Shayari means "poetry" in english. But even after being synonymous to each other , both represent a very different depth to expression of the writer. Shayari is magical as it can mean different for every set of eyes that taste it through the sense of sight. It has no topic or a targeted demographic. It is made for everyone and everything. Though the great works in Shayari cannot be replicated but yes a new content based on our modern society can be created. The timelessness of shayari awaits.
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⚘दुर्गा स्तोत्र😡
⚘जय भगवति देवि नमो वरदे जय पापविनाशिनि बहुफलदे।⚘
⚘जय शुम्भनिशुम्भकपालधरे प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे॥1॥⚘
⚘जय चन्द्रदिवाकरनेत्रधरे जय पावकभूषितवक्त्रवरे।⚘
⚘जय भैरवदेहनिलीनपरे जय अन्धकदैत्यविशोषकरे॥2॥⚘
⚘जय महिषविमर्दिनि शूलकरे जय लोकसमस्तकपापहरे।⚘
⚘जय देवि पितामहविष्णुनते जय भास्करशक्रशिरोवनते॥3॥⚘
⚘जय षण्मुखसायुधईशनुते जय सागरगामिनि शम्भुनुते।⚘
⚘जय दु:खदरिद्रविनाशकरे जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे॥4॥⚘
⚘जय देवि समस्तशरीरधरे जय नाकविदर्शिनि दु:खहरे।⚘
⚘जय व्याधिविनाशिनि मोक्ष करे..
.. जय वाञ्छितदायिनि सिद्धिवरे॥5॥⚘
एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं य: पठेन्नियत: शुचि:।
⚘गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा॥6॥⚘
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हरे कृष्ण #hare krishna
श्रीकृष्णचन्द्र अपने सखा ग्वाल-बालोंकी मृत्युरूप अघासुरके
मुखसे रक्षा करके उन्हें यमुना-पुलिनपर ले
उनसे कहने लगे- "हे मेरे सखाओ! यह कालिंदी पुलिन
यमुनातट कितना सुरम्य है। यहाँ हमलोगोंके क्रीडा करने
योग्य समग्र सामग्री विद्यमान है। यहाँ गद्दे समान
अत्यन्त सुकोमल और स्वच्छ बालुका--यामुनरेणु विछी
है। वृक्षोंपर बैठे पक्षी अत्यन्त मधुर ध्वनि कर रहे हैं।
दूसरी ओर विकसित कमलोंकी सुगन्धसे आकृष्ट होकर
भ्रमर गुंजन कर रहे हैं। मानो ये पक्षी और मधुप हमारा
स्वागतगान कर रहे हैं ।
समय अधिक हो गया हैहमलोग क्षुधार्त्त भी हैं, सुतरां हमें यहीं भोजन कर लेना चाहिए
हमारे गोवत्स- बछड़े पासमें ही पानी पीकर
धीरे-धीरे घास चरते रहें
"चरन्तु
शनकैस्तृणम् ॥'
(श्रीमद्धा० १०।१३।६
श्रीठाकुरजीके प्रिय सखाओं ने कहा
कन्हैया भैया! ऐसा ही हो। तद्नन्तर उन्होने गोत्रों को
जल पिलाकर हरी-हरी घासोंमें छोड़ दिया।
समस्त सखा
श्रीभगवान् के सामने मण्डल बनाकर
बैठ गये। सबके मध्य में सबके प्यारे दुलारे, ऑँखोंके तारे श्रीकृष्णचन्द्रजी विराज रहे थे। सखाओंके नेत्र श्रीहरिके मुखको निहारकरआनन्दसे प्रफुल्लित हो रहे थे। यद्यपि सबका प्रभुकेसम्मुख होना सम्भव नहीं था तथापि श्रीहरिकी अचिन्त्यलीलाशक्तिने सबके सम्मुख सबके सामने लीलापुरुषोत्तम श्रीकृष्णचन्द्रको प्रकट कर दिया। व्रजेन्द्रन्दन श्रीकृष्णचन्द्रकामङ्गलमय मुखारविन्द प्रत्येक ग्वाल-बालकी ओर ही है।प्रत्येक सखाको प्रतीत हो रहा है--हमारा प्राणधन गोपालहमारी ओर स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखकर स्नेह सौहार्द्र की अजस्त्रधारा प्रवाहित करते हुए अवस्थित है-
"सहोपविष्टा
विपिने
विरेजु-
यथाम्भोरुहकर्णिकाया: ॥
आज ग्वाल-बालोंके भोजनपात्र भी अनोखे ही हैं।
कुछने कमलके पत्र आदिको लेकर अपना भोजनपात्र निर्मित
किया है। कुछने पवित्र कदली-पत्रको भोजनपात्र बनाया है।
कुछ गवाल-बालोंने प्रक्षालित प्रस्तरखण्डोंको ही अपने सामनेभोजनपात्रके लिये स्थापित कर लिया है।
श्रीकृष्णचन्द्रने अपनी मधुर वाणीसे कहा- हे समुज्ज्वल
निष्क-पदक धारण करनेवाले मेरे बन्धुओ! अपने-अपने
छीकों से सुन्दर सुस्वाद् भोजन -सामग्री निकालो-
भो भो भो भो उज्ज्वलनिष्का: निष्कासयत
भक्ष्य सामग्रीयमिति। ( श्रीआनन्दवृन्दावनचम्पू)
आज ग्वाल-बालोंके भोजनपात्र भी अनोखे ही हैं।
कुछने कमलके पत्र आदिको लेकर अपना भोजनपात्र निर्मित
य है। कछने पवित्र कदली-पत्रको भोजनपात्र बनाया है।
गवाल-बालोंने प्रक्षालित प्रस्तरखण्डोंको ही अपने सामने
भोजनपात्रके लिये स्थापित कर लिया है।
श्रीकृष्णचन्द्रने अपनी मधुर वाणीसे कहा- हे समुज्ज्वल
निष्क-पदक धारण करनेवाले मेरे बन्धुओ! अपने-अपने
छीकों सुन्दर सुस्वाद् भोजन -सामग्री निकालो-
भो भो भो भो उज्ज्वलनिष्का: निष्कासयत
भक्ष्य सामग्रीयमिति। ( श्रीआनन्दवृन्दावनचम्पू)
अपने प्राणसखा श्रीकृष्णचन्द्रके स्रेहिल वचनोंको
सुनकर सबने अपने अपने छींकेसे दही, भात, मीठा
मोदक, नमकीन, बड़ा, शाक भाजी, चटनी,
मुरब्बा, पायस आदि अनेक प्रकारके व्यअ्अन निकाले
और उन्हें पत्तों और पत्थरोंका पात्र बनाकर भोजन करने
लगे। सभी अपने- अपने भोजनोंके स्वादका वर्णन करते
थे। इस प्रकार हँसते -हँसाते भोजनानन्दका सब आनन्द
ले रहे थे। इस प्रकार सुखसागरमें निमग्र बालकवृन्द
भोजन करते हुए असीम आनन्दमें विभोर थे। स्वयं
करुणा-वरुणालय जगदीश्वररूपमें नित्य वर्तमान हैं, उनके सुखकी सीमाहो ही कैसे
सकती है ?
आकाशपथ विमानोंसे परिपूर्ण हो गया है। इस
अभृतपूर्व अप्रतिम मनोहर छविका दर्शन देवसमाज अपने
सहज निमेषोन्मेषरहित अपलक नेत्रोंसे- अतृप्त नेत्रोंसे कर
रहा है। सर्वयज्ञभोक्ताका यह भोजन- ऐसा वात्सल्य-
रससम्पुटित स्वच्छन्द भोजनकालीन विहार क्या बार-बार
देखनेको मिल सकता है ?
हिरण्यकशिपु नामक एक प्रतापी दैत्य था। घोर तप करके उसने ब्रह्माजीसेदान प्राप्त कर लिया था कि मैं न मनुष्यसे मरू न पशुसे; न दिनमें मरूँरातमें; न घरमें मरू न बाहर और अस्त्र-शस्त्रसे भी न मरूँ!' यह वरदान पाकर उसने सभी देवताओंको जीत लिया। उसके अत्याचारसे तीनों लोक कांपने लगे। वह किसीको यज्ञ, जप, तप, भजन-पूजन नहीं करने देता था।
इसके पुत्र प्रह्लाद बड़े भगवद्भक्त थे। इसलिये वह नाना प्रकारके कष्ट देकर प्रहलादजीको मार डालनेका प्रयत्न करने लगा; परन्तु जब उसके सारे प्रयत्न निष्फल हो गये, तब प्रहलादजीको खम्भेमें बाँधकर उन्हें मारनेके लिये तलवार उठाकर बोला--'कहाँ हैं तेरे भगवान् ! अब आकर वे तुझे बचावें तो देखूँ। प्रहलादजीने कहा- ' भगवान् तो सर्वत्र हैं। वे मुझमें, आपमें, तलवारमें और इस खम्भेमें भी हैं। इतना सुनते ही हिरण्यकशिपुने खम्भेपर एक घूँसा मारा।उसी समय खम्भेको फाड़कर भयंकर शब्द करते हुए नृसिंहभगवान् प्रकट हो
गये। उनका शरीर मनुष्यका और मुख सिंहका था। हिरण्यकशिपुको दरवाजेपरघसीटकर भगवान् ले गये और अपनी जाघोंपर पछाड़कर नखसे उसका पेट फाड़ दिया। हिरण्यकशिपुको मारकर भगवान् दैत्योंका राजा प्रहलादको बनादिया!
#सुप्रभात # Goodmorning # jai siyaram #
#जय सिया राम #
#jai siyaram# विनय पद #
काको नाम पतित-पावन जग, केहि अति दीन पियारे॥१॥
कौने देव बराइ बिरद-हित, हठि हठि अधम उधारे।
खग, मृग, ब्याध, पषान, बिटप जड़, जवन कवन सुर तारे । २।॥
देव, दनुज, मुनि, नाग, मनुज सब, माया-बिबस बिचारे।
तिनके हाथ दास तुलसी प्रभु, कहा अपनपौ हारे ॥ ३॥
भावार्थ-हे नाथ! आपके चरणोंको छोडकर और कहाँ जाऊँ ?
संसारमें 'पतित -पावन' नाम और किसका है ? (आपकी भाँति) दीन-दुःखियारे किसे बहुत प्यारे हैं ? ॥ १ ॥ आजतक किस देवताने अपने बाने को रखनेके लिये हठपूर्वक चुन-चुनकर नीचोंका उद्धार किया है ? किस देवता ने पक्षी (जटायु), पशु (ऋक्ष-वानर आदि), व्याध (वाल्मीकि), पत्थर अहिल्या), जड़ वृक्ष ((यमलार्जुन ) और यवनोंका उद्धार किया है ?॥ २॥देवता, दैत्य, मुनि, नाग, मनुष्य आदि सभी बेचारे मायाके वश हैं। (स्वयं
बँधा हआ दूसरोंके बन्धनको कैसे खोल सकता है इसलिये) हे प्रभो! यह तुलसीदास अपनेको उन लोगोंके हाथोंमें सौंपकर क्या करे ?॥ ३॥
नवमी संवत् १६६५ को ठीक श्रीराम-जन्मके समय जो
तेजोमय बालक हुआ, वही आगे जाकर समर्थ स्वामी
रामदासके नामसे प्रख्यात हुआ।
आठ वर्षकी अवस्थामें ही इन्होंने श्रीहनुमानजीको प्रसन्न कर लिया और उनकी कृपासे भगवान् *श्रीराम* के दर्शन भी इन्हें प्राप्त हुए।भगवान् श्रीरामने ही इन्हें मन्त्र दिया और इनका नाम रामदास रखा।
बारह वर्षकी अवस्थामें माता-पिताने इनके विवाहकी तैयारी की। महाराष्ट्र- -प्रथाके अनुसार जब 'शुभ लग्न सावधान' कहा गया, तब ये सचमुच सावधान हो गये। मण्डप उठकर भागे
और फिर बारह वर्षतक घरके लोगोंको इनका पता नहीं लगा।
घरसे भागकर तैरकर गोदावरी पार हुए और पैदल चलते हुए
पंचवटी पहुँच गये। नासिकके पास टाफली ग्राममें एक गुफामें इन्होंने निवास किया। तीन वर्षतक वहाँ तप करते रहे। वहाँफिर भगवान् श्रीरामके दर्शन हुए। भगवानके आदेश से श्रीसमर्थ तीर्थयात्रा करने निकले।
बारह वर्षतक तपस्या और बारह वर्षकी तीर्थयात्रा करके
समर्थ कृष्णा नदीके तटपर माहुली क्षेत्रमें रहने लगे। यही
अनेक संत मिलने आते थे। श्रीतुकारामजी भी यहीं मिले
थे।श्रीशिवाजी महाराज बार-बार श्रीसमर्थ का दर्शन करने
आते थे। सं० १७१२ में जब श्रीसमर्थ सातारा में राजद्वारापर भिक्षा माँगने पहुँचे, तब शिवाजी महाराजने एक कागजपर अपना पूरा राज देनेकी बात लिखकर कागज उनकी झोलीमें डाल दिया। समर्थ
स्वामी रामदासजीने शिवाजीको समझाया। गुरुके आदेशसे उनके प्रतिनिधिरूपमें शिवाजीने शासन-कार्य चलाना स्वीकार किया।समर्थ स्वामी रामदासजीके जीवनके सम्बन्धरमें अनेक चमत्कारपर्ण घटनाएँ कही जाती हैं। इन्होंने एक मृतक पुरुषको जीवित कर
दिया।
एक अन्धे कारीगरको नेत्र - ज्योति दी और उससे श्रीराम,
लक्ष्मण, जानकी तथा हनुमानजी की मू्तियाँ बनवा्यीं।
महाराष्ट्र-युवकोंमें इन्होंने एक अद्भुत शक्तिका संचार
किया। उनमें धार्मिक चेतना तथा संगठनकी भावना उत्पन्न कर दी। इनके बहुत-से ग्रन्थ मराठीमें हैं जो तत्त्वज्ञान एवं उत्तम शिक्षासे पूर्ण हैं। दासबोध उनका सबसे प्रसिद्ध ग्रन्थ है।
सज्जनगढ़में माध कृष्ण ९ संवत् १७३९ को स्नान करके
भगवान् श्रीरामकी मूर्तिके सामने आसन लगाकर समर्थ बैठ गये। इक्कीस बार ⚘'हर हर' ⚘कहकर जैसे ही अन्तमें उन्होंने⚘श्रीराम ⚘कहा-वैसे ही उनके मुखसे एक ज्योति निकलकरश्रीरामकी मूर्तिमें प्रविष्ट हो गयी!!
Good evening
कौन समझेगा यहां की वीरानी देख के... इस जगह भी ठहरे थे कभी काफ़िले मोहब्बत के...... Shayaripub.in पूछा जो उसने कैसे रहोगे ताउम्र तुम मेरे सा...
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जग तो देखे महज प्रस्तुतीकरण तुम्हारा ईश्वर सदा ही देखे अंतः करण तुम्हारा धर्म-कर्म सब उसको अर्पित कर दो अपने सहज भाव से पूरे हो...
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वो हमारे दिल से निकलने का रास्ता भी नहीं ढूंढ सके जो कहते थे.. तुम्हारी रग रग से वाकिफ हैं हम.. Shayaripub.in

