hare krishna

*भजगोविन्दं भजगोविन्दं, गोविन्दं भज मूढमते।*
*नामस्मरणादन्यमुपायं, नहि पश्यामो भवतरणे॥*

*योगरतो वा भोगरतो वा, सङ्गरतो वा सङ्गविहीनः।*
*यस्य ब्रह्मणि रमते चित्तं, नन्दति नन्दति नन्दत्येव॥*
*भजगोविन्दं भजगोविन्दं* 


*हे मूढ़मते ! गोविंद को भजो, गोविन्द का नाम लो, गोविन्द से प्रेम करो क्योंकि भगवान के नाम जप के अतिरिक्त इस भव-सागर से पार जाने का अन्य कोई मार्ग नहीं है, कोई योग में लगा हो या भोग में, संग में आसक्त हो या निसंग हो, पर जिसका मन ब्रह्म में लगा है वो ही आनन्द  का अनुभव करता है।*


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shayari

      🌷मन को बदल दो हालात बदल जाएँगे 🌷
        नज़र को बदल दो नज़ारे बदल जाएँगे🌷
        🌷सोच को बदल दो सितारे बदल जाएँगे
         कश्ती बदलने की ज़रूरत नहीं साहिब🌷
         🌷दिशा को बदल दो किनारे बदल जाएँगे🌷
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नज्मों से न तोला करो मेरे जज़्बातों को
कागज़ पर उतारने में और
 दिल से गुज़रने में फर्क होता है
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shayari,

मुझ पर भरोसा नहीं है तो रिश्ता क्यों?
 सच है तू बुलंद आवाज में कहो
.... इतना आहिस्ता क्यों? 
            अचला 
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तुम्हारी  आरज़ू  में  गर  सभी  अरमान  दे दे तो ।
तुम्हें  भगवान  सा  पूजे  अगर  ईमान  दे  दे  तो ।
मिले हम सा अगर कोई तो हमसे भी मिला देना  
तुम्हारे  वास्ते   कोई अगर  जान  दे  दे तो


Good night

फिक्र ना करो हम कोई जंजीर नहीं है 

            कि पाँव से लिपट जाएंगे हमे तों मुहब्बत हैं 

खाक बनके तेरी राहों में बिखर जाएंगे
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Goodmorning

हर इश्क का बस यही अंजाम होता है,
कोई अजनबी से खास और फिर आम होता है.
🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼
शहर महंगा बहोत है और मैं कर्जे में हूँ,
सो अब दिलों में ही रहने का इंतज़ाम होता है.
🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼
शोहरत कुछ इस कदर कमाई है हमने,
गुनाह कोई करे हम पे ही इल्ज़ाम होता है.
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 फिक्र ना करो हम कोई जंजीर नहीं है 

            कि पाँव से लिपट जाएंगे हमे तों मुहब्बत हैं 

राख बनके तेरी राहों में बिखर जाएंगे
                 Hindi shayari dil se 

Good night

🌷इश्क का बस यही अंजाम होता है,🌷
🌷कोई अजनबी से खास और फिर आम होता है.🌷

🍁शहर महंगा बहुत है और मैं कर्जे में हूँ,🍁
🍁सो अब दिलों में  रहने का इंतज़ाम होता है.🍁

🌷शोहरत कुछ इस कदर कमाई है हमने,🌷
🌷गुनाह कोई करे हम पे ही इल्ज़ाम होता है.🌷
                 🌷Good night🌷

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🌼अधर-रस मुरली लुूटन लागी।🌼
जा रस कौं षट रितु तप कीन्ही, सो रस पियति सभागी।
कहाँ रही, कहेँ तैं यह आई, कौने याहि बुलाई ?
चक्रित भई कहति ब्रजवासिनि यह तौं भली न आई ।।
सावधान क्यौं होति नहीं तुम, उपजी बुरी बलाई ।
सूरदास प्रभु हम पर ताकौ, कीन्हौ सौति बजाई ।।


मुरली के प्रति सौतिया डाह मानती हुई गोपियां परस्पर चर्चा करती हुई कहती हैं कि हे सखी ! यह मुरली तो प्रिय कृष्ण के अधरों का रसपान करने लगी है; जिस अधरामृत को पान
करने की अभिलाषा में हमने छ. ऋ्तुओं का तप किया है, उसी अधरामृत को सभागी (सोभाग्यशालिनी) बनकर यह मुरली पी रही है। हे सखी हम तो कृष्ण के साथ बालपन से हैं, तब से तो यह नहीं
थी, फिर यह मुरली (हमारी सौत वनकर) अव तक कहां रही ? और अब कहां से आई है ? और इसे यहां बुलाया किसने है ? ब्रजबालाएं जितना-जितना मुरली के सम्बन्ध में सोचती हैं, उतनी-उतनी
भ्रमित और परेशान हो रही हैं, वे कहती हैं कि इस मुरली का आना और इस प्रकार कृष्ण पर एकाधिकार
जमा कर उनका अधरामृत पीना हम लोगों के लिए अच्छा संकेत नहीं है; तुम सब उसकी करतूतों को देखते हुए सावधान क्यों नहीं हो जातीं और इससे छुटकारा पाने का समय रहते उपाय क्यों नहीं
सोचती, क्योंकि यह तो हमारे और कृष्ण के प्रेम के बीच बहुत बुरी बला पैदा हो गई है। सूरदास कहते हैं कि लगता है कि जैसे कृष्ण ने इस मुरली को हमारे ऊपर सौत के रूप में घोषित कर दिया
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Good night

इतनी ठोकरे देने के लिए                 शुक्रिया ए-ज़िन्दगी,  चलने का न सही         सम्भलने का हुनर तो आ गया ।। Shayaripub.in