्या पिला रहा हूं?रात भर सोमरस पीते हैं, गलत अर्थ मत करना यह मदिरा नहीं, शराब नहीं लेकिन चंद्र जो अमृत बरसाता है वनस्पति और औषधि दोनों को रस देता है जैसे तुलसी वनस्पति भी है और औषधि भी,यदि आप गलत अर्थ निकाल ले तो अपनी आपकी जिम्मेदारी है।राम नाम का रस वही सोमरस है।यह पीना और दुनिया को पिलाना।। क्षमा करने का मतलब बलिदान करना बदला नहीं लेना।क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को उत्पात। बड़े क्षमा ही करते हैं और छोटा उत्पात ही करेगा यहां निंदा करने के भी नेटवर्क होते हैं और निंदा करने के भी दाम चूकाये जाते है!दूसरा:सरलता- कोमलता तीसरा अमृत दया,चौथा तोष-संतोष और पांचवा सत्य।। ये सूत्र कठिन भी बहुत और सरल भी बहुत है। कुछ वस्तु कठिन से कठिन है कुछ लोगों के लिए और वही सरल से सरल है कुछ लोगों के लिए!!शुद्ध मुक्ति शब्द तीन बार जो श्लोक है।। और फिर ४ बार मुकुति शब्द जो लोक है।। यही मुक्ति शब्दों को आगम वाले जीवनमुक्ति कहते हैं, कबीर जैसे निर्वाण कहते हैं,परम गति भी कहते हैं।। यहां निरादर शब्द रास नहीं मुक्ति को हटाकर भक्ति करो यह अवहेलना है यहां निरादर शब्द उपेक्षा नहीं लेकिन समजीये की एक राजमार्ग है जहां पहुंचे हुए लोग जा सकते हैं और एक छोटी सी पगडंडी है वहां दीन-हींन लोग जाते हैं दोनों रास्ते वही जाते हैं। लेकिन दीन हीन लोग और समर्थ लोग राजमार्ग को छोड़कर पगडंडी पर चलते हैं तो यह अवहेलना नहीं है। सयाना का मतलब अपनी औकात से वाकीफ और फिर कथा प्रवाह में वंदना प्रकरण में नाम वंदना,राम नाम की वंदना।मंत्र में शक्ति है लेकिन श्रद्धा का बल मिले तब मंत्र और बलवर बनता है। राम नाम महिमा का थोड़ा सा गान करके आज की कथा को विराम दिया गया।।
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सद्गुरु क्या नही देता....
वो बेठता है..तो कैलाश होता है 
वो चलता है..तो 'याग्यवलक्य होता है 
वो उठता है...तो 'भुसुंडी' होता है 
और वो अपनी स्वाभाविक ह्रदय की दीनता में डूबता है....तो 'तुलसी' बन जाता है,,,
- पु.बापू
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रक्ताम्भोजदलाभिरामनयनं पीताम्बरालङ्कृतम्
श्यामाङ्गं द्विभुजं प्रसन्नवदनं श्रीसीतया शोभितम्। कारुण्यामृतसागरं प्रियगणैर्धात्रादिभिर्भावितं
वन्दे विष्णुशिवादिसेव्यमनिशं भक्तेष्टसिद्धिप्रदम्॥
[३]
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emotional shayari

Copied
जरुरी नहीं है फरिश्ता होना ,
इंसा का काफी है इंसा होना

हकीकत ज़माने को अब रास नहीं आती,
एक गुनाह सा हो गया है आईना होना

बाद में तो… कारवां बनते जाते है,
बहुत मुश्किल है लेकिन पहला होना

हवाओं के थपेड़े झेलने पड़ते है, ऊंचाई पे,
तुम खेल समझ रहे हो परिंदा होना

ये लोग, जीते जी मरे जा रहे हैं,
मैं चाहता हूँ मौत से पहले जिंदा होना

अपनी गलतियों पे भी नज़रे झुकती नहीं अब,
लोग भूलने लगे हैं शर्मिंदा होना .......l
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hindi shayari # emotional shayari

तेरी यादों की चिड़िया 
अक्सर बैठ जाती है मन की मुंडेर पर
कुछ लम्हे गुलेल दागते हैं
भगाते हैं उसे..
फिर कुछ दाने लम्हों के 
...........बैठ जाते हैं!!!
उसके आगे बिखेर  कर
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मैं तो  माटी  का  एक हिस्सा  था बेरस
 पावन गंगा ने आकर बनाया मुझे बनारस.
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            “काश...वो ये समझ पाता,

   कि कम्बख़्त "काश" से रोज कितना लड़ते हैं हम।”
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हरे कृष्ण # hare krishna


               भगवान तुझे सुनते हैं 
*मीरा जी जब भगवान कृष्ण के लिए गाती थी तो भगवान बड़े ध्यान से सुनते थे।*

*सूरदास जी जब पद गाते थे तब भी भगवान सुनते थे।* 

*और कहाँ तक कहूँ कबीर जी ने तो यहाँ तक कह दिया:- चींटी के पग नूपुर बाजे वह भी साहब सुनता है।*

*एक चींटी कितनी छोटी होती है अगर उसके पैरों में भी घुंघरू बाँध दे तो उसकी आवाज को भी भगवान सुनते है।*

*यदि आपको लगता है की आपकी पुकार भगवान नहीं सुन रहे तो ये आपका वहम है या फिर आपने भगवान के स्वभाव को नहीं जाना।*

*कभी प्रेम से उनको पुकारो तो सही, कभी उनकी याद में आंसू गिराओ तो सही।*

*संत तो यहाँ तक कहते ह की केवल भगवान ही है जो आपकी बात को सुनता है।*

*एक छोटी सी कथा संत बताते है:-*

*एक भगवान जी के भक्त हुए थे, उन्होंने 20 साल तक लगातार भगवत गीता जी का पाठ किया।*

अंत में भगवान ने उनकी परिक्षा लेते हुऐ कहा:- अरे भक्त! तू सोचता है की मैं तेरे गीता के पाठ से खुश हूँ, तो ये तेरा वहम है।*
मैं तेरे पाठ से बिलकुल भी प्रसन्न नही हुआ।

*जैसे ही भक्त ने सुना तो वो नाचने लगा, और झूमने लगा।*

*भगवान ने बोला:- अरे! मैंने कहा की मैं तेरे पाठ करने से खुश नही हूँ और तू नाच रहा है।*

वो भक्त बोला:- भगवान जी आप खुश हो या नहीं हो ये बात मैं नही जानता।*
लेकिन मैं तो इसलिए खुश हूँ की आपने मेरा पाठ कम से कम सुना तो सही, इसलिए मैं नाच रहा हूँ।

ये होता है भाव....

थोड़ा सोचिये जब द्रौपती जी ने भगवान कृष्ण को पुकारा तो क्या भगवान ने नहीं सुना?*
भगवान ने सुना भी और लाज भी बचाई।*

जब गजेन्द्र हाथी ने ग्राह से बचने के लिए भगवान को पुकारा तो क्या भगवान ने नहीं सुना?*
बिल्कुल सुना और भगवान अपना भोजन छोड़कर आये।*

कबीरदास जी तुलसीास जी सूरदास जी, मीरा बाई जी जाने कितने संत हुए जो भगवान से बात करते थे और भगवान भी उनकी सुनते थे।*

इसलिए जब भी भगवान को याद करो उनका नाम जप करो तो ये मत सोचना की भगवान आपकी पुकार सुनते होंगे या नहीं?*

*कोई संदेह मत करना, बस ह्रदय से उनको पुकारना, तुम्हे खुद लगेगा की हाँ, भगवान आपकी पुकार को सुन रहे है..!!*

           एक बात जो मन को व्यथित कर गई 

 मेरे घर के पास ही मां चामुंडा देवी का शक्तिपीठ है जहां पर गीता प्रेस की एक दुकान भी मंदिर के अंदर ही चलाई जाती है। मुझे आज बहुत आश्चर्य हुआ कि वहां पर बहुत ही कम संख्या में किताबें उपलब्ध थी। रामचरितमानस की कुछ प्रतियां चाहिए थी परंतु रामचरितमानस वहां पर अर्थ सहित उपलब्ध ही नहीं था।   विनय पत्रिका खरीदने के बारे में सोच रही थी तो मेरी नजर विनय पत्रिका पर पड़ी और मैंने वहां से एक विनय पत्रिका की प्रति ली मैंने उसको खोला तो उसके पहले ही पृष्ठ पर एक नित्य प्रार्थना लिखी हुई थी जो मुझे बहुत पसंद आई और मैंने उसे एक तस्वीर का रूप देने का प्रयास किया है, जो आपके समक्ष है।
 कामना करती हूं कि जल्दी ही गीता प्रेस के खुले हुए देश में जितने भी स्टोर हैं वह सब किताबों से भर जाएं और पुस्तके हमें गीता प्रेस से हमेशा उपलब्ध होती रहें इसी मंगल कामना के साथ आप सबके समक्ष प्रस्तुत है ...नित्य प्रार्थना..



                    नित्य प्रार्थना
    कर प्रणाम तेरे चरणोंमें लगता हूँ अब तेरे काज।
     पालन करनेको आज्ञा तव मैं नियुक्त होता हूँ आज॥
      
  अंतरमें स्थित रहकर मेरे बागडोर पकड़े रहना।
      निपट निरंकुश चंचल मनको सावधान करते रहना॥
      
 अन्तर्यामीको अन्तःस्थत देख सशंकित होवे मन।
      पाप-वासना उठते ही हो नाश लाजसे वह जल- भुन ॥
       
 जीवोंका कलरव जो दिनभर सुननेमें मेरे आवे।
      तेरा ही गुणगान जान मन प्रमुदित हो अति सुख पावे॥
    
  तू ही है सर्वत्र व्याप्त हरि तुझमें यह सारा संसार।
        इसी भावनासे अंतरभर मिलूँ सभीसे तुझे निहार ॥
      
प्रतिपल निज इन्द्रियसमूहसे जो कुछ भी आचार करूँ।
     केवल तुझे रिझानेको, बस तेरा ही व्यवहार करूँ ॥
                                         (भजन-संग्रहसे)                                                                   shayaripub.com.      

emotional shayari

लिखते लिखते तुझे मैं खुद से जुदा हो बैठा।
दर्द  दे -  दे  मुझे  तू  मेरा  खुदा  हो बैठा।।

इतना  मसरूफ़  हो गया  तेरी  मोहब्बत में।
मैं 'अल्पेश' खुद के घर का  पता  खो बैठा।।

गैरों से क्या गिला जब दिल मेरा मेरा न हुआ।
दिल का मेरे एक टुकड़ा मुझसे खफ़ा हो बैठा।।

जीने मरने की साथ बातें जो करता था कभी।
मेरा  अब  वो ही  चहीता  भी  गैर हो बैठा।।


दिल में कितनी 
      ख्वाहिशें हैं ,
            कैसे मैं समझाऊं ?

सामने मेरे 
        तुम रहो बस ,
             मैं, तुमको देखे जाऊं। !!
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emotional shayari


किसी ने खूब लिखा लेखक का तो मुझे पता नहीं पर.लिखा ग़ज़ब है 


तेरे कदमो पे सर होगा, कजा सर पे खडी होगी,
फिर उस सजदे का क्या कहना अनोखी बन्दगी होगी,

नसीम-ए-सुबह गुनशन में गुलो से खेलती होगी,
किसी की आखरी हिच्चकी किसी की दिल्ल्गी होगी,

दिखा दुँगा सर-ए-महफिल, बता दुँगा सर-ए-महशिल,
वो मेरे दिल में होगें और दुनिया देखती होगी,

मजा आ जायेगा महफ़िल में फ़िर सुनने सुनाने का,
जुबान होगी वहाँ मेरी कहानी आप की होगी,

तुम्हे दानिश्ता महफ़िल में जो देखा हो तो मुजरिम,
नजर आखिर नजर है बेइरादा उठ गई होगी,



लिखते लिखते तुझे मैं खुद से जुदा हो बैठा।
दर्द  दे -  दे  मुझे  तू  मेरा  खुदा  हो बैठा।।

इतना  मसरूफ़  हो गया  तेरी  मोहब्बत में।
मैं 'अल्पेश' खुद के घर का  पता  खो बैठा।।

गैरों से क्या गिला जब दिल मेरा मेरा न हुआ।
दिल का मेरे एक टुकड़ा मुझसे खफ़ा हो बैठा।।

जीने मरने की साथ बातें जो करता था कभी।
मेरा  अब  वो ही  चहीता  भी  गैर हो बैठा।।


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emotional shayari

               हवा का झोंका जो तुझे छू के आता है
          बिना पूछे मुझे तेरा क्यों? दर्द-ए-दिल सुनाता है
                  सुबह की किरणें तुझे जो देख कर
                                यूं मुस्कुराती हैं
                          तेरी रातों के सारे राज
                        मुझ पर खोल जाती हैं......

                       ..कभी गर्मी कभी सर्दी
                    जो मौसम ..लेकर आता है
       तेरे जलवों की बातें कर मुझे अक्सर जलाता है
                     तू जिन राहों पे जाती है
                   वह पलकों को बिछा करके
                           तेरा पता दे जाती हैं ..
                       जमाने से छुपा कर के।।
                                          अचलाएस गुलेरिया 
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ram satuti # जय सियाराम

            मां कौशल्या द्वारा भगवान की स्तुति

     भए प्रगट कृपाला दीन दयाला कौशल्या हितकारी
      ।।हर्षित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी।।
    
लोचन अभिरामा तनु घनश्यामा निज आयुध भुज चारी
     भूषन वनमाला नयन विशाला शोभा सिंधु खरारी।।

कर दुई कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता
 माया गुण ज्ञाना तीत अमाना वेद पुरान भनंता ।।

करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावही श्रुति संता
 सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता।।

 ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीरमति थिरनरहै।।

उपजाजब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुतविधि किन्ह चहै
कहि कथा सुहाई मातु बुझाई यही प्रकार सुत प्रेम लहै।।

माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा
कीजै सीसु लीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा।।
 
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होई बालकसुर भूपा
यह चरित जो गावेहिं हरि पद पावहिं तेन परहिं भवकूपा।
      
🌹 विप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार
          निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार 🌹
             
              *ये मानस ही मेरा सनम है।।*
*भजन, ज्ञान,रामकथा,साधुसंग और कथाकार ये है मक्तिद्वार।।*
*मुक्ति का ग्रेटेस्ट डोर है:गुरु।।*
 यहां की जबरदस्त चेतनाओं को प्रणाम करते हुए तीसरे दिन की कथा पर बापू ने बताया कि परम बुद्ध पुरुष अष्टावक्र का मंत्र अनुरणन किया जाए:
*कथं ज्ञानंमाप्योति कथं मुक्तिर् भविष्यति वैराग्यं च कथं प्राप्तमेतद् बृहिमम् प्रभो*
 जहां जनक ने प्रभु शब्द कहकर प्रश्न पूछे। यह प्रभु शब्द समर्थ भाववाचक है।यह ग्रंथ बहूत क्लिस्ट है,लेकिन  संस्कृत बहुत सरल है।तुलसी जी ने इन तीनों प्रश्नों का जवाब एक पंक्ति में दिया है।। याज्ञवल्क्य ने भी जवाब दिए हैं। हमें अष्टावक्र दूर पड़ता है यह त्रेता युगीय घटना, कालका फांसला और तुलसी कालगणना में करीब चार सौ पांचसो साल।वह नेपाल का प्रदेश और तुलसी हमारे भारत में और हमारी लोक बोली में करीब पड़ते हैं।एक ही पंक्ति में तीनों का जवाब तुलसी जी यह है मेरा सलमा बापू ने कहा कि सनम को प्यार से सनमा!सनम को प्यार से सनमा कहते हैं सनमा का उल्टा है मानस।। यही मेरा बलमा है और आज मस्तों की फकीरी सभा में बलमा वाली पंक्तियां:जहां सोई थी, खोई थी, नींद खुली तो बहुत रोई थी, कंकड़ी गुरु ने मारी...आध्यात्मिक ऊंचाई पर ले गए। सब मस्त है।। बापू बोले की कभी सिर्फ महात्मा ही बैठे हैं और कोई ना हो ऐसी एक कथा करनी है और फिर मेरे त्रिभुवन गुरु की कृपा से ऐसे अर्थ लगाने हैं कि कोई मना न कर सके!! बापू ने बताया कि अमियामूरिमय चूरन चारु.. यानी कि गुरु अष्टक हिंग्वाष्टक है। गुरु पाचक है। बापू ने कहा कि कई बार देखा है कि बड़े कलाकार अपने से छोटे कलाकार को संगति नहीं देते, बजाने में गाने में। लेकिन वह भंवर गीत का दृश्य जहां भंवरा गा रहा है और कृष्ण उसे बांसुरी से संगति दे रहे हैं! फिर गोपी गीत,भंवर गीत और कृष्ण लीला के कई प्रसंगों की सजल बातें हुई।।तो ऐसे तुलसी के मानस ग्रंथ को किस ग्रंथ के साथ जोड़ुं? किसके साथ तोलूं? तुलसी जी ने भी क्रम बदल दिया है जवाब देने में। बापू ने बताया कि तालगाजरडा के पास भी मुक्ति के कुछ दरवाजे है:एक द्वार हे रामभजन। दूसरा है ज्ञान-मोक्ष का द्वार है लेकिन यह ज्ञान कहां से आता है?योग से आता है।बापू ने कहा की योग के कई प्रकार है पतंजलि योग,राजयोग, हठयोग यह तो है ही। लेकिन मेरे लिए योग का मतलब किसी बुध्धपुरुष का संयोग और ऐसे साधु का योग ज्ञान की उपलब्धि है।तीसरा राम कथा मोक्ष का द्वार है।। चौथा साधु संग मोक्ष का द्वार है- और साधु कौन है? धरती सहन कर सके इन से भी ज्यादा जो सहन करें वह साधु,करुणा से भरा हो वह साधु, कठोर और कर्कश कभी ना बन पाए वह साधु,प्राणी मात्र को जो हित इच्छता हो,अजातशत्रु शब्द अर्थ के बारे में बापू ने कहा कि हमने इस शब्द का गलत अर्थ निकाला है।दुनिया है तो शत्रु पैदा होगा ही। लेकिन तलगाजरड़ी शब्दकोश कहता है कि किसी के प्रति किसी के भी प्रति शत्रुता पैदा ना हो वह अजातशत्रु साधु।कपिल गीता में भी कहा गया कि विवेकी जन  ऐसे वैसे में आसक्त हो और ऐसी आ सकती किसी साधु में हो जाए तो यह मोक्ष का दरवाजा खोल देता है। वैसे वो सात भूमि अयोध्या,कांची आदि मुक्ति की भूमि है और अष्टावक्र वाली बात भी है लेकिन और सब एक और रखते हुए। मोक्ष का सबसे बड़ा ग्रेटेस्ट डोर है:गुरु ।।गुरु मां भी हो सकती हे,पिता भी हो सकता है, बेटा गुरु हो सकता है,मित्र भी हो सकता है, पत्नी या नारी भी गुरु बन सकती है।बापू ने बताया कि भीष्म पर्व में चार 'ग' कार मोक्ष का दरवाजा बताया गीता,गंगा,गायत्री और गोविंद।। जो संध्या करते हैं उसे गायत्री करना ही पड़ता है लेकिन नहि भी करते हो तो भी २४ बार ना हो सके तो एक बार गायत्री मंत्र का जाप करो क्योंकि यह मोक्ष का द्वार है।। 
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                       हिन्दी शायरी दिल से 

 

Good evening

कौन समझेगा यहां की वीरानी देख के... इस जगह भी ठहरे थे  कभी काफ़िले मोहब्बत के...... Shayaripub.in पूछा जो उसने कैसे रहोगे ताउम्र तुम मेरे सा...