emotional shayari

लिखते लिखते तुझे मैं खुद से जुदा हो बैठा।
दर्द  दे -  दे  मुझे  तू  मेरा  खुदा  हो बैठा।।

इतना  मसरूफ़  हो गया  तेरी  मोहब्बत में।
मैं 'अल्पेश' खुद के घर का  पता  खो बैठा।।

गैरों से क्या गिला जब दिल मेरा मेरा न हुआ।
दिल का मेरे एक टुकड़ा मुझसे खफ़ा हो बैठा।।

जीने मरने की साथ बातें जो करता था कभी।
मेरा  अब  वो ही  चहीता  भी  गैर हो बैठा।।


दिल में कितनी 
      ख्वाहिशें हैं ,
            कैसे मैं समझाऊं ?

सामने मेरे 
        तुम रहो बस ,
             मैं, तुमको देखे जाऊं। !!
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emotional shayari


किसी ने खूब लिखा लेखक का तो मुझे पता नहीं पर.लिखा ग़ज़ब है 


तेरे कदमो पे सर होगा, कजा सर पे खडी होगी,
फिर उस सजदे का क्या कहना अनोखी बन्दगी होगी,

नसीम-ए-सुबह गुनशन में गुलो से खेलती होगी,
किसी की आखरी हिच्चकी किसी की दिल्ल्गी होगी,

दिखा दुँगा सर-ए-महफिल, बता दुँगा सर-ए-महशिल,
वो मेरे दिल में होगें और दुनिया देखती होगी,

मजा आ जायेगा महफ़िल में फ़िर सुनने सुनाने का,
जुबान होगी वहाँ मेरी कहानी आप की होगी,

तुम्हे दानिश्ता महफ़िल में जो देखा हो तो मुजरिम,
नजर आखिर नजर है बेइरादा उठ गई होगी,



लिखते लिखते तुझे मैं खुद से जुदा हो बैठा।
दर्द  दे -  दे  मुझे  तू  मेरा  खुदा  हो बैठा।।

इतना  मसरूफ़  हो गया  तेरी  मोहब्बत में।
मैं 'अल्पेश' खुद के घर का  पता  खो बैठा।।

गैरों से क्या गिला जब दिल मेरा मेरा न हुआ।
दिल का मेरे एक टुकड़ा मुझसे खफ़ा हो बैठा।।

जीने मरने की साथ बातें जो करता था कभी।
मेरा  अब  वो ही  चहीता  भी  गैर हो बैठा।।


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emotional shayari

               हवा का झोंका जो तुझे छू के आता है
          बिना पूछे मुझे तेरा क्यों? दर्द-ए-दिल सुनाता है
                  सुबह की किरणें तुझे जो देख कर
                                यूं मुस्कुराती हैं
                          तेरी रातों के सारे राज
                        मुझ पर खोल जाती हैं......

                       ..कभी गर्मी कभी सर्दी
                    जो मौसम ..लेकर आता है
       तेरे जलवों की बातें कर मुझे अक्सर जलाता है
                     तू जिन राहों पे जाती है
                   वह पलकों को बिछा करके
                           तेरा पता दे जाती हैं ..
                       जमाने से छुपा कर के।।
                                          अचलाएस गुलेरिया 
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ram satuti # जय सियाराम

            मां कौशल्या द्वारा भगवान की स्तुति

     भए प्रगट कृपाला दीन दयाला कौशल्या हितकारी
      ।।हर्षित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी।।
    
लोचन अभिरामा तनु घनश्यामा निज आयुध भुज चारी
     भूषन वनमाला नयन विशाला शोभा सिंधु खरारी।।

कर दुई कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता
 माया गुण ज्ञाना तीत अमाना वेद पुरान भनंता ।।

करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावही श्रुति संता
 सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता।।

 ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीरमति थिरनरहै।।

उपजाजब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुतविधि किन्ह चहै
कहि कथा सुहाई मातु बुझाई यही प्रकार सुत प्रेम लहै।।

माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा
कीजै सीसु लीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा।।
 
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होई बालकसुर भूपा
यह चरित जो गावेहिं हरि पद पावहिं तेन परहिं भवकूपा।
      
🌹 विप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार
          निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार 🌹
             
              *ये मानस ही मेरा सनम है।।*
*भजन, ज्ञान,रामकथा,साधुसंग और कथाकार ये है मक्तिद्वार।।*
*मुक्ति का ग्रेटेस्ट डोर है:गुरु।।*
 यहां की जबरदस्त चेतनाओं को प्रणाम करते हुए तीसरे दिन की कथा पर बापू ने बताया कि परम बुद्ध पुरुष अष्टावक्र का मंत्र अनुरणन किया जाए:
*कथं ज्ञानंमाप्योति कथं मुक्तिर् भविष्यति वैराग्यं च कथं प्राप्तमेतद् बृहिमम् प्रभो*
 जहां जनक ने प्रभु शब्द कहकर प्रश्न पूछे। यह प्रभु शब्द समर्थ भाववाचक है।यह ग्रंथ बहूत क्लिस्ट है,लेकिन  संस्कृत बहुत सरल है।तुलसी जी ने इन तीनों प्रश्नों का जवाब एक पंक्ति में दिया है।। याज्ञवल्क्य ने भी जवाब दिए हैं। हमें अष्टावक्र दूर पड़ता है यह त्रेता युगीय घटना, कालका फांसला और तुलसी कालगणना में करीब चार सौ पांचसो साल।वह नेपाल का प्रदेश और तुलसी हमारे भारत में और हमारी लोक बोली में करीब पड़ते हैं।एक ही पंक्ति में तीनों का जवाब तुलसी जी यह है मेरा सलमा बापू ने कहा कि सनम को प्यार से सनमा!सनम को प्यार से सनमा कहते हैं सनमा का उल्टा है मानस।। यही मेरा बलमा है और आज मस्तों की फकीरी सभा में बलमा वाली पंक्तियां:जहां सोई थी, खोई थी, नींद खुली तो बहुत रोई थी, कंकड़ी गुरु ने मारी...आध्यात्मिक ऊंचाई पर ले गए। सब मस्त है।। बापू बोले की कभी सिर्फ महात्मा ही बैठे हैं और कोई ना हो ऐसी एक कथा करनी है और फिर मेरे त्रिभुवन गुरु की कृपा से ऐसे अर्थ लगाने हैं कि कोई मना न कर सके!! बापू ने बताया कि अमियामूरिमय चूरन चारु.. यानी कि गुरु अष्टक हिंग्वाष्टक है। गुरु पाचक है। बापू ने कहा कि कई बार देखा है कि बड़े कलाकार अपने से छोटे कलाकार को संगति नहीं देते, बजाने में गाने में। लेकिन वह भंवर गीत का दृश्य जहां भंवरा गा रहा है और कृष्ण उसे बांसुरी से संगति दे रहे हैं! फिर गोपी गीत,भंवर गीत और कृष्ण लीला के कई प्रसंगों की सजल बातें हुई।।तो ऐसे तुलसी के मानस ग्रंथ को किस ग्रंथ के साथ जोड़ुं? किसके साथ तोलूं? तुलसी जी ने भी क्रम बदल दिया है जवाब देने में। बापू ने बताया कि तालगाजरडा के पास भी मुक्ति के कुछ दरवाजे है:एक द्वार हे रामभजन। दूसरा है ज्ञान-मोक्ष का द्वार है लेकिन यह ज्ञान कहां से आता है?योग से आता है।बापू ने कहा की योग के कई प्रकार है पतंजलि योग,राजयोग, हठयोग यह तो है ही। लेकिन मेरे लिए योग का मतलब किसी बुध्धपुरुष का संयोग और ऐसे साधु का योग ज्ञान की उपलब्धि है।तीसरा राम कथा मोक्ष का द्वार है।। चौथा साधु संग मोक्ष का द्वार है- और साधु कौन है? धरती सहन कर सके इन से भी ज्यादा जो सहन करें वह साधु,करुणा से भरा हो वह साधु, कठोर और कर्कश कभी ना बन पाए वह साधु,प्राणी मात्र को जो हित इच्छता हो,अजातशत्रु शब्द अर्थ के बारे में बापू ने कहा कि हमने इस शब्द का गलत अर्थ निकाला है।दुनिया है तो शत्रु पैदा होगा ही। लेकिन तलगाजरड़ी शब्दकोश कहता है कि किसी के प्रति किसी के भी प्रति शत्रुता पैदा ना हो वह अजातशत्रु साधु।कपिल गीता में भी कहा गया कि विवेकी जन  ऐसे वैसे में आसक्त हो और ऐसी आ सकती किसी साधु में हो जाए तो यह मोक्ष का दरवाजा खोल देता है। वैसे वो सात भूमि अयोध्या,कांची आदि मुक्ति की भूमि है और अष्टावक्र वाली बात भी है लेकिन और सब एक और रखते हुए। मोक्ष का सबसे बड़ा ग्रेटेस्ट डोर है:गुरु ।।गुरु मां भी हो सकती हे,पिता भी हो सकता है, बेटा गुरु हो सकता है,मित्र भी हो सकता है, पत्नी या नारी भी गुरु बन सकती है।बापू ने बताया कि भीष्म पर्व में चार 'ग' कार मोक्ष का दरवाजा बताया गीता,गंगा,गायत्री और गोविंद।। जो संध्या करते हैं उसे गायत्री करना ही पड़ता है लेकिन नहि भी करते हो तो भी २४ बार ना हो सके तो एक बार गायत्री मंत्र का जाप करो क्योंकि यह मोक्ष का द्वार है।। 
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                       हिन्दी शायरी दिल से 

 

राम स्तुति # मानस स्तुति

             ब्रह्मादि देवोंद्वारा भगवान की स्तुति
जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता।
गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिंधुसुता प्रिय कंता॥

पालन सुर धरनी अद्धत करनी मरम न जानइ कोई।
जो   सहज कृपालादीनदयालाकरउअनुग्रह सोई॥

जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा।
अबिगत गोतीतम चरित पुनीतंमायारहित मुकुंदा।॥

जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगत मोह मुनिब्ंदा।
निसि बासर ध्यावहिं गुनगन गावहिं जयति सच्चिदानंदा।॥

जेहिं सृष्टि उपाई त्रबिध बनाई संग सहाय न दूजा
सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति ना पूजा

जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा।
मन बच क्रम बानी छाड़ि सयानी सरन सकल सुरजूथा।॥

सारद श्रति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहिं जाना।
   जेहि  दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवउ  सो श्रीभगवाना॥
  
 भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा।
मुनि सिद्धसकल सुर परमभयातुर नमत नाथ पद कंजा।॥
      
    जानि सभय सुर भूमि सुनि बचन समेत सनेह।
        गगनगिरा गंभीर भइ हरनि सोक संदेह॥
मेरे भाई बहन ..दुनिया में आत्मबल से भी ऊँचा है ..भजन बल...... 
विश्व का कोई श्रेष्ठ बल हो तो तलगाजरडी दृष्टि से है ..भजन बल .....
कुछ ज़्यादा सीखने की ज़रूरत नहीं है ...जो थोड़ा सीख गये हो ...भूल जाओ ....और राम नाम याद कर लो ....इतनी ही ज़रूरत है .....
हम ज़्यादा सीख गये हैं. ..खाली रहो ...और हरि नाम ....प्रभु का नाम ....

                               बापू के शब्द 

*मानस मुक्तिनाथ।।* दिन-३ दिनांक ९ अक्टूबर
*ये मानस ही मेरा सनमा है।।*
*भजन, ज्ञान,रामकथा,साधुसंग और कथाकार ये है मक्तिद्वार।।*
*मुक्ति का ग्रेटेस्ट डोर है:गुरु।।*
 यहां की जबरदस्त चेतनाओं को प्रणाम करते हुए तीसरे दिन की कथा पर बापू ने बताया कि परम बुद्ध पुरुष अष्टावक्र का मंत्र अनुरणन किया जाए:
*कथं ज्ञानंमाप्योति कथं मुक्तिर् भविष्यति वैराग्यं च कथं प्राप्तमेतद् बृहिमम् प्रभो*
 जहां जनक ने प्रभु शब्द कहकर प्रश्न पूछे। यह प्रभु शब्द समर्थ भाववाचक है।यह ग्रंथ बहूत क्लिस्ट है,लेकिन  संस्कृत बहुत सरल है।तुलसी जी ने इन तीनों प्रश्नों का जवाब एक पंक्ति में दिया है।। याज्ञवल्क्य ने भी जवाब दिए हैं। हमें अष्टावक्र दूर पड़ता है यह त्रेता युगीय घटना, कालका फांसला और तुलसी कालगणना में करीब चार सौ पांचसो साल।वह नेपाल का प्रदेश और तुलसी हमारे भारत में और हमारी लोक बोली में करीब पड़ते हैं।एक ही पंक्ति में तीनों का जवाब तुलसी जी यह है मेरा सलमा बापू ने कहा कि सनम को प्यार से सनमा!सनम को प्यार से सनमा कहते हैं सनमा का उल्टा है मानस।। यही मेरा बलमा है और आज मस्तों की फकीरी सभा में बलमा वाली पंक्तियां:जहां सोई थी, खोई थी, नींद खुली तो बहुत रोई थी, कंकड़ी गुरु ने मारी...आध्यात्मिक ऊंचाई पर ले गए। सब मस्त है।। बापू बोले की कभी सिर्फ महात्मा ही बैठे हैं और कोई ना हो ऐसी एक कथा करनी है और फिर मेरे त्रिभुवन गुरु की कृपा से ऐसे अर्थ लगाने हैं कि कोई मना न कर सके!! बापू ने बताया कि अमियामूरिमय चूरन चारु.. यानी कि गुरु अष्टक हिंग्वाष्टक है। गुरु पाचक है। बापू ने कहा कि कई बार देखा है कि बड़े कलाकार अपने से छोटे कलाकार को संगति नहीं देते, बजाने में गाने में। लेकिन वह भंवर गीत का दृश्य जहां भंवरा गा रहा है और कृष्ण उसे बांसुरी से संगति दे रहे हैं! फिर गोपी गीत,भंवर गीत और कृष्ण लीला के कई प्रसंगों की सजल बातें हुई।।तो ऐसे तुलसी के मानस ग्रंथ को किस ग्रंथ के साथ जोड़ुं? किसके साथ तोलूं? तुलसी जी ने भी क्रम बदल दिया है जवाब देने में। बापू ने बताया कि तालगाजरडा के पास भी मुक्ति के कुछ दरवाजे है:एक द्वार हे रामभजन। दूसरा है ज्ञान-मोक्ष का द्वार है लेकिन यह ज्ञान कहां से आता है?योग से आता है।बापू ने कहा की योग के कई प्रकार है पतंजलि योग,राजयोग, हठयोग यह तो है ही। लेकिन मेरे लिए योग का मतलब किसी बुध्धपुरुष का संयोग और ऐसे साधु का योग ज्ञान की उपलब्धि है।तीसरा राम कथा मोक्ष का द्वार है।। चौथा साधु संग मोक्ष का द्वार है- और साधु कौन है? धरती सहन कर सके इन से भी ज्यादा जो सहन करें वह साधु,करुणा से भरा हो वह साधु, कठोर और कर्कश कभी ना बन पाए वह साधु,प्राणी मात्र को जो हित इच्छता हो,अजातशत्रु शब्द अर्थ के बारे में बापू ने कहा कि हमने इस शब्द का गलत अर्थ निकाला है।दुनिया है तो शत्रु पैदा होगा ही। लेकिन तलगाजरड़ी शब्दकोश कहता है कि किसी के प्रति किसी के भी प्रति शत्रुता पैदा ना हो वह अजातशत्रु साधु।कपिल गीता में भी कहा गया कि विवेकी जन  ऐसे वैसे में आसक्त हो और ऐसी आ सकती किसी साधु में हो जाए तो यह मोक्ष का दरवाजा खोल देता है। वैसे वो सात भूमि अयोध्या,कांची आदि मुक्ति की भूमि है और अष्टावक्र वाली बात भी है लेकिन और सब एक और रखते हुए। मोक्ष का सबसे बड़ा ग्रेटेस्ट डोर है:गुरु ।।गुरु मां भी हो सकती हे,पिता भी हो सकता है, बेटा गुरु हो सकता है,मित्र भी हो सकता है, पत्नी या नारी भी गुरु बन सकती है।बापू ने बताया कि भीष्म पर्व में चार 'ग' कार मोक्ष का दरवाजा बताया गीता,गंगा,गायत्री और गोविंद।। जो संध्या करते हैं उसे गायत्री करना ही पड़ता है लेकिन नहि भी करते हो तो भी २४ बार ना हो सके तो एक बार गायत्री मंत्र का जाप करो क्योंकि यह मोक्ष का द्वार है।।
 आज तीसरा और चौथा नवरात्र है गत साल इसी समय गिरनार पर बापू व्यास पीठ पर से साहजीक उतर कर गरबा लेने लगे थे। ऐसा ही एक अलौकिक दृश्य आज खड़ा हुआ। बापू ने बताया कि आज रुखड का भी जन्मदिन है और बापू व्यासपीठ से नीचे उतरे और सामने श्रोताओं को रास खेल रहे थे सब स्तब्ध हो गए।। वह अलौकिक दृश्य सभी झार झार रोए और बापू ने पूरी मान मर्यादा और गौरव से रास लिए,और फिर वहीं से आगे आकर संगीत मंडली के पास रास किया और फिर बैठे, तबले बजायें!और फिर और नीचे आकर श्रोताओं में आकर रास खेले।। फिर यहां आमंत्रित ब्राह्मण शास्त्री जी को ऊपर बुलाकर माताजी की स्तुति का गान करवाया और यथा योग्य सम्मान भी किया।। 
ऐसा दृश्य कतई देखने नहीं मिलता कई बार बापू कहते हैं कि कभी मैं इतने भाव में आ जाता हूं कि मैं खुद अपने वश में नहीं रहता और कब नीचे उतर जाउं कोइ ठिकाना नहि! और फिर आज यही दृश्य सबने दुनिया के १७२ देशों में बापू की कथा सुनने वालों ने देखा और सब आनंदित हो गई।। 
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                        हिन्दी शायरी दिल से

हरे कृष्ण # hare krishna


नन्दनन्दन परमानन्दकन्द मुरलीमनोहर
श्रीकृष्णचन्द्र अपने सखा ग्वाल-बालोंकी मृत्युरूप अघासुरके
मुखसे रक्षा करके उन्हें यमुना-पुलिनपर ले
उनसे कहने लगे- "हे मेरे सखाओ! यह कालिंदी पुलिन
यमुनातट कितना सुरम्य है। यहाँ हमलोगोंके क्रीडा करने
योग्य समग्र सामग्री विद्यमान है। यहाँ गद्दे समान
अत्यन्त सुकोमल और स्वच्छ बालुका--यामुनरेणु विछी
है। वृक्षोंपर बैठे पक्षी अत्यन्त मधुर ध्वनि कर रहे हैं।
दूसरी ओर विकसित कमलोंकी सुगन्धसे आकृष्ट होकर
भ्रमर गुंजन कर रहे हैं। मानो ये पक्षी और मधुप हमारा
स्वागतगान कर रहे हैं ।
समय अधिक हो गया हैहमलोग क्षुधार्त्त भी हैं, सुतरां हमें यहीं भोजन कर लेना चाहिए
हमारे गोवत्स- बछड़े पासमें ही पानी पीकर
धीरे-धीरे घास चरते रहें
"चरन्तु
शनकैस्तृणम् ॥'

(श्रीमद्धा० १०।१३।६

श्रीठाकुरजीके प्रिय सखाओं  ने कहा
कन्हैया भैया! ऐसा ही हो। तद्नन्तर उन्होने गोत्रों को
जल पिलाकर हरी-हरी घासोंमें छोड़ दिया।
समस्त सखा
श्रीभगवान् के सामने मण्डल बनाकर
बैठ गये। सबके मध्य में सबके प्यारे दुलारे, ऑँखोंके तारे श्रीकृष्णचन्द्रजी विराज रहे थे। सखाओंके नेत्र श्रीहरिके मुखको निहारकरआनन्दसे प्रफुल्लित हो रहे थे। यद्यपि सबका प्रभुकेसम्मुख होना सम्भव नहीं था तथापि श्रीहरिकी अचिन्त्यलीलाशक्तिने सबके सम्मुख सबके सामने लीलापुरुषोत्तम श्रीकृष्णचन्द्रको प्रकट कर दिया। व्रजेन्द्रन्दन श्रीकृष्णचन्द्रकामङ्गलमय मुखारविन्द प्रत्येक ग्वाल-बालकी ओर ही है।प्रत्येक सखाको प्रतीत हो रहा है--हमारा प्राणधन गोपालहमारी ओर स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखकर स्नेह सौहार्द्र की अजस्त्रधारा प्रवाहित करते हुए अवस्थित है-
"सहोपविष्टा
विपिने
विरेजु-
यथाम्भोरुहकर्णिकाया: ॥
आज ग्वाल-बालोंके भोजनपात्र भी अनोखे ही हैं।
कुछने कमलके पत्र आदिको लेकर अपना भोजनपात्र निर्मित
किया है। कुछने पवित्र कदली-पत्रको भोजनपात्र बनाया है।
कुछ गवाल-बालोंने प्रक्षालित प्रस्तरखण्डोंको ही अपने सामनेभोजनपात्रके लिये स्थापित कर लिया है।
श्रीकृष्णचन्द्रने अपनी मधुर वाणीसे कहा- हे समुज्ज्वल
निष्क-पदक धारण करनेवाले मेरे बन्धुओ! अपने-अपने
छीकों से सुन्दर सुस्वाद् भोजन -सामग्री निकालो-

भो भो भो भो उज्ज्वलनिष्का: निष्कासयत
भक्ष्य सामग्रीयमिति। ( श्रीआनन्दवृन्दावनचम्पू)


ज रवाल-बालोंके भोजनपात्र भी अनोखे ही हैं।
कुछने कमलके पत्र आदिको लेकर अपना भोजनपात्र निर्मित
य है। कछने पवित्र कदली-पत्रको भोजनपात्र बनाया है।
 गवाल-बालोंने प्रक्षालित प्रस्तरखण्डोंको ही अपने सामने
भजनपात्रके लिये स्थापित कर लिया है।
श्रीकृष्णचन्द्रने अपनी मधुर वाणीसे कहा- हे समुज्ज्वल
निष्क-पदक धारण करनेवाले मेरे बन्धुओ! अपने-अपने
छीकोसे सुन्दर सुस्वाद् भोजन -सामग्री निकालो-
भो भो भो भो उज्ज्वलनिष्का: निष्कासयत
भक्ष्य सामग्रीयमिति। ( श्रीआनन्दवृन्दावनचम्पू)

अपने प्राणसखा श्रीकृष्णचन्द्रके स्रेहिल वचनोंको
सुनकर सबने अपने अपने छींकेसे दही, भात, मीठा
मोदक, नमकीन, बड़ा, शाक भाजी, चटनी,
मुरब्बा, पायस आदि अनेक प्रकारके व्यअ्अन निकाले
और उन्हें पत्तों और पत्थरोंका पात्र बनाकर भोजन करने
लगे। सभी अपने- अपने भोजनोंके स्वादका वर्णन करते
थे। इस प्रकार हँसते -हँसाते भोजनानन्दका सब आनन्द
ले रहे थे। इस प्रकार सुखसागरमें निमग्र बालकवृन्द
भोजन करते हुए असीम आनन्दमें विभोर थे। स्वयं
करुणा-वरुणालय जगदीश्वररूपमें नित्य वर्तमान हैं, उनके सुखकी सीमाहो ही कैसेसकती है ?

आकाशपथ विमानोंसे परिपूर्ण हो गया है। इस
अभृतपूर्व अप्रतिम मनोहर छविका दर्शन देवसमाज अपने
सहज निमेषोन्मेषरहित अपलक नेत्रोंसे- अतृप्त नेत्रोंसे कर
रहा है। सर्वयज्ञभोक्ताका यह भोजन- ऐसा वात्सल्य-
रससम्पुटित स्वच्छन्द भोजनकालीन विहार क्या बार-बार
देखनेको मिल सकता है ?
                        🌹 भक्त 🌹  प्रहलाद🌹
हिरण्यकशिपु नामक एक प्रतापी दैत्य था। घोर तप करके उसने ब्रह्माजीसेदान प्राप्त कर लिया था कि मैं न मनुष्यसे मरू न पशुसे; न दिनमें मरूँरातमें; न घरमें मरू न बाहर और अस्त्र-शस्त्रसे भी न मरूँ!' यह वरदान पाकर उसने सभी देवताओंको जीत लिया। उसके अत्याचारसे तीनों लोक कांपने लगे। वह किसीको यज्ञ, जप, तप, भजन-पूजन नहीं करने देता था।
इसके पुत्र प्रह्लाद बड़े भगवद्भक्त थे। इसलिये वह नाना प्रकारके कष्ट देकर प्रहलादजीको मार डालनेका प्रयत्न करने लगा; परन्तु जब उसके सारे प्रयत्न निष्फल हो गये, तब प्रहलादजीको खम्भेमें बाँधकर उन्हें मारनेके लिये तलवार उठाकर बोला--'कहाँ हैं तेरे भगवान् ! अब आकर वे तुझे बचावें तो देखूँ। प्रहलादजीने कहा- ' भगवान् तो सर्वत्र हैं। वे मुझमें, आपमें, तलवारमें और इस खम्भेमें भी हैं। इतना सुनते ही हिरण्यकशिपुने खम्भेपर एक घूँसा मारा।उसी समय खम्भेको फाड़कर भयंकर शब्द करते हुए नृसिंहभगवान् प्रकट हो
गये। उनका शरीर मनुष्यका और मुख सिंहका था। हिरण्यकशिपुको दरवाजेपरघसीटकर भगवान् ले गये और अपनी जाघोंपर पछाड़कर नखसे उसका पेट फाड़ दिया। हिरण्यकशिपुको मारकर भगवान् दैत्योंका राजा प्रहलादको बनादिया!।              shayaripub.com 

emotional shayari # dil. shayrana

क्या, क्यूँ, कब, कैसा, वैसा कुछ भी नहीं है 
लैला और मजनू के जैसा तो कुछ भी नहीं है
 कई अधूरे किस्से है मोहब्बत के मोहल्ले में 
जैसा तुम समझते हो ऐसा कुछ भी नहीं है
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jai mata di # माँ


  शक्ति ही जीवन और जगत का आधार है। शक्ति के विना जीवन अधूरा और निष्प्राण हो जाता है। जीवनदायिनी शक्ति की पूजा का पर्व ही नवरात्र है। 
    
  जिस जीवन में विनम्रता, सहजता होगी और पवित्रता होगी, वहाँ ब्रह्म जरूर आते हैं। क्रोध जीवन की ऊर्जा का ह्रास करता है। क्रोध भय, अशांति, विषाद देता है। क्रोध से अपने लोग भी एक दिन पराये हो जाते हैं। कभी भी क्रोध ना करने के कारण ही देवी  शक्ति संपन्न होकर सबको नियंत्रित कर रही हैं।
                        एक कहानी माता की 



एक ऐसा रहस्यमय मंदिर, जहां माता की मूर्ति दिन में तीन बार बदलती है अपना रूप
भारत में रहस्यमय और प्राचीन मंदिरों की कोई कमी नहीं है। एक ऐसा ही मंदिर उत्तराखंड के श्रीनगर से करीब 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जहां हर दिन एक चमत्कार होता है, जिसे देखकर लोग हैरान हो जाते हैं। दरअसल, इस मंदिर में मौजूद माता की मूर्ति दिन में तीन बार अपना रूप बदलती है। मूर्ति सुबह में एक कन्या की तरह दिखती है, फिर दोपहर में युवती और शाम को एक बूढ़ी महिला की तरह नजर आती है। यह नजारा वाकई हैरान कर देने वाला होता है।
इस मंदिर को धारी देवी मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर झील के ठीक बीचों-बीच स्थित है। देवी काली को समर्पित इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां मौजूद मां धारी उत्तराखंड के चारधाम की रक्षा करती हैं। इस माता को पहाड़ों और तीर्थयात्रियों की रक्षक देवी माना जाता है। 
एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भीषण बाढ़ से मंदिर बह गया था। साथ ही साथ उसमें मौजूद माता की मूर्ति भी बह गई और वह धारो गांव के पास एक चट्टान से टकराकर रुक गई। कहते हैं कि उस मूर्ति से एक ईश्वरीय आवाज निकली, जिसने गांव वालों को उस जगह पर मूर्ति स्थापित करने का निर्देश दिया। इसके बाद गांव वालों ने मिलकर वहां माता का मंदिर बना दिया। पुजारियों की मानें तो मंदिर में मां धारी की प्रतिमा द्वापर युग से ही स्थापित है।
कहते हैं कि मां धारी के मंदिर को साल 2013 में तोड़ दिया गया था और उनकी मूर्ति को उनके मूल स्थान से हटा दिया गया था, इसी वजह से उस साल उत्तराखंड (केदार घाटी) में भयानक बाढ़ आई थी, जिसमें हजारों लोग मारे गए थे। माना जाता है कि धारी देवी की प्रतिमा को 16 जून 2013 की शाम को हटाया गया था और उसके कुछ ही घंटों बाद राज्य में आपदा आई थी। बाद में उसी जगह पर फिर से मंदिर का निर्माण कराया गया।
                             जय मां धारी देवी 


emotional shayari

🌹तुम मौजूद हो आज भी, इस दिल के कोने में कही,
एक बार इस दिल के करीब, आकर तो देखो,
बहुत मासूम सी सिसकियां ले रहा, ये नादान,
एक बार  दिल को, दिल से लगा के तो देखो.🌹
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हरे कृष्णा #hare krishan

वासुदेवे भगवति भक्तियोगः प्रयोजितः।
जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यदहैतुकम्॥
धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेनकथासु यः।
नोत्यादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम्॥

(श्रीमद्भा० १।२।७-८)
वेदव्यासजीने यह बताया है कि भगवान् ही सम्पूर्ण
लोकोंकी रचना करते हैं और देवता, पशु-पक्षी, मनुष्य
आदि योनियोंमें लीलावतार ग्रहण करके सत्त्वगुणके द्वारा
जीवोंका पालन-पोषण करते हैं-

#ब्राह्मण_और_जनेऊ(यज्ञोपवीत)
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पिछले दिनों मैं हनुमान जी के मंदिर में गया था जहाँ पर मैंने एक ब्राह्मण को देखा, जो एक जनेऊ हनुमान जी के लिए ले आये थे | संयोग से मैं उनके ठीक पीछे लाइन में खड़ा था, मेंने सुना वो पुजारी से कह रहे थे कि वह स्वयं का काता (बनाया) हुआ जनेऊ हनुमान जी को पहनाना चाहते हैं, पुजारी ने जनेऊ तो ले लिया पर पहनाया नहीं | जब ब्राह्मण ने पुन: आग्रह किया तो पुजारी बोले यह तो हनुमान जी का श्रृंगार है इसके लिए बड़े पुजारी (महन्थ) जी से अनुमति लेनी होगी, आप थोड़ी देर प्रतीक्षा करें वो आते ही होगें | मैं उन लोगों की बातें गौर से सुन रहा था, जिज्ञासा वश मैं भी महन्थ जी के आगमन की प्रतीक्षा करने लगा।

थोड़ी देर बाद जब महन्थ जी आए तो पुजारी ने उस ब्राह्मण के आग्रह के बारे में बताया तो महन्थ जी ने ब्राह्मण की ओर देख कर कहा कि देखिए हनुमान जी ने जनेऊ तो पहले से ही पहना हुआ है और यह फूलमाला तो है नहीं कि एक साथ कई पहना दी जाए | आप चाहें तो यह जनेऊ हनुमान जी को चढ़ाकर प्रसाद रूप में ले लीजिए |

 इस पर उस ब्राह्मण ने बड़ी ही विनम्रता से कहा कि मैं देख रहा हूँ कि भगवान ने पहले से ही जनेऊ धारण कर रखा है परन्तु कल रात्रि में चन्द्रग्रहण लगा था और वैदिक नियमानुसार प्रत्येक जनेऊ धारण करने वाले को ग्रहणकाल के उपरांत पुराना बदलकर नया जनेऊ धारण कर लेना चाहिए बस यही सोच कर सुबह सुबह मैं हनुमान जी की सेवा में यह ले आया था प्रभु को यह प्रिय भी बहुत है | हनुमान चालीसा में भी लिखा है कि - "हाथ बज्र और ध्वजा विराजे, कांधे मूज जनेऊ साजे"।

 अब महन्थ जी थोड़ी सोचनीय मुद्रा में बोले कि हम लोग बाजार का जनेऊ नहीं लेते हनुमान जी के लिए शुद्ध जनेऊ बनवाते हैं, आपके जनेऊ की क्या शुद्धता है | इस पर वह ब्राह्मण बोले कि प्रथम तो यह कि ये कच्चे सूत से बना है, इसकी लम्बाई 96 चउवा (अंगुल) है, पहले तीन धागे को तकली पर चढ़ाने के बाद तकली की सहायता से नौ धागे तेहरे गये हैं, इस प्रकार 27 धागे का एक त्रिसुत है जो कि पूरा एक ही धागा है कहीं से भी खंडित नहीं है, इसमें प्रवर तथा गोत्रानुसार प्रवर बन्धन है तथा अन्त में ब्रह्मगांठ लगा कर इसे पूर्ण रूप से शुद्ध बनाकर हल्दी से रंगा गया है और यह सब मेंने स्वयं अपने हाथ से गायत्री मंत्र जपते हुए किया है |

ब्राह्मण देव की जनेऊ निर्माण की इस व्याख्या से मैं तो स्तब्ध रह गया मन ही मन उन्हें प्रणाम किया, मेंने देखा कि अब महन्त जी ने उनसे संस्कृत भाषा में कुछ पूछने लगे, उन लोगों का सवाल - जबाब तो मेरे समझ में नहीं आया पर महन्त जी को देख कर लग रहा था कि वे ब्राह्मण के जबाब से पूर्णतया सन्तुष्ट हैं अब वे उन्हें अपने साथ लेकर हनुमान जी के पास पहुँचे जहाँ मन्त्रोच्चारण कर महन्त व अन्य 3 पुजारियों के सहयोग से हनुमान जी को ब्राह्मण देव ने जनेऊ पहनाया तत्पश्चात पुराना जनेऊ उतार कर उन्होंने बहते जल में विसर्जन करने के लिए अपने पास रख लिया |

 मंदिर तो मैं अक्सर आता हूँ पर आज की इस घटना ने मन पर गहरी छाप छोड़ दी, मेंने सोचा कि मैं भी तो ब्राह्मण हूं और नियमानुसार मुझे भी जनेऊ बदलना चाहिए, उस ब्राह्मण के पीछे-पीछे मैं भी मंदिर से बाहर आया उन्हें रोककर प्रणाम करने के बाद अपना परिचय दिया और कहा कि मुझे भी एक जोड़ी शुद्ध जनेऊ की आवश्यकता है, तो उन्होंने असमर्थता व्यक्त करते हुए कहा कि इस तो वह बस हनुमान जी के लिए ही ले आये थे हां यदि आप चाहें तो मेरे घर कभी भी आ जाइएगा घर पर जनेऊ बनाकर मैं रखता हूँ जो लोग जानते हैं वो आकर ले जाते हैं | मेंने उनसे उनके घर का पता लिया और प्रणाम कर वहां से चला आया।

शाम को उनके घर पहुंचा तो देखा कि वह अपने दरवाजे पर तखत पर बैठे एक व्यक्ति से बात कर रहे हैं , गाड़ी से उतरकर मैं उनके पास पहुंचा मुझे देखते ही वो खड़े हो गए, और मुझसे बैठने का आग्रह किया अभिवादन के बाद मैं बैठ गया, बातों बातों में पता चला कि वह अन्य व्यक्ति भी पास का रहने वाला ब्राह्मण है तथा उनसे जनेऊ लेने आया है | ब्राह्मण अपने घर के अन्दर गए इसी बीच उनकी दो बेटियाँ जो क्रमश: 12 वर्ष व 8 वर्ष की रही होंगी एक के हाथ में एक लोटा पानी तथा दूसरी के हाथ में एक कटोरी में गुड़ तथा दो गिलास था, हम लोगों के सामने गुड़ व पानी रखा गया, मेरे पास बैठे व्यक्ति ने दोनों गिलास में पानी डाला फिर गुड़ का एक टुकड़ा उठा कर खाया और पानी पी लिया तथा गुड़ की कटोरी मेरी ओर खिसका दी, पर मेंने पानी नहीं पिया 

इतनी देर में ब्राह्मण अपने घर से बाहर आए और एक जोड़ी जनेऊ उस व्यक्ति को दिए, जो पहले से बैठा था उसने जनेऊ लिया और 21 रुपए ब्राह्मण को देकर चला गया | मैं अभी वहीं रुका रहा इस ब्राह्मण के बारे में और अधिक जानने का कौतुहल मेरे मन में था, उनसे बात-चीत में पता चला कि वह संस्कृत से स्नातक हैं नौकरी मिली नहीं और पूँजी ना होने के कारण कोई व्यवसाय भी नहीं कर पाए, घर में बृद्ध मां पत्नी दो बेटियाँ तथा एक छोटा बेटा है, एक गाय भी है | वे बृद्ध मां और गौ-सेवा करते हैं दूध से थोड़ी सी आय हो जाती है और जनेऊ बनाना उन्होंने अपने पिता व दादा जी से सीखा है यह भी उनके गुजर-बसर में सहायक है | 

इसी बीच उनकी बड़ी बेटी पानी का लोटा वापस ले जाने के लिए आई किन्तु अभी भी मेरी गिलास में पानी भरा था उसने मेरी ओर देखा लगा कि उसकी आँखें मुझसे पूछ रही हों कि मेंने पानी क्यों नहीं पिया, मेंने अपनी नजरें उधर से हटा लीं, वह पानी का लोटा गिलास वहीं छोड़ कर चली गयी शायद उसे उम्मीद थी की मैं बाद में पानी पी लूंगा | 

अब तक मैं इस परिवार के बारे में काफी है तक जान चुका था और मेरे मन में दया के भाव भी आ रहे थे | खैर ब्राह्मण ने मुझे एक जोड़ी जनेऊ दिया, तथा कागज पर एक मंत्र लिख कर दिया और कहा कि जनेऊ पहनते समय इस मंत्र का उच्चारण अवश्य करूं -- |

मैंने सोच समझ कर 500 रुपए का नोट ब्राह्मण की ओर बढ़ाया तथा जेब और पर्स में एक का सिक्का तलाशने लगा, मैं जानता था कि 500 रुपए एक जोड़ी जनेऊ के लिए बहुत अधिक है पर मैंने सोचा कि इसी बहाने इनकी थोड़ी मदद हो जाएगी | ब्राह्मण हाथ जोड़ कर मुझसे बोले कि सर 500 सौ का फुटकर तो मेरे पास नहीं है, मेंने कहा अरे फुटकर की आवश्यकता नहीं है आप पूरा ही रख लीजिए तो उन्हें कहा नहीं बस मुझे मेरी मेहनत भर का 21 रूपए दे दीजिए, मुझे उनकी यह बात अच्छी लगी कि गरीब होने के बावजूद वो लालची नहीं हैं, पर मेंने भी पांच सौ ही देने के लिए सोच लिया था इसलिए मैंने कहा कि फुटकर तो मेरे पास भी नहीं है, आप संकोच मत करिए पूरा रख लीजिए आपके काम आएगा | उन्होंने कहा अरे नहीं मैं संकोच नहीं कर रहा आप इसे वापस रखिए जब कभी आपसे दुबारा मुलाकात होगी तब 21रू. दे दीजिएगा | 

इस ब्राह्मण ने तो मेरी आँखें नम कर दीं उन्होंने कहा कि शुद्ध जनेऊ की एक जोड़ी पर 13-14 रुपए की लागत आती है 7-8 रुपए अपनी मेहनत का जोड़कर वह 21 रू. लेते हैं कोई-कोई एक का सिक्का न होने की बात कह कर बीस रुपए ही देता है | मेरे साथ भी यही समस्या थी मेरे पास 21रू. फुटकर नहीं थे, मेंने पांच सौ का नोट वापस रखा और सौ रुपए का एक नोट उन्हें पकड़ाते हुए बड़ी ही विनम्रता से उनसे रख लेने को कहा तो इस बार वह मेरा आग्रह नहीं टाल पाए और 100 रूपए रख लिए और मुझसे एक मिनट रुकने को कहकर घर के अन्दर गए, बाहर आकर और चार जोड़ी जनेऊ मुझे देते हुए बोले मेंने आपकी बात मानकर सौ रू. रख लिए अब मेरी बात मान कर यह चार जोड़ी जनेऊ और रख लीजिए ताकी मेरे मन पर भी कोई भार ना रहे |

मेंने मन ही मन उनके स्वाभिमान को प्रणाम किया साथ ही उनसे पूछा कि इतना जनेऊ लेकर मैं क्या करूंगा तो वो बोले कि मकर संक्रांति, पितृ विसर्जन, चन्द्र और सूर्य ग्रहण, घर पर किसी हवन पूजन संकल्प परिवार में शिशु जन्म के सूतक आदि अवसरों पर जनेऊ बदलने का विधान है, इसके अलावा आप अपने सगे सम्बन्धियों रिस्तेदारों व अपने ब्राह्मण मित्रों को उपहार भी दे सकते हैं जिससे हमारी ब्राह्मण संस्कृति व परम्परा मजबूत हो साथ ही साथ जब आप मंदिर जांए तो विशेष रूप से गणेश जी, शंकर जी व हनूमान जी को जनेऊ जरूर चढ़ाएं...

उनकी बातें सुनकर वह पांच जोड़ी जनेऊ मेंने अपने पास रख लिया और खड़ा हुआ तथा वापसी के लिए बिदा मांगी, तो उन्होंने कहा कि आप हमारे अतिथि हैं पहली बार घर आए हैं हम आपको खाली हाथ कैसे जाने दो सकते हैं इतना कह कर उनहोंने अपनी बिटिया को आवाज लगाई वह बाहर निकाली तो ब्राह्मण देव ने उससे इशारे में कुछ कहा तो वह उनका इशारा समझकर जल्दी से अन्दर गयी और एक बड़ा सा डंडा लेकर बाहर निकली, डंडा देखकर मेरे समझ में नहीं आया कि मेरी कैसी बिदायी होने वाली है | 

अब डंडा उसके हाथ से ब्राह्मण देव ने अपने हाथों में ले लिया और मेरी ओर देख कर मुस्कराए जबाब में मेंने भी मुस्कराने का प्रयास किया | वह डंडा लेकर आगे बढ़े तो मैं थोड़ा पीछे हट गया उनकी बिटिया उनके पीछे पीछे चल रह थी मेंने देखा कि दरवाजे की दूसरी तरफ दो पपीते के पेड़ लगे थे डंडे की सहायता से उन्होंने एक पका हुआ पपीता तोड़ा उनकी बिटिया वह पपीता उठा कर अन्दर ले गयी और पानी से धोकर एक कागज में लपेट कर मेरे पास ले आयी और अपने नन्हें नन्हा हाथों से मेरी ओर बढ़ा दिया उसका निश्छल अपनापन देख मेरी आँखें भर आईं।

मैं अपनी भीग चुकी आंखों को उससे छिपाता हुआ दूसरी ओर देखने लगा तभी मेरी नजर पानी के उस लोटे और गिलास पर पड़ी जो अब भी वहीं रखा था इस छोटी सी बच्ची का अपनापन देख मुझे अपने पानी न पीने पर ग्लानि होने लगी, मैंने झट से एक टुकड़ा गुड़ उठाकर मुँह में रखा और पूरी गिलास का पानी एक ही साँस में पी गया, बिटिया से पूछा कि क्या एक गिलास पानी और मिलेगा वह नन्ही परी फुदकता हुई लोटा उठाकर ले गयी और पानी भर लाई, फिर उस पानी को मेरी गिलास में डालने लगी और उसके होंठों पर तैर रही मुस्कराहट जैसे मेरा धन्यवाद कर रही हो , मैं अपनी नजरें उससे छुपा रहा था पानी का गिलास उठाया और गर्दन ऊंची कर के वह अमृत पीने लगा पर अपराधबोध से दबा जा रहा था।

अब बिना किसी से कुछ बोले पपीता गाड़ी की दूसरी सीट पर रखा, और घर के लिए चल पड़ा, घर पहुंचने पर हाथ में पपीता देख कर मेरी पत्नी ने पूछा कि यह कहां से ले आए तो बस मैं उससे इतना ही कह पाया कि एक ब्राह्मण के घर गया था तो उन्होंने खाली हाथ आने ही नहीं दिया।
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jai siya ram # भरत प्रेम

                             नवधा भक्ति
श्रीरामचरितमानसमें जहाँ भी भरतजीका चरित्र आया है, उसको
पढ़नेसे यदि पाठकके हृदयमें थोड़ा भी प्रेम हो तो उसका हृदय गदगदहो जाता है और अश्रुपात होने लगते हैं।
भरतजीकी महिमाके वर्णनमें श्रीतुलसीदासजीने स्वयं कहा है-
भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु ।
कबिहि अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु ।

भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई ॥

भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती ॥
बरनत सकल सुकबि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं ॥

सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को।
मुनि मन अगम जम नियम सम दम बिषम ब्रत आचरत को॥
दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को
कलिकाल तुलसी से सठन्हि हठि राम सनमुख करत को ॥


श्रीजनकजी तो भरतजीके चरित्र, गुण, भक्ति और प्रेमभावको देखकर
मुग्ध ही हो गये। चित्रकूटमें वे अपनी पत्नी रानी सुनयनासे कहते हैं-

सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि । भरत कथा भव बंध बिमोचनि ॥
धरम राजनय ब्रह्मबिचारू । इहाँ जथामति मोर प्रचारू।।

सो मति मोरि भरत महिमाही। कहै काह छलि छुअति न छाँही ॥
बिधि गनपति अहिपति सिव सारद । कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद ॥
चरित कीरति करतूती । धरम सील गुन बिमल बिभूती॥
समुझत सुनत सुखद सब काहू । सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू

भरत अमित महिमा सुनु रानी। जानहिं रामु न सकहिं बखानी ।।
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देबि परंतु भरतरघुबर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी।
भरतु अवधि सनेह ममता की। जद्यपि रामु सीम समता की।
परमारथस्वारथसाधन सिद्धि रामसुख सारे।
भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे ।
साधन सिद्धि राम पग नेहू । मोहि लखि परत भरत मत एहू ॥

भरतजी महाराज प्रेममयी भक्तिके अगाध सागर थे, या यों
कहिये कि वे साक्षात् प्रेमकी मूर्ति ही थे। जहाँ-कहीं भरतजीका
चरित्र देखते हैं, वहीं प्रेमका समुद्र लहराता दीखता है। इसके
सिवा, वे सद्गुण-सदाचारमें भी अद्वितीय थे। जिनके गुण, चरित्र,
स्वभाव और प्रेमको देखकर श्रीरामचन्द्रजी भी मुग्ध हो गये। वे
कहते हैं-
तात भरत तुम्ह धरम धुरीना । लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना ॥
करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात ।
गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात ॥



भरतजीकी महिमा कहाँतक बतलायी जाय? उनकी महिमा
रामायणमें भरी पड़ी है। यहाँ तो केवल संक्षेपमें कुछ
दिग्दर्शन कराया
गया है। लेखका कलेवर न बढ़ जाय, इसलिये अधिक प्रमाण उद्धृत
नहीं किये गये।

अब भक्तिके उपर्युक्त नौ प्रकार श्रीभरतजीके जीवन-चरित्रमें जिस
प्रकार घटित हुए हैं, इसका महाभारत, श्रीरामचरितमानस, पद्मपुराण,
वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण आदि ग्रन्थोंके आधारपर कुछ
दिग्दर्शन कराया जाता है।
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Good evening

कौन समझेगा यहां की वीरानी देख के... इस जगह भी ठहरे थे  कभी काफ़िले मोहब्बत के...... Shayaripub.in पूछा जो उसने कैसे रहोगे ताउम्र तुम मेरे सा...