emotional shayari

हमारे  साथ  बहुत  दूर  तक  चले  आए
तुम्हारे साथ फ़क़त चार पल गुजारे हुए...
                     शायर.......तारा इक़बाल



बेवफ़ाई औ' ग़लाज़त इश्क़ में करके
लोग...... किस तरह ये मुस्कुराते हैं 

क्या किसी ने की है रुख़सत फिर ज़माने से 
कुछ नये तारे फ़लक पर टिमटिमाते हैं 

नींद से उठकर टटोलूँ धड़कनें दिल की
आजकल ख्वाबों में भी, वो दिल चुराते हैं 

आये थे दिल में मेरे वो ज़िन्दगी बनकर 
मौत देकर चल दिये कहकर ....कि जाते हैं

रात को सूरज निकलता है मुहब्बत में 
आजकल दिन में भी तारे जगमगाते हैं 

औरतों के हक़ में कुछ क़ानून हैं ऐसे
हुस्न की तारीफ़ करने पर डराते हैं
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har har mahadev

 *सुप्रभात*
नमों नमों हे शंकरा 
सुख करो पहाड़
दुःख करो कंकरा
नमों नमों हे शंकरा

ये धरती और गगन तेरा
विशाल समन्दर तेरा
तीनों लोक के स्वामी 
जन्म मरण मे नाम तेरा
भव सागर से तारता

नमों नमों हे शंकरा
हर लो दुःख मेरा
नमों नमों हे शंकरा 
सुख करो पहाड़ 
दुःख करो कंकरा
.             Shayaripub.in
                          एक संदेश 
महाकवि कालिदास जी एक रास्ते से गुजर रहे थे। वँहा एक  पनिहारिन पानी भर रही थी । कालिदास ने कहा .......
*कालिदास बोले :-* माते पानी पिला दीजिए बङा पुण्य होगा.

*स्त्री बोली :-* बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं. अपना परिचय दो। 
मैं अवश्य पानी पिला दूंगी।

*कालिदास ने कहा :-* मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें।

*स्त्री बोली :-* तुम मेहमान कैसे हो सकते हो ? संसार में दो ही मेहमान हैं।
पहला धन और दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता। सत्य बताओ कौन हो तुम ?
.
(अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश तो हो ही चुके थे)
*कालिदास बोले :-* मैं सहनशील हूं। अब आप पानी पिला दें।

*स्त्री ने कहा :-* नहीं, सहनशील तो दो ही हैं। पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है। उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है, दूसरे पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं। तुम सहनशील नहीं। सच बताओ तुम कौन हो ? 

(कालिदास लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले)
*कालिदास बोले :-* मैं हठी हूँ ।
.
*स्त्री बोली :-* फिर असत्य. हठी तो दो ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं। सत्य कहें कौन हैं आप ? 

(पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके थे)
*कालिदास ने कहा :-* फिर तो मैं मूर्ख ही हूँ ।
.
*स्त्री ने कहा :-* नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो। 
मूर्ख दो ही हैं। पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है।

(कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे)

*वृद्धा ने कहा :-* उठो वत्स ! (आवाज़ सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थी, कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए)

*माता ने कहा :-* शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार । तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा।
.
कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े।

शिक्षा :-
विद्वत्ता पर कभी घमण्ड न करें, यही घमण्ड विद्वत्ता को नष्ट कर देता है।
 दो चीजों को कभी *व्यर्थ* नहीं जाने देना चाहिए.....
                  *अन्न के कण को* 
                           "और"
                   *आनंद के क्षण को*
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emotional shayari # मेरी कविता

                      ना....
 ⚘ ना ना कुछ लिखने को ना कहना आज दिल परेशान बहुत है।
रिश्तों  की कश्तियों को बांध लो  मन्नत  के धागे
क्योंकि समंदर में तूफ़ान बहुत है।।⚘

⚘कौन समझेगा कौन  चलेगा तेरे साथ ।
तू गिरेगा तो सब खींच लेंगे  अपना हाथ ।
     यह शहर का शहर बेईमान बहुत है।।⚘

⚘जिन परिंदों को उड़ान देने में तूने मुड़कर न देखा खुद को ।
वो ही छोड़ जायेंगे ...पंख  मिलते  ही तुझको।।
उनकी ख्वाहिशों की ऊंची उड़ान बहुत है।।⚘

⚘जायज नहीं नाजायज रिश्ते  चुने जा रहे हैं
झूठ फरेब से अय्याशी के कसीदे बुने जा रहे हैं
सेल लगी है जिस्मों की
रूहानी इश्क के दाम बहुत हैं।।⚘

⚘टूट चुका है तू अब नहीं बिखरना है तुझे ।
पोंछ अपने आंसू अब खुद के लिए खुद ही निखरना है तुझे।
शाम  ढलने लगी है, और तुझे काम बहुत हैं।।⚘
                                    ⚘अचलाएस गुलेरिया⚘
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एक कहानी

*एक बाप का फैसला*


"क्या बताऊँ मम्मी, आजकल तो , बासी कढ़ी में भी उबाल आया हुआ है| 
जबसे पापा जी रिटायर हुए है , दोनों लोग फिल्मी हीरो हीरोइन की तरह दिन भर अपने बगीचे में ही झूले पर विराजमान रहते हैं| 
न अपने बालों की सफेदी का लिहाज है न बहू बेटे का इस उम्र में दोनों मेरी और नवीन की बराबरी कर रहे हैं|
ठीक है मां मैं आपसे बाद में बात करती हूं शायद सासुमा आ रही हैं।"
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  सासु मां ने बहू की बातें कमरे के बाहर सुन ली थी, 
पर नज़रअंदाज़ करते हुए खामोशी से चाय सोनम को  दे दी| 

 सासू मां बहू सोनम को चाई देने के पश्चात पति देव अशोक जी के लिए चाय ले जाने लगी, 
ऐसा देखकर बहू सोनम के चेहरे पर व्यंगात्मक मुस्कान तैर गयी| 
पर सासू मां, समझदारी दिखाते हुए  बहू की इस नाजायज हरकत को नज़र अंदाज़ करते हुए सिर झुकाए  वन्हा से निकल गईं| 

पति के रिटायर होने के बाद कुछ दिन से उनकी यही दिनचर्या हो गयी थी|  
आजकल सासुमा प्रभा जी  अपने पति देव अशोक जी को उनकी इच्छानुसार अच्छे से तैयार होकर अपने घर के सबसे खूबसूरत हिस्से में अपने पति देव के साथ झूले में बैठ कर उनको कंपनी देती थी।
 
प्रभाजी ने सारी उम्र तो उनकी बच्चों के लिए लगा दी थी|  

 कोठीनुमा घर अशोक और प्रभा का जीवन भर का सपना था, जो उन्होंने बड़ी मेहनत से साकार किया था।

 
ऐसे मनमोहक वातावरण में वहां पर लगा झूला मन को असीम शांति प्रदान करता।

पहले वह और अशोक इस मनमोहक जगह में कम समय के लिए ही बैठ पाते थे।
प्रभा अनमनी होतीं तो अशोक बड़े ज़िंदादिल शब्दों में कहते, 
"पार्टनर रिटायरमेंट के बाद दोनों इसी झूले पर साथ बैठेंगे  और खाना भी  साथ में ही खायेंगे| 
आपकी हर शिकायत हम दूर कर देँगे| 
फ़िलहाल हमें बच्चों के लिये जीना है| 
बच्चों के कैरियर पर बहुत कुछ बलिदान करना पड़ा, 
खेर अब बेटा  अच्छी नौकरी में था और बेटी भी अपने घर की हो चुकी थी | 

रिटायरमेंट के बाद घर में थोड़ी रौनक रहने लगी थी,
अशोक जी को भी घर में रहना अच्छा लग रहा था| 
पहले तो बड़े पद पर थे तो कभी उनके कदम घर में टिकते ही नहीँ थे|  

लेकिन उनकी बहू सोनम अपने पति नवीन को उसके माता पिता के लिये ताने देने का कोई मौका न छोड़ती| 

उसने उस कोने के बागीचे से छुटकारा पाने के लिये नवीन को एक रास्ता सुझाते हुए कहा,"क्योँ न हम बड़ी कार खरीद लें...नवीन"| 
 "आईडिया तो अच्छा है पर रखेंगे कहाँ एक कार रखने की ही तो जगह है घर में",नवीन थोड़ा चिंतित स्वर में बोला|

"जगह तो है न, वो गार्डन तुम्हारा..जहाँ आजकल दोनों लव बर्ड्स बैठते हैं।"
सोनम व्यागतमक स्वर में बोली|  

"थोड़ा तमीज़ से बात करो,"
नवीन क्रोध से बोला।
लेकिन फिर भी सोनम ने अपने पति को पापा जी से बात करने का मन बना लिया।  

अगले दिन नवीन कुछ कार की तस्वीरों के साथ शाम को अपने पिता के पास गया और बोला,
" पापा !मैं और सोनम एक बड़ी गाड़ी खरीदना चाहते हैं "  

"पर बेटा एक बड़ी गाड़ी तो घर में पहले ही है, फिर उस नई गाड़ी की रखेंगे भी कहाँ?"
अशोक जी ने प्रश्न किया|  
"ये जो बगीचा है यहीँ  गैराज बनवा लेंगे वैसे भी सोनम से तो इसकी देखभाल होने से  रही और मम्मी कब तक देखभाल करेंगी? 
इन पेड़ों को कटवाना ही ठीक रहेगा| 
वैसे भी ये सब जड़े मज़बूत कर घर की दीवारें कमज़ोर कर रहें है|" 

यह सुनकर प्रभा तो वहीँ कुर्सी पर सीना पकड़ कर बैठ गईं,
अशोक जी ने  क्रोध को काबू में करते हुए कहा, 
मुझे तुम्हारी माँ से भी बात करके थोड़ा सोचने का मौका दो|  
क्या पापा... मम्मी से क्या पूछना ..वैसे भी इस जगह का इस्तेमाल भी क्या है नवीन थोड़ा चिड़चिड़ा कर बोला|  
"आप दोनों दिन भर इस जगह बगैर कुछ सोचे समझे,चार लोगों का लिहाज किये बग़ैर साथ में बैठे रहते हैं|
अब आप दोनों कोई बच्चे तो नहीं हो |  
लेकिन आप दोनों ने दिन भर झूले पर  साथ बैठे रहने का रिवाज बना लिया है और ये भी नहीँ सोचते कि चार लोग क्या  कहेंगे|  
इस उम्र में मम्मी के साथ बैठने की बजाय आप अपनी उम्र के लोगों में उठा बैठी करेंगे तो वो ज़्यादा अच्छा लगेगा न कि ये सब।"
 और वह दनदनाते हुए अंदर चला गया|  अंदर सोनम की बड़बड़ाहट भी ज़ारी थी।

अशोक जी कड़वी सच्चाई का एहसास कर रहे थे।

पर आज की बात से तो उनके साथ प्रभा जी भी सन्न रह गईं,
अपने बेटे के मुँह से ऐसी बातें सुनकर दोनों को दिल भर आया था और टूट भी चुका था।
 रिटायरमेंट को अभी कुछ ही समय हुआ जो थोड़ा सकून से गुजरा था।
पहले की ज़िन्दगी तो भागमभाग में ही निकल गयी थी, बच्चों के लिए सुख साधन जुटाने में|  
अशोक जी आज पूरी रात ऊहापोह में लगे रहे,
 कुछ सोचते रहे, कुछ समझते रहे और कुछ योजना बनाते रहे ।
लेकिन सुबह जब वे उठे तब  बड़े शांत और प्रसन्न थे।

वे रसोई में गये और खुद चाय बनाई | 
कमरे में आकर पहला कप प्रभा को उठा कर पकड़ाया और दूसरा खुद पीने लगे|  
आपने क्या सोचा?प्रभा ने रोआंसे लहज़े में पूछा| 
 मैं सब ठीक कर दूँगा बस तुम धीरज रखो,अशोक बोले|  पर हद से ज़्यादा निराश प्रभा  उस दिन पौधों में पानी देने भी न निकलीं,और न ही किसी से कोई बात की|  

दिन भर सब सामान्य रहा,लेकिन शाम को अपने घर के बाहर To Let का बोर्ड टँगा देख नवीन ने भौंचक्के स्वर में अशोक से प्रश्न किया,"पापा  माना कि घर  बड़ा है पर ये To Let का बोर्ड  किसलिए"? 
 " अगले महीने मेरे स्टाफ के मिस्टर गुप्ता रिटायर हो रहें है,तो वो इसी घर में रहेँगे",
उन्होंने शान्ति पूर्ण तरीके से उत्तर दिया| हैरान नवीन बोला,
"पर कहाँ?"  "तुम्हारे पोर्शन में",अशोक जी ने सामान्य स्वर में उत्तर दिया|  
नवीन का स्वर अब हकलाने लगा था,"और हम लोग "  "तुम्हे इस लायक बना दिया है दो तीन महीने में कोई फ्लैट देख लेना या कम्पनी के फ्लैट में रह लेना,अपनी उम्र के लोगों के साथ | 
"अशोक एक- एक शब्द चबाते हुए बोल रहे थे|  
हम दोनों भी अपनी उम्र के लोगों में उठे बैठेंगे।
 तुम्हारी माँ की सारी उम्र सबका लिहाज़ करने में निकल गयी| 
कभी बुजुर्ग तो कभी बच्चे| 
अब लिहाज़ की सीख तुम सबसे लेना बाकी रह गया थी|  "पापा मेरा वो मतलब नहीँ था",नवीन सिर झुकाकर बोला|  

नही बेटा तुम्हारी पीढ़ी ने हमें भी प्रैक्टिकल बनने का सबक दे दिया,
जब हम तुम दोनों को साथ देखकर खुश हो सकते है तो तुम लोगों को हम लोगों से दिक्कत क्योँ है| "?  
इस मकान को घर तुम्हारी माँ ने बनाया, ये पेड़ और इनके फूल तुम्हारे लिए माँगी गयी न जाने कितनी मनौतियों के साक्षी हैं,
तो यह अनोखा कोना  छीनने का अधिकार में किसी को भी नहीं दूँगा|  
पापा आप तो सीरियस हो गये, नवीन के स्वर अब नम्र हो चले थे|  
न बेटा... तुम्हारी मां ने जाने कितने कष्ट सहकर, कितने त्याग कर के मेरा साथ दिया आज इसी के सहयोग से मेरे सिर पर कोई कर्ज़ नहीँ है|
 इसलिये सिर्फ ये कोना ही नहीं पूरा घर तुम्हारी माँ का ऋणी है| ।
घर तुम दोनों से पहले उसका है, क्योंकि जीभ पहले आती है, न कि दाँत|  
जब मंदिर में ईश्वर जोड़े में अच्छा लगता है तो मां बाप साथ में बुरे क्योँ लगते हैं? 
ज़िन्दगी हमें भी तो एक ही बार मिली है|
इसलिए हम इसे अपने हिसाब से एंजॉय करना चाहते हैं।

जय सीयाराम # jai shree Ram

चिदानंदमय देह तुम्हारी। 
बिगत बिकार जान अधिकारी॥
नर तनु धरेहु संत सुर काजा। 
कहहु करहु जस प्राकृत राजा॥ 

अर्थ:-आपकी देह चिदानन्दमय है (यह प्रकृतिजन्य पंच महाभूतों की बनी हुई कर्म बंधनयुक्त, त्रिदेह विशिष्ट मायिक नहीं है) और (उत्पत्ति-नाश, वृद्धि-क्षय आदि) सब विकारों से रहित है, इस रहस्य को अधिकारी पुरुष ही जानते हैं। आपने देवता और संतों के कार्य के लिए (दिव्य) नर शरीर धारण किया है और प्राकृत (प्रकृति के तत्वों से निर्मित देह वाले, साधारण) राजाओं की तरह से कहते और करते हैं॥ 

श्री रामचरित मानस 
अयोध्याकांड (१२६) 

स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्‌॥ 

हे कुन्तीपुत्र! जिस कर्म को तू मोह के कारण करना नहीं चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बँधा हुआ परवश होकर करेगा
॥ 

भगवद गीता
उपसंहार-संन्यास की सिद्धि
(अध्याय १८) 

             भजन 
नहीं गंगा सी मैं पावन कैसे चरण पखारूँ
नहीं दृष्टि ऐसी भगवन दो क्षण तुम्हें निहारूँ

कोई जप तप नहीं है मेरा साधना मेरी में बल ना
तेरा नाम निकले न मुख से कैसे तुम्हें पुकारूँ
नहीं गंगा सी..........

भटकी हूँ नाथ मेरे जब से तुमसे हूँ बिछड़ी
जन्मों की बिगड़ी हरि जी कैसे कहो सुधारूँ
नहीं गंगा सी ..........

मेरा हाथ पकड़ो साँवल नहीं कोई और मेरा
हैं जगत के रिश्ते झूठे बस तुमको ही पुकारूँ
नहीं गंगा सी........

निर्धन हूँ बिन तुम्हारे तुम ही धन हो मेरा
अश्रु तुम्हें चढ़ाऊँ तेरी आरती उतारूँ
नहीं गंगा सी ..........

जन्मों की है प्रतीक्षा आ जाओ नाथ मेरे
क्षण क्षण विरह जलाये तेरी राह मैं बुहारूँ
नहीं गंगा सी मैं पावन कैसे चरण पखारूँ
नहीं दृष्टि ऐसी भगवन दो क्षण तुम्हें निहारूँ
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Good night

जागना भी कबूल है तेरी यादों में रात भर,
तेरे एहसासों में जो सुकून है वो नींद में कहाँ।


*ऐतराज़ है मेरी शायरी से उन्हें...*

*शायद उलझती हैं धड़कने उनकी...*

सुनो 
कहां से लाऊं में शायरी में जान
कोई जान जान बोल कर जान ले गया
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हरे कृष्णा #hare krishna

जो कथा सुनता है उसे और कुछ करने की जरूरत नहीं है। वैसे तो तुम भगवान का दर्शन करते हो पर जब तुम कथा में बैठते हो तो भगवान तुम्हारा दर्शन करता है। मद् भक्ता यत्र गायंति तत्र तिष्ठामि नारदः।। वैसे तो आप तीर्थ में जाते हो पर सच कहूँ जब कथा में बैठते हो तो तीर्थ आपमें प्रवेश करता है। 

कथा परिस्थितियाँ नहीं बदलती भजन परिस्थितियाँ नहीं बदलता। लोग भजन को विचित्र प्रकार से परिभाषित करते हैं। अरे हम कथा में बैठे हमारा फलाना काम बन गया, दुःख सुख में बदल गया। न न। 

कथा उसे नहीं कहते जो दुःख को सुख में बदलती है कथा उसे कहते हैं जो सुख और दुःख से ऊपर उठा देती है। सुख दुःख समेकृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।। 

परिस्थिति जो बदल दे, वहिर्मुख को अंतर्मुख कर दे, समाज की असुविधाओं को सुवीधाओं में बदल दे, छोटे घर से को बड़ा घर कर दे, छोटी गाड़ी को बड़ी गाड़ी कर दे। ये सब परिस्थितियाँ हैं जो रोज बदलती है। 

पर ये प्रतिस्पर्धा समाप्त नहीं होगी अगर आपकी स्थिति नहीं बदलती तो। आज कुछ आएगा कल कुछ आएगा पर अगर भीतर ठीक हो गया तो कुछ भी आ जाए फरक नहीं पड़ेगा।

।।परमाराध्य पूज्य श्रीमन् माध्व गौडेश्वर वैष्णवाचार्य श्री पुंडरीक गोस्वामी जी महाराज ।।


*हे सखी....🌷🌷

मैं तो साँवरे से
अखियाँ मिला बैठी।
हाल सखियों को
दिल का सुना बैठी।
🌷🌷🌷🌷
मैं तो पनिया भरन
को आई थी।
देख साँवरे को
मैं शरमाई थी।
भोली सूरत पे
दिल को लुटा बैठी
🌷🌷🌷🌷🌷
वह तो ब्रज का
इक ग्वाला है
सब का मन
मोहने वाला है।
उस ग्वाले से
दिल को लगा बैठी।
🌷🌷🌷🌷🌷
मैं ने समझाया
लाख सखी।
पर उसने पकड़
लिया हाथ सखी।
फिर क्या था,
मैं सब कुछ भुला बैठी।
🌷🌷🌷🌷🌷
मैं तो साँवरे से
अखियाँ मिला बैठी।
हाल सखियों को
दिल का सुना बैठी।
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                           हिन्दी शायरी दिल से 

emotional shayari

🌷फ़ासले तो बढ़ा रहे हो मगर इतना याद रखना,🌷

🌷मुहब्बत बार बार इंसान पर मेहरबान नहीं होती.🌷



🌷🌷हारता वो है जो शिकायत बार-बार करता है..🌷🌷

🌷🌷और जीतता वो है जो कोशिश बार-बार करता है🌷🌷

🔥एक दिया उस पगडंडी पर
जो अनजाने कुहरों के पार डूब जाती है,🔥
🔥एक दिया उस चौराहे पर
जो मन की सारी राहें🔥
🔥विवश छीन लेता है,
एक दिया इस चौखट,🔥
🔥एक दिया उस ताखे,
एक दिया उस बरगद के तले जलाना,🔥
          🔥🔥जाना, फिर जाना,🔥🔥
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hare krishna



फकीरों के फ़क़ीर 
⚘⚘श्री कुंज बिहारी श्री हरिदास⚘⚘
💠 बड़ी सुन्दर सत्य कथा है अवश्य पढ़े 💠
एक बार एक सिद्ध संत श्री मोहन देव जी  वृंदावन आए ! उन्होंने बोहोत सी सिद्धियाँ प्राप्त कर रखी थी ! वृंदावन में वो एक श्याम को यमुना जी की किनारे बैठे थे वहीं एक व्रध संत बैठे थे जो राधा राधा राधा बस निरंतर यही जप कर रहे थे ! 
मोहनदेव जी बोले 
"बाबा बस नाम ही रटते  रहते हो या कुछ पाया भी है ?"
संत बोले "बाबा हमें तो कुछ पाना नही ! जो पाना था वो यही नाम है सो मिल गया ! आप क्या पाने की बात कर रहे है ?"
मोहनदेव जी तो शायद इसी मौक़े का इंतज़ार कर रहे थे की अवसर मिले अपनी सिद्धी दिखाने का वो तपाक से बोले "बताना क्या दिखाते है !"
वो उठे कुछ बुदबुदाए और यमुना जी के जल पर ऐसे चलने लगे जैसे भूमि पर चल रहे हो ! पूरी नादिया पार करी और वापस आकर बोले 
"देखा बाबा कैसा चमत्कार ! ये पाया हमने !"
व्रध वृंदावन के संत ने पास खड़े एक मल्लाह को बुलाया और पूछा "क्यूँ भाई नादिया पार जाने का क्या लोगे ?"
वो बोला "बाबा आपसे कुछ नही ले सकता !"
बाबा पूनः बोले "भाई हमें जाना नही किंतु साधारणतः क्या लेते हो ?"
मल्लाह बोले "बाबा चाराना !"
बाबा मोहनदेव जी से बोले "भाई जो काम चाराने में हो सकता है उसे सिद्ध करने के  लिए तुमने जीवन गंवा दिया !"
"मिथ्या अभिमान और मुफ़्त की नौटंकी दिखाने के अलावा क्या हाथ लगा ? भाई जो जीवन चला गया और हरी ना मिले तो ।।।।  "बाबा की आँखों से आंसुओं की धारा बह चली और गला रुंध गया और एक शब्द न निकला !
यही सार है भाई जीवन में सब मिल जाए पर जो हरी न मिले तो धिक्कार है खुद पर ! न जाने ये जीवन दुबारा मिलेगा या नही और हम इसको यूँ ही व्यर्थ कर दें ! मूर्ख न बन ऐ बंदे सब कर न कर पर उनका नाम ना रुकने पाए उनकी याद न जाने पाए !
****(जय जय श्री राधे)****
         ꧁ श्री कुंज बिहारी श्री हरिदास ꧂  
‌     
।। हरि बोल  प्यारे मुक्ति मार्ग कृष्णा ब्रज वासी ।।

              नज़रें तलाशती हैं जिसको,
         वो प्यारा सा spna हो तुम प्यारे कृष्ण ..
                मिलती है दुनियां सारी,
  ना मिल कर भी  तुम अपने हो प्यारे .कृष्णा.।।

              मुक्ति मार्ग कृष्णा ब्रज वासी 
                       राधे राधे जी
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emotional shayari

दिल किसी से तब ही लगाना जब दिलों को पढ़ना सीख लो........

वरना हर एक चेहरे की फितरत में ईमानदारी नहीं होती.......

emotional shayari


*तराशिये खुद को कुछ इस कदर जहां में...!*

*पाने वाले को नाज़ खोने वाले को अफसोस रहे...!!* 

  


दिल किसी से तब ही लगाना जब दिलों को पढ़ना सीख लो........

वरना हर एक चेहरे की फितरत में ईमानदारी नहीं होती!!
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Good evening

कौन समझेगा यहां की वीरानी देख के... इस जगह भी ठहरे थे  कभी काफ़िले मोहब्बत के...... Shayaripub.in पूछा जो उसने कैसे रहोगे ताउम्र तुम मेरे सा...