jai siya ram # भरत प्रेम

                             नवधा भक्ति
श्रीरामचरितमानसमें जहाँ भी भरतजीका चरित्र आया है, उसको
पढ़नेसे यदि पाठकके हृदयमें थोड़ा भी प्रेम हो तो उसका हृदय गदगदहो जाता है और अश्रुपात होने लगते हैं।
भरतजीकी महिमाके वर्णनमें श्रीतुलसीदासजीने स्वयं कहा है-
भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु ।
कबिहि अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु ।

भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई ॥

भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती ॥
बरनत सकल सुकबि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं ॥

सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को।
मुनि मन अगम जम नियम सम दम बिषम ब्रत आचरत को॥
दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को
कलिकाल तुलसी से सठन्हि हठि राम सनमुख करत को ॥


श्रीजनकजी तो भरतजीके चरित्र, गुण, भक्ति और प्रेमभावको देखकर
मुग्ध ही हो गये। चित्रकूटमें वे अपनी पत्नी रानी सुनयनासे कहते हैं-

सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि । भरत कथा भव बंध बिमोचनि ॥
धरम राजनय ब्रह्मबिचारू । इहाँ जथामति मोर प्रचारू।।

सो मति मोरि भरत महिमाही। कहै काह छलि छुअति न छाँही ॥
बिधि गनपति अहिपति सिव सारद । कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद ॥
चरित कीरति करतूती । धरम सील गुन बिमल बिभूती॥
समुझत सुनत सुखद सब काहू । सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू

भरत अमित महिमा सुनु रानी। जानहिं रामु न सकहिं बखानी ।।
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देबि परंतु भरतरघुबर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी।
भरतु अवधि सनेह ममता की। जद्यपि रामु सीम समता की।
परमारथस्वारथसाधन सिद्धि रामसुख सारे।
भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे ।
साधन सिद्धि राम पग नेहू । मोहि लखि परत भरत मत एहू ॥

भरतजी महाराज प्रेममयी भक्तिके अगाध सागर थे, या यों
कहिये कि वे साक्षात् प्रेमकी मूर्ति ही थे। जहाँ-कहीं भरतजीका
चरित्र देखते हैं, वहीं प्रेमका समुद्र लहराता दीखता है। इसके
सिवा, वे सद्गुण-सदाचारमें भी अद्वितीय थे। जिनके गुण, चरित्र,
स्वभाव और प्रेमको देखकर श्रीरामचन्द्रजी भी मुग्ध हो गये। वे
कहते हैं-
तात भरत तुम्ह धरम धुरीना । लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना ॥
करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात ।
गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात ॥



भरतजीकी महिमा कहाँतक बतलायी जाय? उनकी महिमा
रामायणमें भरी पड़ी है। यहाँ तो केवल संक्षेपमें कुछ
दिग्दर्शन कराया
गया है। लेखका कलेवर न बढ़ जाय, इसलिये अधिक प्रमाण उद्धृत
नहीं किये गये।

अब भक्तिके उपर्युक्त नौ प्रकार श्रीभरतजीके जीवन-चरित्रमें जिस
प्रकार घटित हुए हैं, इसका महाभारत, श्रीरामचरितमानस, पद्मपुराण,
वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण आदि ग्रन्थोंके आधारपर कुछ
दिग्दर्शन कराया जाता है।
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मां दुर्गा के एक सौ आठ नाम # जय माता दी

शंकरजी पार्वतीजीसे कहते हैं-  हे ! कमलसमान नयनों वाली। अब मैं अष्टोत्तरशतनामका
वर्णन करता हूँ, सुनो ....
जिसके प्रसाद (पाठ या श्रवण)-मात्रसे परम
साध्वी भगवती दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं॥१॥


१-ॐ सती, २-साध्वी, ३-भवप्रीता (भगवान् शिवपर प्रीति
रखनेवाली), ४-भवानी, ५-भवमोचनी (संसारबन्धनसे मुक्त करनेवाली),
६-आर्या,७-दुर्गा, ८-जया, ९-आद्या, १०-त्रिनेत्रा, ११-शूलधारिणी,
१२-पिनाकधारिणी, १३-चित्रा, १४-चण्डघण्टा (प्रचण्ड स्वरसे घण्टानाद
करनेवाली), १५-महातपा (भारी तपस्या करनेवाली), १६-मन (मनन-
शक्ति), १७-बुद्धि (बोधशक्ति), १८-अहंकारा (अहंताका आश्रय),
१९-चित्तरूपा, २०-चिता, २१-चिति (चेतना), २२-सर्वमन्त्रमयी, २३-सत्ता
(सत्-स्वरूपा), २४-सत्यानन्दस्वरूपिणी, २५-अनन्ता (जिनके
स्वरूपका कहीं अन्त नहीं),२६-भाविनी (सबको उत्पन्न करनेवाली),
२७-भाव्या (भावना एवं ध्यान करनेयोग्य), २८-भव्या (कल्याणरूपा),
२९-अभव्या (जिससे बढ़कर भव्य कहीं है नहीं), ३०-सदागति,
३१-शाम्भवी (शिवप्रिया), ३२-देवमाता, ३३-चिन्ता, ३४-रत्नप्रिया,
३५-सर्वविद्या, ३६-दक्षकन्या, ३७-दक्षयज्ञविनाशिनी, ३८-अपर्णा (तपस्याके
समय पत्तेको भी न खानेवाली), ३९-अनेकवर्णा (अनेक रंगोंवाली),
४०-पाटला (लाल रंगवाली), ४१-पाटलावती (गुलाबके फूल या लाल फूल
धारण करनेवाली), ४२-पट्टाम्बरपरीधाना (रेशमी वस्त्र पहननेवाली),
४३-कलमंजीररंजिनी (मधुर ध्वनि करनेवाले मंजीरको धारण करके प्रसन्न
रहनेवाली), ४४-अमेयविक्रमा (असीम पराक्रमवाली), ४५-क्रूरा (दैत्योंके
प्रति कठोर), ४६-सुन्दरी, ४७-सुरसुन्दरी, ४८-वनदुर्गा, ४९-मातंगी,
५०-मतंगमुनिपूजिता, ५१-ब्राह्मी, ५२-माहेश्वरी, ५३-ऐन्द्री, ५४-कौमारी,
५५-वैष्णवी, ५६-चामुण्डा, ५७-वाराही, ५८-लक्ष्मी, ५९-पुरुषाकृति,

१७ ॥ ६० - विमला , ६१ - उत्कर्षिणी , ६२ - ज्ञाना , ६३ क्रिया , ६४ - नित्या , ६५ - बुद्धिदा , ६६ - बहुला , ६७ - बहुलप्रेमा , ६८ - सर्ववाहनवाहना , ६ ९- निशुम्भ - शुम्भहननी , ७० - महिषासुरमर्दिनी , ७१ - मधुकैटभहन्त्री , ७२ - चण्डमुण्डविनाशिनी , ७३ - सर्वासुरविनाशा , ७४ - सर्वदानवघातिनी , ७५- सर्वशास्त्रमयी , ७६ - सत्या , ७७ - सर्वास्त्रधारिणी , ७८ अनेकशस्त्रहस्ता , ७ ९ अनेकास्त्रधारिणी , ८० - कुमारी , ८१ - एककन्या , ८२ - कैशोरी , ८३ - युवती , ८४ - यति , ८५ - अप्रौढा , ८६ - प्रौढा , ८७ - वृद्धमाता , ८८ - बलप्रदा , ८ ९ - महोदरी , ९ ० - मुक्तकेशी , ९ १ - घोररूपा , ९ २ - महाबला , ९ ३ - अग्निज्वाला , ९ ४ - रौद्रमुखी , ९ ५ - कालरात्रि , ९ ६ - तपस्विनी , ९ ७ - नारायणी , ९ ८ भद्रकाली , ९९ - विष्णुमाया , १००- जलोदरी , १०१ - शिवदूती , १०२ - कराली , १०३ - अनन्ता ( विनाशरहिता ) , १०४ - परमेश्वरी , १०५ - कात्यायनी , १०६ सावित्री , १०७- प्रत्यक्षा , १०८ - ब्रह्मवादिनी ॥ २-१५ ॥

देवी पार्वती ! जो प्रतिदिन दुर्गाजीके इस अष्टोत्तरशतनामका पाठ करता है , उसके लिये तीनों लोकोंमें कुछ भी असाध्य नहीं है ॥ १६ ॥
वह धन , धान्य , पुत्र , स्त्री , घोड़ा , हाथी , धर्म आदि चार पुरुषार्थ तथा अन्त सनातन मुक्ति भी प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥ कुमारीका पूजन और देवी सुरेश्वरीका ध्यान करके पराभक्तिके साथ उनका पूजन करे , फिर अष्टोत्तरशत नामका पाठ आरम्भ करे ॥ १८ ॥ देवि ! जो ऐसा करता है , उसे सब श्रेष्ठ देवताओंसे भी सिद्धि प्राप्त होती है । राजा उसके दास हो जाते हैं । वह राज्यलक्ष्मीको प्राप्त कर लेता है ॥ १ ९ ॥ गोरोचन , लाक्षा , कुंकुम , सिन्दूर , कपूर , घी ( अथवा दूध ) , चीनी और मधु - इन वस्तुओंको एकत्र करके इनसे विधिपूर्वक यन्त्र लिखकर जो विधिज्ञ पुरुष सदा उस यन्त्रको धारण करता है , वह शिवके तुल्य ( मोक्षरूप ) हो जाता है ॥ २० ॥ भौमवती अमावास्याको आधी रातमें , जब चन्द्रमा शतभिषा नक्षत्रपर हों , उस समय इस स्तोत्रको लिखकर जो इसका पाठ करता है , वह सम्पत्तिशाली होता है ॥


Shankarji says to Parvati: Kamalnane.  
I describe, listen whose offerings (recitation or hearing) - only by the supreme
Sadhvi Bhagwati Durga becomes pleased॥1॥
1-ॐ Sati, 2-Sadhvi, 3-Bhavpreeta (love to Lord Shiva)
Keeper), 4-Bhavani, 5-Bhavamochani (liberator from worldly bondage),
6-Arya, 7-Durga, 8-Jaya, 9-Adya, 10-Trinetra, 11-Suldharini,
12-Pinakadharini, 13-Chitra, 14-Chandghanta
One who does), 15-Mahatpa (one who does heavy penance), 16-Mana (Contemplation-
Shakti), 17-intellect (perception), 18-ahamkara (shelter of the ego),
19-chittarupa, 20-pita, 21-chitti (consciousness), 22-sarvamantramayi, 23-satta
(Sat-Swarupa), 24-Satyanandaswarupini, 25-Ananta (whose
There is no end to the form), 26-Bhavini (the creator of all),
27-bhavya (feeling and meditating), 28-bhavya (welfare),
29-Abhavya (there is nothing more grand than which), 30-Sadgati,
The universal truth
सर्वास्त्रधारिणी तथा ॥११॥
31-Shambhavi (Shivapriya), 32-Devmata, 33-Chinta, 34-Ratnapriya,
35-Sarvavidya, 36-Dakshakanya, 37-Dakshayajnavinashini, 38-Aparna (Tapasyake)
Not even eating the leaves of the time), 39-multi-colored (multi-colored),
40-Patla (red), 41-Patlavati (rose flower or red flower)
Wearer), 42-Pattambarparidhana (wearer of silk garments),
43-Kalamanjiraranjini (happy sounding manjira wearing pleasure
Living), 44-Ameyavikrama (Infinite Might), 45-Cruel (Demons)
Per hard), 46-Sundari, 47-Surasundari, 48-Vandurga, 49-Matangi,
50-Matangmunipujita, 51-Brahmi, 52-Maheshwari, 53-Andri, 54-Kaumari,
55-Vaishnavi, 56-Chamunda, 57-Varahi, 58-Lakshmi, 59-Purushakriti,

Dhan hastanmava cha dhanya sut jaya hay chaturvargam tatha chante labhenmuktin cha shasvatim.  १७॥  60 - Vimala, 61 - Utkarshini, 62 - Jnana, 63 Kriya, 64 - Nitya, 65 - Buddhida, 66 - Bahula, 67 - Bahulprema, 68 - Sarvavahanavahana, 69 - Nishumbha - Shumbhahani, 70 - Mahishasurmardini, 71 - Madhukaitbhahantri,  72 - Chandamundavinashini, 73 - Sarvasuravinasha, 74 - Sarvadanavaghatini, 75 - Sarvashastramayi, 76 - Satya, 77 - Sarvastradharini, 78 Anekashastrahastha, 79 Anekastradharini, 80 - Kumari, 81 - Ekkanya, 82 - Kishori, 83 - Yuvati, 84 -  , 85 - Immature, 86 - Adult, 87 - Old Mother, 88 - Balprada, 89 - Mahodari, 90 - Muktakeshi, 91 - Ghorrupa, 92 - Mahabala, 93 - Agnijwala, 94 - Raudramukhi, 95 -  Kalaratri, 96 - Tapaswini, 97 - Narayani, 98 Bhadrakali, 99 - Vishnumaya, 100 - Jalodari, 101 - Shivaduti, 102 - Karali, 103 - Ananta (without destruction), 104 - Parameshwari, 105 - Katyayani, 106 Savitri,  107- Pratyaksha, 108- Brahmavadini.  2-15  Goddess Parvati!  Nothing is impossible in the three worlds for one who recites this Ashtottarshatnam of Durgaji every day.  १६॥

He attains wealth, grain, son, wife, horse, elephant, religion, etc., for the four purusharthas and finally eternal liberation.  १७॥  Worship the virgin and meditate on Goddess Sureshwari and worship her with devotion, then start the lesson called Ashtottarshat.  18  Goddess!  He who does so, also attains perfection from all the supreme deities.  The kings become his slaves.  He gets Rajyalakshmi.  19  Gorochan, Laksha, turmeric, vermilion, camphor, ghee (or milk), sugar and honey - by collecting these objects and writing instruments from them methodically, the jurist who always wears that instrument becomes equivalent to Shiva (Moksha).  20  At the midnight of Bhavavati Amavasya, when the moon is on the constellation Shatabhisha, whoever writes this hymn and recites it at that time, is rich.  

जय माता दी # jai mata di


🌹   शक्ति ही जीवन और जगत का आधार है। शक्ति के विना जीवन अधूरा और निष्प्राण हो जाता है। जीवनदायिनी शक्ति की पूजा का पर्व ही नवरात्र है। नवरात्र के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। ब्रह्म चारिणी अर्थात व्रह्म को भी चारण यानि अनुशासित करने वाली शक्ति।🌹
   🌹 ब्रह्मचारिणी का दूसरा अर्थ है जो ब्रह्म में ही विचरण करे जो स्वयं ही ब्रह्म स्वरुप हो जाए। इन देवी के बारे में कहा जाता है ये अति सौम्य, सरल, सदा प्रसन्न रहने वाली और कभी भी क्रोध ना करने वाली देवी है।🌹
   🌹 जिस जीवन में विनम्रता, सहजता होगी और पवित्रता होगी, वहाँ ब्रह्म जरूर आते हैं। क्रोध जीवन की ऊर्जा का ह्रास करता है। क्रोध भय, अशांति, विषाद देता है। क्रोध से अपने लोग भी एक दिन पराये हो जाते हैं। कभी भी क्रोध ना करने के कारण ही देवी ब्रह्म चारिणी शक्ति संपन्न होकर सबको नियंत्रित कर रही हैं।🌹
*सफल जीवन के चार* 
                         सूत्र
           *मेहनत करे तो धन बने,*
              *सबर करे तो काम•••••*

             *मीठा बोले तो पहचान बने,*
                            *और* 
                *इज्जत करे तो नाम•।।


       



                  🌹कोई भी यज्ञ हो वहाँ 🌹


       1यज्ञ कुंड का होना अनिवार्य ह
     2 दूसरा ...उसमें अग्नि प्रगट करना होता है ,
      3~: तीसरा महत्त्व का अंग है समीध ,
     4~: चौथा है घृत ...घी ,
   5~: पाँचवा  पवित्र जल की ज़रूरत पड़ती है ,
    6~: छट्ठी वस्तु , यज्ञ कराने वाले कोई आचार्य ,
जो यज्ञ की महिमा समझाये ,
   7~: और आखिर में , कोई यजमान चाहिये ।

      ये है छोटा सा formula सेवा यज्ञ का ,
       तलगाजरडा को ये समझा है कि ,

    1~: सेवा यज्ञ की वेदिका /यज्ञ कुंड है 
         शुरुआत में खालीपन , शून्यता फिर बाद में 
तुम द्रव्य डालो , समीध प्रगटाओ 
      और फिर भस्म निर्माण हो , वो सब पहले खाली हो तो 
    पहले नितांत खालीपना , ये यज्ञ कुंड है ।

2~: सेवा यज्ञ की अग्नि है तीव्रता ,
उष्णता नहीं , प्रभु करे हमारा लक्ष्य पूरा हो ,
उदासीनता नहीं आनी चाहिये ,
तीव्रता बनी रहे , वो लपटें कमजोर नहीं होनी चाहिये , 
वो पवित्र हेतु का विचार कमजोर ना पड़े ।
क्यूँकी ऐसे यज्ञ करो तो हमें सलाह देने वाले बहुत होते हैं स्वभाव की शीतलता के साथ 1 तीव्रता होनी चाहिये।
 ऐसी 1 मीठी अग्नि , ऐसी 1 ठंडी अग्नि ,
जो जलाये नहीं , जागृत करे ।

3~: समीध - हमें खुद के कार्य के लिये 
संदेह पैदा नहीं होना चाहिये ,
संशय के समीध को जलाना होगा ।

4~: पवित्र जल - परिश्रम से निकला पसीना 
और संवेदना से गिरते आँख के आँसू ।

5~: घी- हमारे जीवन में सहज स्नेह ,
ये घी है , हमारी भक्ति , हमारा भाव , ये घी है ।

6~: आचार्य - ऐसे पवित्र सेवा यज्ञ के लिये 
सब का शुभ हो ऐसा विचार रखने वाला ,
ये आचार्य है जग मंगल का विचार ,
विश्व में कोई भी दे , वो सब आचार्य हैं ।

7~: यजमान - जो खुले हाथों से भाव समर्पित करता है ,
वो सेवा यज्ञ का यजमान है ।

#प्रिय_बापू के शब्द 
मानस ~: सेवा यज्ञ 
कथा ~: सावरकुंडला , गुजरात ।
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                         हिन्दी शायरी दिल से 

 


jai mata di# जय मां #

            इसइस 🌷नवरात्रे🌹 माँ दुर्गा आपकी कामना पूरी करें , माँ नैना आपकी नैनों को ज्योति दे , माँ चिंतपूर्णी आपकी चिंता हरे , माँ काली आपके शत्रुओं का नाश करे , माँ मनसा आपकी हर मनोकामना पूरी करे , माँ शेरों वाली आपके परिवार को सुख शान्ति दे , माँ ज्वाला आपके जीवन में रौशनी दे , माँ लक्ष्मी आपको धन से मालामाल करे।

                    मां तू हर रुप में प्यारी है। 
                             दुर्गा देवी मंत्र
               सब प्रकार के कल्याण के लिये

“सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥”

   दुःख दर्द  दरिद्रता दूर करने के लिए 

“दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो:
स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्र्यदु:खभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता॥”

वित्त, समृद्धि, वैभव एवं दर्शन हेतु
यदि चापि वरो देयस्त्वयास्माकं महेश्वरि।।
संस्मृता संस्मृता त्वं नो हिंसेथाः परमापदः।
यश्च मर्त्यः स्तवैरेभिस्त्वां स्तोष्यत्यमलानने।।
तस्य वित्तर्द्धिविभवैर्धनदारादिसम्पदाम्।
वृद्धयेऽस्मत्प्रसन्ना त्वं भवेथाः सर्वदाम्बिके।।

संतान प्राप्ति हेतु

“नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भ सम्भवा।
ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी”

बाधामुक्त होकर धन-पुत्रादि की प्राप्ति के लिये

“सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वित:।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय:॥”

संकट को दूर करने हेतु
ॐ इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति।
तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम्ॐ।।”

रक्षा के लिये

शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।
घण्टास्वनेन न: पाहि चापज्यानि:स्वनेन च॥

शक्ति प्राप्ति के लिये

सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्ति भूते सनातनि।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते॥

प्रसन्नता की प्राप्ति के लिये

प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि।
त्रैलोक्यवासिनामीडये लोकानां वरदा भव॥

आरोग्य और सौभाग्य की प्राप्ति के लिये

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

रोग नाश के लिये

“रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥” (अ

विपत्ति नाश के लिये

“शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥” (अ॰११, श्लो॰१२)

भय नाश के लिये

“सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते।
भयेभ्याहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥
एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम्।
पातु न: सर्वभीतिभ्य: कात्यायनि नमोऽस्तु ते॥
ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम्।
त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते॥ ”

       

 🙏🚩जय माता दी🚩🙏🌷 नवरात्रे माँ दुर्गा आपकी कामना पूरी करें , माँ नैना आपकी नैनों को ज्योति दे , माँ चिंतपूर्णी आपकी चिंता हरे , माँ काली आपके शत्रुओं का नाश करे , माँ मनसा आपकी हर मनोकामना पूरी करे , माँ शेरों वाली आपके परिवार को सुख शान्ति दे , माँ ज्वाला आपके जीवन में रौशनी दे , माँ लक्ष्मी आपको धन से मालामाल करे।

        🙏🚩जय माता दी🚩🙏

                   दुर्गा स्तोत्र

जय भगवति देवि नमो वरदे जय पापविनाशिनि बहुफलदे।जय शुम्भनिशुम्भकपालधरे प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे॥1॥⚘⚘जय चन्द्रदिवाकरनेत्रधरे जय पावकभूषितवक्त्रवरे।जय भैरवदेहनिलीनपरे जय अन्धकदैत्यविशोषकरे॥2॥⚘जय महिषविमर्दिनि शूलकरे जय लोकसमस्तकपापहरे।जय देवि पितामहविष्णुनते जय भास्करशक्रशिरोवनते॥3॥⚘जय षण्मुखसायुधईशनुते जय सागरगामिनि शम्भुनुते।जय दु:खदरिद्रविनाशकरे जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे॥4॥⚘जय देवि समस्तशरीरधरे जय नाकविदर्शिनि दु:खहरे।जय व्याधिविनाशिनि मोक्ष करे जय वाञ्छितदायिनि सिद्धिवरे॥5॥⚘एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं य: पठेन्नियत: शुचि:।गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा॥6॥⚘


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⚘जय भगवति देवि नमो वरदे जय पापविनाशिनि बहुफलदे।

जय शुम्भनिशुम्भकपालधरे प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे॥1॥⚘⚘

⚘जय चन्द्रदिवाकरनेत्रधरे जय पावकभूषितवक्त्रवरे।

जय भैरवदेहनिलीनपरे जय अन्धकदैत्यविशोषकरे॥2॥⚘⚘

⚘जय महिषविमर्दिनि शूलकरे जय लोकसमस्तकपापहरे।

जय देवि पितामहविष्णुनते जय भास्करशक्रशिरोवनते॥3॥⚘⚘

⚘जय षण्मुखसायुधईशनुते जय सागरगामिनि शम्भुनुते।

जय दु:खदरिद्रविनाशकरे जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे॥4॥⚘⚘

⚘जय देवि समस्तशरीरधरे जय नाकविदर्शिनि दु:खहरे।

जय व्याधिविनाशिनि मोक्ष करे जय वाञ्छितदायिनि सिद्धिवरे॥5॥⚘⚘

⚘एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं य: पठेन्नियत: शुचि:।

गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा॥6॥⚘⚘

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जय दुर्गा भवानी # jai mata di

🙏🏻🌹ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।।🙏🏻🌹

इस नवरात्रि मां दुर्गा आपको सुख समृद्धि वैभव और ख्याति प्रदान करें।
🌹जय माता दी।🌹
शारदीय नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं।🌹🌹🌹



जिंदगी की हर तमन्ना हो पूरी
कोई भी आरजू ना रहे अधूरी
करते हैं हाथ जोड़कर मां दुर्गा से बिनती
की आपकी हर मनोकामना हो पूरी
शारदीय नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं।🌹🌹🌹

*या देवी सर्व भूतेषु माँ रूपेण संस्थिता।*
*या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।*
*या देवी सर्व भूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता।*
*या देवी सर्व भूतेषु लक्ष्मी रूपेण संस्थिता।*
*नमस्तस्यै। नमस्तस्यै।*
*नमस्तस्यै। नमो नमः।।*
  *नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ*
    *जय माता दी🙏*

                      चप्पल बाहर क्यों 
                              उतारते हैं

मंदिर में प्रवेश नंगे पैर ही करना पड़ता है, यह नियम दुनिया के हर हिंदू मंदिर में है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण यह है कि मंदिर की फर्शों का निर्माण पुराने समय से अब तक इस प्रकार किया जाता है कि ये इलेक्ट्रिक और मैग्नैटिक तरंगों का सबसे बड़ा स्त्रोत होती हैं। जब इन पर नंगे पैर चला जाता है तो अधिकतम ऊर्जा पैरों के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाती है।

     दीपक के ऊपर हाथ
      घुमाने का वैज्ञानिक      
              कारण

आरती के बाद सभी लोग दिए पर या कपूर के ऊपर हाथ रखते हैं और उसके बाद सिर से लगाते हैं और आंखों पर स्पर्श करते हैं। ऐसा करने से हल्के गर्म हाथों से दृष्टि इंद्री सक्रिय हो जाती है और बेहतर महसूस होता है।

       मंदिर में घंटा लगाने 
           का कारण

जब भी मंदिर में प्रवेश किया जाता है तो दरवाजे पर घंटा टंगा होता है जिसे बजाना होता है। मुख्य मंदिर (जहां भगवान की मूर्ति होती है) में भी प्रवेश करते समय घंटा या घंटी बजानी होती है, इसके पीछे कारण यह है कि इसे बजाने से निकलने वाली आवाज से सात सेकंड तक गूंज बनी रहती है जो शरीर के सात हीलिंग सेंटर्स को सक्रिय कर देती है।

       भगवान की मूर्ति

मंदिर में भगवान की मूर्ति को गर्भ गृह के बिल्कुल बीच में रखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस जगह पर सबसे अधिक ऊर्जा होती है जहां सकारात्मक सोच से खड़े होने पर शरीर में सकारात्मक ऊर्जा पहुंचती है और नकारात्मकता दूर भाग जाती है।

       परिक्रमा  करने के 
      पीछे वैज्ञानिक कारण

हर मुख्य मंदिर में दर्शन करने और पूजा करने के बाद परिक्रमा करनी होती है। परिक्रमा 8 से 9 बार करनी होती है। जब मंदिर में परिक्रमा की जाती है तो सारी सकारात्मक ऊर्जा, शरीर में प्रवेश कर जाती है और मन को शांति मिलती है।
            🙏🏻: कृपया सनातन धर्म के मंदिर पूजन के प्रति इन वैज्ञानिक आधारों को ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिए ताकि आम जन मंदिर की इन व्यवस्थाओं को समझ सके..
                🙏🙏जय मां चिंतपूर्णी की 🙏🙏


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*हमने सोचा था कि बताएंगे सब दुःख दर्द तुमको....*

*पर तुमने तो इतना भी न पूछा कि खामोश क्यों हो*




तेरे ख़्याल में जब 
बे-ख़्याल होता हूँ,,

थोड़ी देर ही सही 
बे-मिसाल होता हूँ...!!!


वो बर्फ़ का शरीफ टुकड़ा, जाम में क्या गिरा....
धीरे धीरे, खुद-ब-खुद, शराब हो गया....!!!!
               
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                                हिन्दी शायरी दिल से

love# emotional shayari

न शाम की ख्वाहिश न रात की चाहत है...
वो  जिस पहर मिले उस पहर से मोहब्ब्त है...

न शाम की ख्वाहिश न रात की चाहत है...
वो  जिस पहर मिले उस पहर से मोहब्ब्त है...

अच्छा लिखना ही सब कुछ नहीं होता जनाब,

पढ़ने वाले भी तो दिलदार होने चाहिए....
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                    हिन्दी शायरी दिल से 

attitude shayari



दो बूंदे क्या बरसी, 
चार बादल क्या छा गये,, 
किसी को जाम तो
 किसी को कुछ नाम याद आ गये.


अब दिल  पे लग जाती  है हमारी बातें,

जो  कहते थे तुम  कुछ भी कहते हो  अच्छा लगता है..
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attitude shayari, kavita,hindi shayari

चमक हैं चांद में मुझसेऐसे अंदाज मेरे हैं
यह तारे आसमानों मेंहम जैसों ने बिखेरे हैं।।

मुझे मुझसे मोहब्बत हैयह दर्पण बोल देता है
झूठ कितना है रिश्तो मेंपोल सब खोल देता है
मुझे चुपके से कहता हैदीवाने हम भी तेरे हैं।।

यह जीवन है मेरा अपनामेरे संघर्ष अपने हैं
चांद को छू के आना हैआंखों में ऐसे सपने हैं
हंस के दिल चुराते हैंदिलो के हम लुटेरे हैं

जो पाना है वो पाएंगेजिसे खोना है खो देंगे
कभी जब टूट जाएं हमसरे महफिल में रो लेंगे
हमने दर्द के मोतीयह कागज पर उकेरे हैं

नफरत करने वालों सेमोहब्बत है हमें ज्योति
बांटता  है वही इंसानचीज जो पास है होती
प्यार जिस दिल में रहता हैउस दिल में रब के डेरे हैं
                                                  अचला एस गुलेरिया
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शेषावतार लक्ष्मण जी


 
बंदउं लछमन  पद जलजाता ।।
सीतल सुबोध भगत सुखदाता।।

  श्रीराम के चतुर्भुज स्वरूप में से एक रुप लक्ष्मण जी का है। बाल्मीकि जी उन्हें
सहससीसु अहीसु महीधरु
कह कर भगवान शेष का अवतार है ।श्री राम की सेवा करना ही उनके जीवन का एकमात्र व्रत है। जब भी बहुत छोटे थे पलने में ही थे तभी से श्री रघुनाथ के अनुयायी हैं ।
विश्वामित्र यज्ञ रक्षा करने यह राम जी के साथ गए। तब बड़े भाई की संपूर्ण सेवा स्वयंकरते थे। रात्रि में जब दोनों भाई मुनि विश्वामित्र के चरण  दबा कर  उनकी आज्ञा से विश्राम करने आते हैं तब लक्ष्मण जी बड़े भाई के चरण  दबाते हैं।बहुत कहने पर सोने के लिए जाते थे। लक्ष्मण जी वैसे तो बड़े सुशील शांत  स्वभाव  के हैं परंतु कोई श्रीराम का किसी प्रकार के अपमान करें तो यह इनसे सहन नहीं होता फिर यह अत्यंत उग्र होते हैं और तब किसी को कुछ भी नहीं गिनते थे ।
जब जनकपुर में राजाओं के द्वारा धनुष ना उठने पर जनक जी ने कहा मैंने समझ लिया कि अब पृथ्वी में कोई वीर नहीं रहा तब कुमार लक्ष्मण को लगा कि इससे तो श्री राम के बल का भी अपमान होता है

वे यह सोचते ही उग्र हो उठे उन्होंने जनक जी को चुनौती देकर अपना शौर्य प्रकट किया इसी प्रकार जब परशुराम बिगड़ते डांटते आए तभी लक्ष्मण जी ने उनका दर्प सहा नहीं गया ।यह श्री राम जी को अपना स्वामी मानते थे सेवक के रहते स्वामी का तिरस्कार हो ऐसे सेवक को धिक्कार है ।परशुराम जी को इन्होंने उत्तर ही नहीं दिया उनकी उनको युद्ध की चुनौती तक दे डाली । जब उन्होंने सुना कि पिता ने माता केकई के कहने पर राम को बनवास देना निश्चित किया है तब का कैकई और राजा पर इन्हें बड़ा क्रोध आया परंतु श्रीराम की इच्छा के विरुद्ध कुछ भी करना इन्हें अभीष्ट नहीं था। यदि राम जी बन जाते हैं तो लक्ष्मण कहां अयोध्या में रहने वाले हैं यह बात सभी जानते थे ।
जब प्रभु ने राजधर्म पिता माता की सेवा कर्तव्य समझा कर इन्हें रहने को कहा तब इनका मुख सूख गया व्याकुल होकर बड़े भाई के चरण पकड़ लिए और इन्होंने रोते रोते प्रार्थना की
गुरु पितु मातु न जानउं काहू
कहउं सुभाउ नाथ पतिआहू।।
जहं लगी जगत सनेह सगाई
प्रीति प्रतीति निगम  निजु गाई
मोरे सबइ एक तुम्ह स्वामी
दीन बंधु उर अंतरजामी।।
धर्म नीति उपदेसिअ ताही
कीर्ति भूति सुगति प्रिय जाही।।
मन क्रम वचन चरन रत होई ।
कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई।।

लक्ष्मणजी ने वन में सेवाव्रत लेकर भूख प्यास निद्रा थकावट आदि सब पर विजय प्राप्त कर ली ।वे सदा सावधान रहते थे मार्ग में चलते समय भी
सिय रामपद अंक बराएं।
लखन चलहिं मगु दाहिन लाएं

कहीं प्रभु के चरणों पर अपने पैर ना पड़ जाए इसके लिए वे सतत सावधान रहते थे। वनवास के समय भगवान ने स्वयं लक्ष्मण को अनेक बार ज्ञान वैराग्य भक्ति आदि के उपदेश किए हैं।
14 वर्ष के अखंड ब्रह्मचारी के बल पर ही यह मेघनाथ को युद्ध में जीत सके थे। श्री राम जी की आज्ञा से लक्ष्मण जी कठोर से कठोर कार्य को करने के लिए तैयार रहते थे ।सीता जी को वन में छुड़ाने का काम भरत और शत्रुघ्न जी ने स्पष्ट इंकार कर दिया लक्ष्मण जी के लिए यह हृदय पर पत्थर रखकर करने का काम था किंतु वे श्री राम की आज्ञा किसी प्रकार टाल नहीं सकते थे ।यह कार्य भी उन्होंने स्वीकार कर लिया।
श्रीराम एकांत में काल के साथ बात कर रहे थे उन्होंने यह निश्चय किया था कि इस समय यदि कोई यहां आ जाएगा तो उसे प्राण प्राण दंड दिया जाएगा लक्ष्मण जी को द्वार पर नियुक्त किया गया था ।उसी समय वहां दुर्वासा जी आए और तुरंत श्री राम को मिलने का आग्रह करने लगे ।
विलंब होने पर शाप देकर पूरे राजकुल को नष्ट कर देने की धमकी दी लक्ष्मण जी ने भगवान को जाकर संवाद सुनाया श्रीराम ने दुर्वासा जी का सत्कार किया ऋषि के चले जाने पर श्री रघुनाथ जी बहुत दुखी हुए ।प्रतिज्ञा के अनुसार लक्ष्मण जी को उसमें भीतर जाने के लिए प्राण दंड होना चाहिए था स्वामी को दुख ना हो उनकी प्रतिज्ञा रक्षित रहे इसलिए उन्होंने स्वयं मांग कर निर्वासन स्वीकार कर लिया क्योंकि प्रियजन का निर्वासन  प्राण दंड के समान होता है। इस प्रकार आजन्म श्री राम की सेवा करके श्रीराम के लिए उनका वियोग भी लक्ष्मण जी ने स्वीकार किया था।
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                            कल्याण के सौजन्य से
                        लेखिका अचलाएसगुलेरिया
।। जय सियाराम* ।।
सहजता अमृत है,असहजता विष हैं ।
ये कभी खत्म होने वाला नही,
देखने मात्र से तृप्ति हो जाती है..ये सहजामृत हैं ।
सहजता वो अमृत है जिसे पीना नही,जीना हैं ।
...बापू*
।। सहज ।।


Good evening

कौन समझेगा यहां की वीरानी देख के... इस जगह भी ठहरे थे  कभी काफ़िले मोहब्बत के...... Shayaripub.in पूछा जो उसने कैसे रहोगे ताउम्र तुम मेरे सा...