Shayari means "poetry" in english. But even after being synonymous to each other , both represent a very different depth to expression of the writer. Shayari is magical as it can mean different for every set of eyes that taste it through the sense of sight. It has no topic or a targeted demographic. It is made for everyone and everything. Though the great works in Shayari cannot be replicated but yes a new content based on our modern society can be created. The timelessness of shayari awaits.
प्रेम अपरिभाषित है#love#Goodmorning#
प्रेम अपरिभाषित
परमात्मा
का प्रेम क्या है?
यह एक विराट सागर है।
जिसके अनुभव को
शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।
जो इस प्रेम को पा लेता है,
उसके लिए कोई दुख नहीं बचता,
न कोई बुढ़ापा और न कोई मृत्यु।
परमात्मा का प्रेम
आपको बोध कराता है कि आप
शरीर नहीं, शुद्ध चेतना हैं।
आपका कोई जन्म या मृत्यु नहीं है।
और इस शुद्ध चेतना में जीना ही
परम सुख की स्थिति है
आनन्द की स्थिति है।
जीवन की संगति में जीना है।
ओशो
प्रेम अपरिभाषित
पावन नेह सदा ध्रुवनंदा सा बहेगाजगत में प्रेम अपरिभाषित रहेगा
अग्रज वंदना "र"कर रहा है।
देखो बड़ों को नमन कर रहा है।।
छोटों को अंक में "प"भर रहा है
परस्पर स्नेह यह शाश्वत रहेगा ।।
जगत में प्रेम अपरिभाषित रहेगा
कर्म पथ की ऊंची डगर पर चला है ।
"ए "देखो गौरव से कैसे खड़ा है ।।
अकेले खड़े रहना अपनों की खातिर
हम सब को यह सिखाता रहेगा।।
जगत में प्रेम अपरिभाषित रहेगा
ममता मां मरम जिसमें छुपे हैं ।
मान ,नियम ,जिसके आगे झुके हैं।।
संयोग वियोग के भावजगत में
प्रणय को" म"ही सुभाषित करेगा ।।
जगत में प्रेम अपरिभाषित रहेगा
प्रकृति की यह प्रिय सन्नतति है
सम्पूर्ण विश्व इसकी सहज उत्पत्ति है
मानवीय संस्कार सबको सिखा कर
भावों के नूतन रंग भरेगा।।
जगत में प्रेम अपरिभाषित रहेगा ।।
अचला एस गुलेरिया
emotional shayari
मैं दरिया भी किसी गैर के हाथों से न लूं।
एक कतरा भी समन्दर है अगर तू देदे।।
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जहाँ तक तुम ने छुआ वही तक जिया हूँ,
बाकी सिर्फ खयाल हूँ, ख्वाब हूँ, धुआँ हूँ.. shayaripub.com
सुनसुनो ना
जैसे
बेमौसम बारिश की
कुछ बूंदें
शाख के पत्तें गीले
कर देती है,
तुम भी
अनायास ऐसे ही मेरी
जिंदगी में आकर
मुझे
प्रेम से भिगो दो....!!!
Shayaripub.com
सुनो ना!
जैसे
बेमौसम बारिश की
कुछ बूंदें
शाख के पत्तें गीले
कर देती है,
तुम भी
अनायास ऐसे ही मेरी
जिंदगी में आकर
मुझे
प्रेम से भिगो दो....!!!
हरे कृष्ण # hare krishna
*अनुभव कहता है कि थोड़ा सोच समझ कर बोलिये अपनों से भी...*
*क्योंकि वे इतनी जल्दी बातें नहीं मानते' जितना जल्दी बुरा मान जाते हैं...*
🌹🌹🌹 *जय श्री कृष्ण*🌹🌹🌹
*एक वकील का सुनाया हुआ
एक किस्सा* - सत्य घटना
"मै अपने चेंबर में बैठा हुआ था,
एक आदमी दनदनाता हुआ अन्दर घुसा।
उसके हाथ में कागज़ो का बंडल,
धूप से काला हुआ चेहरा,
बढ़ी हुई दाढ़ी, सफेद कपड़े,उसके पंजों में मिट्टी
लगी थी।"
उसने कहा - "उसके पूरे फ्लैट पर स्टे लगाना है, बताइए, क्या क्या कागज और चाहिए...
खर्च क्या लगेगा ... "
मैंने उन्हें बैठने का कहा -
"रघु, पानी दे इधर" मैंने आवाज़ लगाई!
वो कुर्सी पर बैठे!
उनके सारे कागजात मैंने देखे,
उनसे सारी जानकारी ली,
आधा पौना घंटा गुजर गया।
"मै इन कागज़ो को देख लेता हूँ ,
फिर आपके केस पर विचार करेंगे।
आप ऐसा कीजिए,
अगले शनिवार को मिलिए मुझसे।"
चार दिन बाद वो फिर से आए- !
वैसे ही कपड़े
बहुत अशांत लग रहे थे
अपने छोटे भाई पर गुस्सा बहुत थे!
मैंने उन्हें बैठने का कहा,
वो बैठे!
ऑफिस में अजीब सी खामोशी गूंज रही थी।
मैंने बात की शुरुआत की ! -
"बाबा, मैंने आपके सारे पेपर्स देख लिए।
और आपके परिवार के बारे में और आपकी निजी जिंदगी के बारे में भी मैंने
बहुत जानकारी हासिल की।
मेरी जानकारी के अनुसार:
आप दो भाई है, एक बहन है,
आपके माँ-बाप बचपन में ही गुजर गए।
बाबा आप नौवीं पास है
और आपका छोटा भाई इंजिनियर है।
अपने छोटे भाई की पढ़ाई के लिए आपने स्कूल छोड़ा, लोगो के खेतों में दिहाड़ी पर काम किया,
कभी अंग भर कपड़ा और पेट भर खाना आपको नहीं मिला फिर भी भाई के पढ़ाई के लिए पैसों की कमी आपने नहीं होने दी।
एक बार खेलते खेलते भाई पर किसी बैल ने सींग घुसा दिया तब भाई लहूलुहान हो गया।
फिर आपने उसे कंधे पर उठा कर 5 किलोमीटर पैदल चलकर अस्पताल लेे गए।
सही देखा जाए तो आपकी उम्र भी नहीं थी
ये करने की,
पर भाई में जान बसी थी आपकी।
माँ बाप के बाद मै ही इन का माँ-बाप…
ये भावना थी आपके मन में।
फिर आपका भाई इंजीनियरिंग में
अच्छे कॉलेज में एडमिशन ले पाया
और आपका दिल खुशी से भरा हुआ था।
फिर आपने जी तोड़ मेहनत की।
80,000 की सालाना फीस भरने के लिए आपने रात दिन एक कर दिया यानि बीवी के गहने गिरवी रख के, कभी साहूकार कार से पैसा ले कर आपने उसकी हर जरूरत पूरी की।
फिर अचानक उसे किडनी की तकलीफ शुरू हो गई, डॉक्टर ने किडनी बदलने का कहा
और
तुम ने अगले मिनट में अपनी किडनी उसे दे दी यह कह कर कि कल तुझे अफसर बनना है,
नौकरी करनी है,
कहाँ कहाँ घूमेगा बीमार शरीर लेे के।
मुझे गाँव में ही रहना है,
ये कह कर किडनी दे दी उसे।
फिर भाई कालेज हॉस्टल पर रहने लगा।त्यौहार पर्व पर घर में जो पकवान मिठाई इत्यादि बनें भाई को देने जाओ,
कोई तीज त्योहार हो, भाई के कपड़े बनाओ।
घर से हॉस्टल 25 किलोमीटर तुम उसे भोजन का डिब्बा देने साइकिल पर गए।
हाथ का निवाला पहले भाई को खिलाया तुमने।
फिर आपकी मेहनत रंग लाई ओर भाई इंजीनियर बन गया,
तुमने प्रशांता वश गाँव के लोगों को खाना खिलाया।
फिर उसने उसी के कॉलेज की लड़की जो दिखने में एकदम सुंदर थी से शादी कर ली ,
तुम सिर्फ समय पर ही वहाँ गए।
भाई को नौकरी लगी,
3 साल पहले उसकी शादी हुई,
अब तुम्हारा बोझ हल्का होने वाला था।
पर किसी की नज़र लग गई
आपके इस प्यार को।
शादी के बाद भाई ने आना बंद कर दिया।
पूछा तो कहता है मैंने बीवी को वचन दिया है।
घर पैसा देता नहीं,
पूछा तो कहता है कर्ज़ा सिर पे है।
पिछले साल शहर में फ्लैट खरीदा।
पैसे कहाँ से आए पूछा तो कहता है
कर्ज लिया है।
मैंने विरोध किया तो कहता है भाई,
तुझे कुछ नहीं मालूम,
तू निरा गवार ही रह गया।
अब तुम्हारा वही भाई चाहता है
गाँंव की आधी खेती बेच कर उसे अपना हिस्सा दे दे।
इतना कह के मैं रुका - रघु की लाई चाय की प्याली मैंने मुँह से लगाई -!
"तुम चाहते हो भाई ने जो मांगा
वो उसे ना दे कर उसके ही फ्लैट पर
स्टे लगाया जाए - क्यों यही चाहते हो तुम..."
वो तुरंत बोला, "हां"
मैंने कहा - हम स्टे लेे सकते है,
भाई के प्रॉपर्टी में हिस्सा भी माँग सकते हैं
पर….
1) तुमने उसके लिए जो खून पसीना एक किया है वो नहीं मिलेगा!
2) तुम्हारीे दी हुई किडनी वापस नहीं मिलेगी!
3) तुमने उसके लिए जो ज़िन्दगी खर्च की है
वो भी वापस नहीं मिलेगी।
मुझे लगता है इन सब चीजों के सामने
उस फ्लैट की कीमत शून्य है।
तुम्हारे भाई की नीयत फिर गई,
वो अपने रास्ते चला गया ;
अब तुम भी उसी कृतघ्न सड़क पर मत जाओ।
वो भिखारी निकला,
तुम दिलदार थे।
दिलदार ही रहो …..
तुम्हारा हाथ ऊपर था,
ऊपर ही रखो।
कोर्ट कचहरी करने की बजाय
बच्चों को पढ़ाओ लिखाओ।
पढ़ाई कर के तुम्हारा भाई बिगड़ गया ,
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि
तुम्हारे बच्चे भी ऐसा करेंगे..."
वो मेरे मुँह को ताकने लगा।
उठ के खड़ा हुआ, सब काग़ज़ात उठाए
और आँखे पोछते हुए बोला -
"चलता हूँ, वकील साहब।"
उसकी रूलाई फुट रही थी और वो
मुझे दिख ना जाए ऐसी कोशिश कर रहा था।
इस बात को अरसा गुजर गया!
कल वो अचानक मेरे ऑफिस में आया।
कलमों में सफेदी झाँक रही थी उसके।
साथ में एक नौजवान था और हाथ में थैली।
मैंने कहा- "बाबा, बैठो"
उसने कहा, "बैठने नहीं आया वकील साहब, मिठाई खिलाने आया हूँ ।
ये मेरा बेटा, बैंक मैनेजर है !
बैंगलोर में रहता है, कल आया है गाँव।
अब तीन मंजिला मकान बना लिया है वहाँ।
थोड़ी थोड़ी कर के 10–12 एकड़ खेती की जमीन खरीद ली अब।"
मै उसके चेहरे से टपकते हुए खुशी को
महसूस कर रहा था
"वकील साहब, आपने मुझे कहा था-
कोर्ट कचहरी के चक्कर में मत पड़ो !"
आपने बहुत नेक सलाह दी
और मुझे उलझन से बचा लिया।
जबकि गाँव में सब लोग मुझे
भाई के खिलाफ उकसा रहे थे।
मैंने उनकी नहीं, आपकी बात सुन ली
और मैंने अपने बच्चो को लाइन से लगाया और भाई के पीछे अपनी ज़िंदगी बरबाद नहीं होने दी।
कल भाई और उनकी पत्नी भी घर आए थे।
पाँव छू छूकर माफी मांगने लगे।
मैंने अपने भाई को गले से लगा लिया।
और मेरी धर्मपत्नी ने उसकी धर्मपत्नी को
गले से लगा लिया।
हमारे पूरे परिवार ने बहुत दिनों बाद
एक साथ भोजन किया।
बस फिर क्या था आनंद की लहर
घर में दौड़ने लगी।
मेरे हाथ का पेडा हाथ में ही रह गया
मेरे आंसू टपक ही गए आखिर. .. .
*गुस्से को योग्य दिशा में मोड़ा जाए
तो पछताने की जरूरत नहीं पड़े कभी*
बहुत ही अच्छा है इस को समझना
और अमल में लाना चाहिए।
यह एक सच्ची घटना है
शिक्षाप्रद है और बेमिसाल भी है!
emotional shayari
हमको तुमसे प्यार न होता तो अच्छा होता।
दिल को तुझपे ऐतबार न होता तो अच्छा होता।
दिल में तेरी यादों का ज आना जाना तो होता।
तेरा इंतजार न होता तो अच्छा होता।।
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सुनो
मुझे बताओ जरा!
attitude shayari
नजर नजर से मिलेगी तो सिर झुका लेगा,
वह बेवफा है मेरा इम्तिहान क्या लेगा,
उसे चिराग जलाने को मत कह देना,
वह नासमझ है अपना दामन जला लेगा।
हिन्दी शायरी दिल से
हरे कृष्ण hare krishna
जो हरि नाम मे डूबकी लगा लेता है वो
जन्मो जनमांतर के पापो से मुक्ति पा लेता है
एक यही वो नाम है जो हमे हर पाप....
की सजा से बचा लेता है
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.
*माँ का तोहफ़ा*
. *एक मर्मस्पर्शी कहानी, अवश्य पढ़ें।*
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एक दंपती दीपावली की ख़रीदारी करने को हड़बड़ी में था। पति ने पत्नी से कहा, "ज़ल्दी करो, मेरे पास टाईम नहीं है।" कह कर कमरे से बाहर निकल गया। तभी बाहर लॉन में बैठी *माँ* पर उसकी नज़र पड़ी।
कुछ सोचते हुए वापस कमरे में आया और अपनी पत्नी से बोला, "शालू, तुमने माँ से भी पूछा कि उनको दिवाली पर क्या चाहिए?
शालिनी बोली, "नहीं पूछा। अब उनको इस उम्र में क्या चाहिए होगा यार, दो वक्त की रोटी और दो जोड़ी कपड़े....... इसमें पूछने वाली क्या बात है?
यह बात नहीं है शालू...... माँ पहली बार दिवाली पर हमारे घर में रुकी हुई है। वरना तो हर बार गाँव में ही रहती हैं। तो... औपचारिकता के लिए ही पूछ लेती।
अरे इतना ही माँ पर प्यार उमड़ रहा है तो ख़ुद क्यों नहीं पूछ लेते? झल्लाकर चीखी थी शालू ...और कंधे पर हैंड बैग लटकाते हुए तेज़ी से बाहर निकल गयी।
सूरज माँ के पास जाकर बोला, "माँ, हम लोग दिवाली की ख़रीदारी के लिए बाज़ार जा रहे हैं। आपको कुछ चाहिए तो..
माँ बीच में ही बोल पड़ी, "मुझे कुछ नहीं चाहिए बेटा।"
सोच लो माँ, अगर कुछ चाहिये तो बता दीजिए.....
सूरज के बहुत ज़ोर देने पर माँ बोली, "ठीक है, तुम रुको, मैं लिख कर देती हूँ। तुम्हें और बहू को बहुत ख़रीदारी करनी है, कहीं भूल न जाओ।" कहकर सूरज की माँ अपने कमरे में चली गईं। कुछ देर बाद बाहर आईं और लिस्ट सूरज को थमा दी।......
सूरज ड्राइविंग सीट पर बैठते हुए बोला, "देखा शालू, माँ को भी कुछ चाहिए था, पर बोल नहीं रही थीं। मेरे ज़िद करने पर लिस्ट बना कर दी है। इंसान जब तक ज़िंदा रहता है, रोटी और कपड़े के अलावा भी बहुत कुछ चाहिये होता है।"
अच्छा बाबा ठीक है, पर पहले मैं अपनी ज़रूरत का सारा सामान लूँगी। बाद में आप अपनी माँ की लिस्ट देखते रहना। कहकर शालिनी कार से बाहर निकल गयी।
पूरी ख़रीदारी करने के बाद शालिनी बोली, "अब मैं बहुत थक गयी हूँ, मैं कार में A/C चालू करके बैठती हूँ, आप अपनी माँ का सामान देख लो।"
अरे शालू, तुम भी रुको, फिर साथ चलते हैं, मुझे भी ज़ल्दी है।
देखता हूँ माँ ने इस दिवाली पर क्या मँगाया है? कहकर माँ की लिखी पर्ची ज़ेब से निकालता है।
बाप रे! इतनी लंबी लिस्ट, ..... पता नहीं क्या - क्या मँगाया होगा? ज़रूर अपने गाँव वाले छोटे बेटे के परिवार के लिए बहुत सारे सामान मँगाये होंगे। और बनो *श्रवण कुमार*, कहते हुए शालिनी गुस्से से सूरज की ओर देखने लगी।
पर ये क्या? सूरज की आँखों में आँसू........ और लिस्ट पकड़े हुए हाथ सूखे पत्ते की तरह हिल रहा था..... पूरा शरीर काँप रहा था।
शालिनी बहुत घबरा गयी। क्या हुआ, ऐसा क्या माँग लिया है तुम्हारी माँ ने? कहकर सूरज के हाथ से पर्ची झपट ली....
हैरान थी शालिनी भी। इतनी बड़ी पर्ची में बस चंद शब्द ही लिखे थे.....
*पर्ची में लिखा था....*
"बेटा सूरज मुझे दिवाली पर तो क्या किसी भी अवसर पर कुछ नहीं चाहिए। फिर भी तुम ज़िद कर रहे हो तो...... तुम्हारे शहर की किसी दुकान में अगर मिल जाए तो *फ़ुरसत के कुछ पल* मेरे लिए लेते आना.... ढलती हुई साँझ हूँ अब मैं। सूरज, मुझे गहराते अँधियारे से डर लगने लगा है, बहुत डर लगता है। पल - पल मेरी तरफ़ बढ़ रही मौत को देखकर.... जानती हूँ टाला नहीं जा सकता, शाश्वत सत्य है..... पर अकेलेपन से बहुत घबराहट होती है सूरज।...... तो जब तक तुम्हारे घर पर हूँ, कुछ पल बैठा कर मेरे पास, कुछ देर के लिए ही सही बाँट लिया कर मेरे बुढ़ापे का अकेलापन।.... बिन दीप जलाए ही रौशन हो जाएगी मेरी जीवन की साँझ.... कितने साल हो गए बेटा तुझे स्पर्श नहीं किया। एक बार फिर से, आ मेरी गोद में सर रख और मैं ममता भरी हथेली से सहलाऊँ तेरे सर को। एक बार फिर से इतराए मेरा हृदय मेरे अपनों को क़रीब, बहुत क़रीब पा कर....और मुस्कुरा कर मिलूँ मौत के गले। क्या पता अगली दिवाली तक रहूँ ना रहूँ.....
पर्ची की आख़िरी लाइन पढ़ते - पढ़ते शालिनी फफक-फफक कर रो पड़ी.....
*ऐसी ही होती हैं माँ.....*
दोस्तो, अपने घर के उन विशाल हृदय वाले लोगों, जिनको आप बूढ़े और बुढ़िया की श्रेणी में रखते हैं, वे आपके जीवन के कल्पतरु हैं। उनका यथोचित आदर-सम्मान, सेवा-सुश्रुषा और देखभाल करें। यक़ीन मानिए, आपके भी बूढ़े होने के दिन नज़दीक ही हैं।...उसकी तैयारी आज से ही कर लें। इसमें कोई शक़ नहीं, आपके अच्छे-बुरे कृत्य देर-सवेर आप ही के पास लौट कर आने हैं।।
*कहानी अच्छी लगी हो तो कृपया अग्रसारित अवश्य कीजिए। शायद किसी का हृदय परिवर्तन हो जाए और.....*
inspirational thoughts # quotes
मत बहा आंसूओ में जिंदगी को;
एक नए जीवन का आगाज़ कऱ;
दिखानी है अगर दुश्मनी की हद तो;
ज़िक्र भी मत कर, नज़र अंदाज़ कर।
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अक्सर हम
साथ साथ टहलते है
तुम ज़हन में मेरे
मैं छत पर
हिन्दी शायरी दिल से
emotional shayari ,shayari
मैं शौक दबा कर रखता हूँ बीमार थोड़ी हूँ ,
तुम चाहती हो मैं रोज मिलूं अखबार थोड़ी हूँ
दुनिया में कम लोग ही ऐसे होते हैं
जो लगते हैं जैसे..
वैसे होते हैं!!!
love# shayari # emotional shayari
तुझे शब्दों में लिखना आसान नही,
तू मेरा हिस्सा है कोई दास्तान नहीं.
हिन्दी शायरी दिल से
sad shayari # ज़ख्मी दिल
मुझे मालूम नहीं उससे
अलग हो जाने की वजह...!
न जाने हवाएं तेज़ थीं या मेरा
उस शाख से रिश्ता कमज़ोर
था...!!
हिन्दी शायरी दिल से
जय सियाराम
तबहिं लखन रघुबर रुख जानी।
पूँछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी॥
सुनत नारि नर भए दुखारी।
पुलकित गात बिलोचन बारी॥
अर्थ:-उसी समय श्री रामचन्द्रजी का रुख जानकर लक्ष्मणजी ने कोमल वाणी से लोगों से रास्ता पूछा। यह सुनते ही स्त्री-पुरुष दुःखी हो गए। उनके शरीर पुलकित हो गए और नेत्रों में (वियोग की सम्भावना से प्रेम का) जल भर आया॥
श्री रामचरित मानस
अयोध्याकांड (११७)
हिन्दी शायरी दिल से
हर हर महादेव
*इत्र, मित्र, चित्र और चरित्र किसी*
*की पहचान के मोहताज़ नहीं।*
*ये चारों अपना परिचय स्वयं देते हैं...*
*आपका दिन मंगलमय हो ..🙏🏻
हिन्दी शायरी दिल से
hare krishna हरे कृष्ण
*क्या है कृष्ण होने के मायने ?*
पहली गाली पर 'सर काटने' की शक्ति होने बाद भी; यदि 99 और गाली सुनने का 'सामर्थ्य' है, तो वो कृष्ण है।
सुदर्शन' जैसा शस्त्र होने के बाद भी; यदि हाथ में हमेशा 'मुरली' है, तो वो कृष्ण है।
'द्वारिका' का वैभव होने के बाद भी; यदि 'सुदामा" मित्र है, तो वो कृष्ण है।
'मृत्यु' के फन पर मौजूद होने पर भी; यदि 'नृत्य' है तो, वो कृष्ण है।
सर्वसामर्थ्य' होने पर भी; यदि 'सारथी' है, तो वो कृष्ण है।
*जय श्रीकृष्ण*
🌞🌞
सूली ऊपर सेज हमारी
मीरा कहती है सूली ऊपर सेज हमारी ,
सोवण किस विधि होइ ।
'इधर सूली पर हम बैठे है तुम कहते हो सो जाओ ।
सुली पर सेज लगी हो तो कोई कैसे सोये !
कल सुबह तुम्हारी मौत आने वाली हो ,
कल सुबह तुम्हे फ़ासी लगने वाली हो ,
तुम आज रात सोओगे ?
कोई उपाय नही है सोने का।
यह संसार तो सूली है ,
इसमें सोना कैसे हो सकता है !
इस बात को समझ लो
यह संसार सूली है,
क्योकि इस संसार में सिवाय मौत के और कुछ भी नही घटता ।
जन्म के बाद बस एक ही बात निश्चित है :मौत ।
जन्म के बाद मृत्यु के अतिरिक्त यहा कुछ भी नही घटता ।
बाकी तो सब व्यर्थ की बातचीत है ।
जिसे तुम घटना कहते हो
कि राष्ट्रपति हो गये ,
कि खूब धन कमा लिया ,
कि खूब प्रसिद्धि हो गयी ,
इन सब का कोई भी मूल्य नही है ।
तुम मरे कि सब भूल जाएगा , सब पद खो जाएगा ,
चार दिन के बाद तुम्हे कोई याद करने वाला भी न बचेगा ।कुछ वर्षों बाद ,
तुम हुए भी थे या नही
हुए थे ,
इसमें भी भेद करना मुश्किल हो जाएगा ।
जरा ख्याल करो !
तुमसे पहले अरबो-अरबो
लोग इस पृथ्वी पर हो चुके है । तुम्हारे जैसे ही सपने देखने वाले लोग ,
तुम्हारे जैसे ही धन इकट्ठा करने वाले लोग ,
तुम्हारे जैसे ही पद-लोलुप,
धन -लोलुप !
वो सब अब कहा है ?
उनके नाम भी तो पता नही । वे कहा खो गये ?
हो सकता है ,
जिस धूल में चलकर आये हो उस धूल में पड़े हो ।
तुम जिस जगह पर बैठे हो , वही उनकी लाश गड़ी हो , वही उनकी हड्डिया गल गयी हो ।
कभी वो भी अकड़कर चलते थे जैसे तुम अकड़कर चलते हो ।
कभी किसी का जरा सा धक्का लग गया था तो नाराज हो गए थे ,
तलवारे खिंच गयी थी ।
आज धूल में पड़े है और कोई भी उन्हें पैरो से रौंदे चला जा रहा है ।
न नाराज हो सकते है , न तलवारे खिंच सकते है ।विश्वासी झूठी श्रद्धा में जीता है;:
इसलिए कही पहुच नही पाता। श्रद्धालु यात्रा पर चल पड़ता है।
श्रद्धा की यात्रा ही एक दिन ज्ञान की मंजिल पर पहुचा देती है ।
ज्ञानी पहुच गया ,
श्रद्धालु चल पड़ा ।
विश्वासी सिर्फ सोच रहा है कि चलेगे ,
कि चल रहे है ,
कि पहुच रहे है ।
विश्वासी निद्रा में पड़ा है ।
या तो जौहर बनो या जौहरी बनो !
तो ही तुम समझ पाओगे कि मीरा क्या कह रही है।
ओशो
emotional shayari # बेटी है अनमोल
बीस बरस तक बाप उधड़ता है थोड़ा थोड़ा
तब सिलता है इक बेटी की शादी का जोड़.
।।।।।।।।हिन्दी शायरी दिल से।।।।।।।।।।।।
emotional shayari
लय में डूबी हुई मस्ती भरी आवाज़ के साथ
छेड़ दे कोई गजल इक नए अंदाज़ के साथ...
हिन्दी शायरी दिल से
जय माता दी # मां #
साधन-संवाद
'श्रीभुशुण्डि-गरुड़-संवाद' (तृतीय प्रसंग)
(श्रीरुद्राष्टकम्)
'निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेहं।।'
(स्वतन्त्र एवं स्वयं प्रकट होने वाले, त्रिगुणरहित, निर्विकल्प, चेष्टारहित, चैतन्य आकाशरूप और आकाश में वास करनेवाले आपको मैं भजता हूँ।)
यहाँ जितने भी विशेषण दिये गये हैं, उनके अनन्त अर्थ हैं। कुछ की ओर हम संकेत करेंगे, बाकी आप इसे अपनी साधना का अभिन्न अंग बना लीजिए। प्रतिदिन कुछ समय शान्त बैठकर इस स्तुति पर विचार कीजिए। इससे अद्भुत रहस्य उजागर होने लगेंगे। जो भी हमारे आग्रह को स्वीकार करते हुए ऐसा करेंगे, वे अवश्य ही इसकी अलौकिकता से परिचित होंगे।
'निज' का एक अर्थ होता है स्वतन्त्र। प्रभु अपने-आप हैं, वो किसी के अंश नहीं हैं। फिर इसका अर्थ यह भी है कि प्रभु सब-के-सब अर्थात् सर्वरूप हैं। वे सबके निज स्वामी हैं। वे सभी में समाये हैं। सत्ता का आधार वहीं हैं। कुछ है तो वही हैं और कुछ नहीं है तो भी वही हैं।
प्रभु 'निर्विकल्प' अर्थात् तर्कवर्जित हैं। मन उनकी कल्पना नहीं कर सकता है। वाणी उनकी चर्चा नहीं कर सकती है। उनमें कोई विकल्प नहीं घट सकता है। वो एकरस सर्वत्र व्याप्त हैं। प्रभु सदा निर्विकल्पं-समाधि अवस्था में रहने वाले हैं। प्रभु सबकुछ करते हुए भी कर्ता नहीं हैं अर्थात् 'निरीह' हैं।
प्रभु नित्यचैतन्य ब्रह्मस्वरूप आकाशवत् हैं। आकाश तो जड़ है, इसलिए प्रभु को चैतन्यस्वरूप आकाश कहा गया है। आकाश तीन प्रकार का माना गया है- भूताकाश, चित्ताकाश और चिदाकाश। ब्रह्म ही चिदाकाश है। प्रभु सबमें हैं और सबसे पृथक् भी हैं।
'चिदाकाशमाकाशवासं' के बहुत सारे अर्थ हैं, कुछ को देखिये। प्रभु अत्यन्त सूक्ष्म आकाश में भी सूक्ष्मरूप से बसे हुए हैं। प्रभु के स्वरूप का विस्तार आकाशवत् है। चैतन्यस्वरूप आकाश भी उन प्रभु में बसता है। वो प्रभु अन्तरिक्षवासी हैं। सूक्ष्म और महा आकाश में उनका वास है अथवा उनमें दोनों आकाश बसते हैं। फिर एक अर्थ यह भी है कि वो प्रभु सत्तारूप दिगम्बर हैं, आकाश ही उनका वस्त्र है।
श्रीराम प्रपत्ति पीठाधीश्वर
स्वामी (डाॅ.) सौमित्रिप्रपन्नाचार्य
देवराहा बाबा आश्रम, हरदोई।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
या देवी सर्वभूतेषु शांतिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
हिन्दी शायरी दिल से
जामवंत जी हैं ब्रह्म का अवतार
ब्रह्मा जी के अंशावतार ऋक्षराज जामवंत
ब्रह्मा जी के अंशावतार ऋक्षराज जामवंत
स्वारथ सांच जीव कहुं एहा ,मन क्रम वचन राम पद नेहा ।।
भगवान ब्रह्मा ने देखा कि सृष्टि के कार्य में लगे रहते पूरा समय भगवान की सेवा में नहीं दिया जा सकता अतः वह एक रुप से ऋक्ष राज जाम्बवान् होकर पृथ्वी पर आ गए ।
भगवान की सेवा भगवान के नित्य मंगलमय रूप का ध्यान भगवान की लीलाओं का चिंतन यही जामवंत की दिनचर्या थी
सतयुग में जब भगवान बामन ने विराट रूप धारण करके बलि को बांध लिया उस समय उस विराट रूप प्रभु को देखकर जामवंत जी बहुत आनंदित हुए ।
वे भेरी लेकर विराट भगवान का जयघोष करते हुए दिशाओं में सर्वत्र महोत्सव की घोषणा कर आए और दो घड़ी में ही दौड़ते हुए उन्होंने सात प्रदक्षिणाएं विराट भगवान की कर ली।
त्रेता में जामवंत जी सुग्रीव के मंत्री हो गए आयु ,बुद्धि, बल और नीति में सबसे श्रेष्ठ होने के कारण वे ही सब को उचित सम्मति देते थे।
वानर जब सीता को ढूंढने निकले और समुद्र के तट पर हताश होकर बैठ गए तब जामवंत जी ने ही हनुमान जी को उनके बल का स्मरण दिला कर लंका जाने के लिए प्रेरित किया भगवान श्री राम के युद्ध काल में तो जैसे यह प्रधान सचिव ही थे सभी कार्य में भगवान इनकी सम्मति लेते और इनका आदर करते थे। भगवान अयोध्या लौट आए और राज्य अभिषेक के बाद सब को विदा करने लगे तब जामवंत जी ने अयोध्या से जाना तभी सरकार किया जब प्रभु ने उन्हें द्वापर में दर्शन देने का वचन दिया ।
जामवंत जी की इच्छा थी कि कोई मुझे द्वंद युद्ध में संतुष्ट करे लंका के युद्ध में रावण भी उनके सम्मुख टिक नहीं सका था ।
द्वापर में श्री कृष्ण चंद्र का अवतार हुआ द्वापर में द्वारका आने पर यादव श्रेष्ठ सत्राजित जिसने सूर्य की आराधना करके स्यमन्तक मणि प्राप्त की।
एक दिन श्रीकृष्ण ने सत्राजित से कहा कि वह मणि महाराज उग्रसेन को दे दें। किंतु लोभ वश सत्राजित ने यह बात स्वीकार नहीं की ।
संयोगवश उस मणि को गले में बांधकर सत्राजित का भाई प्रसेनजित आखेट के लिए वन में गया और वहां उसे शेर ने खा लिया।
शेर मणि लेकर गुफा में गया तो जामवंत जी ने शेर को मार कर मणि ले ली और गुफा के भीतर अपने बच्चों को खेलने के लिए दे दी।
द्वारका में जो प्रसेनजित नहीं लौटा तब सत्राजित को शंका हुई कि श्री कृष्ण चंद्र ने मेरे भाई को मारकर मणि छीन ली है ।
धीरे-धीरे यह बात फैलने लगी इस अपयश को दूर करने के लिए भगवान श्री कृष्ण मणि का पता लगाने निकले वह मरे घोड़े को फिर मृत सिंह को देखते हुए जामवंत की गुफा में पहुंचे एक अपरिचित पुरुष को देख बच्चे की धार मां चिल्ला उठी जामवंत उस चिल्लाहट को सुन क्रोध में भर दौड़े ।
कृष्ण के साथ उनका द्वंद युद्ध होने लगा था ।
सत्ताइस दिन रात बिना विश्राम कि ये दोनों एक-दूसरे पर वज्र के समान आघात करते रहे अंत में जामवंत का शरीर मधुसूदन के प्रहारों से शिथिल होने लगा
जामवंत जी ने सोचा मुझे पराजित कर सके ऐसा कोई देवता या राक्षस तो हो नहीं सकता अवश्य ही यह मेरे भगवान श्रीराम ही हैं।
वे यह सोचकर रुक गए भगवान ने उसी समय उन्हें अपने धनुषधारी राम स्वरूप का दर्शन दिया जामवंत जी प्रभु के चरणों में गिर पड़े। श्री कृष्ण चंद्र ने अपना हाथ उनके शरीर पर फेरकर समस्त पीड़ा और क्लेश दूर कर दिया जामवंत ने अपनी कन्या जामवंती को श्री कृष्ण के चरणों में समर्पित किया और वह मणि भी दे दी इस प्रकार उन्होंने अपने जीवन को भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया
स्वारथ सांच जीव कहुं एहा ,मन क्रम वचन राम पद नेहा ।।
भगवान ब्रह्मा ने देखा कि सृष्टि के कार्य में लगे रहते पूरा समय भगवान की सेवा में नहीं दिया जा सकता अतः वह एक रुप से ऋक्ष राज जाम्बवान् होकर पृथ्वी पर आ गए ।
भगवान की सेवा भगवान के नित्य मंगलमय रूप का ध्यान भगवान की लीलाओं का चिंतन यही जामवंत की दिनचर्या थी
सतयुग में जब भगवान बामन ने विराट रूप धारण करके बलि को बांध लिया उस समय उस विराट रूप प्रभु को देखकर जामवंत जी बहुत आनंदित हुए ।
वे भेरी लेकर विराट भगवान का जयघोष करते हुए दिशाओं में सर्वत्र महोत्सव की घोषणा कर आए और दो घड़ी में ही दौड़ते हुए उन्होंने सात प्रदक्षिणाएं विराट भगवान की कर ली।
त्रेता में जामवंत जी सुग्रीव के मंत्री हो गए आयु ,बुद्धि, बल और नीति में सबसे श्रेष्ठ होने के कारण वे ही सब को उचित सम्मति देते थे।
वानर जब सीता को ढूंढने निकले और समुद्र के तट पर हताश होकर बैठ गए तब जामवंत जी ने ही हनुमान जी को उनके बल का स्मरण दिला कर लंका जाने के लिए प्रेरित किया भगवान श्री राम के युद्ध काल में तो जैसे यह प्रधान सचिव ही थे सभी कार्य में भगवान इनकी सम्मति लेते और इनका आदर करते थे। भगवान अयोध्या लौट आए और राज्य अभिषेक के बाद सब को विदा करने लगे तब जामवंत जी ने अयोध्या से जाना तभी सरकार किया जब प्रभु ने उन्हें द्वापर में दर्शन देने का वचन दिया ।
जामवंत जी की इच्छा थी कि कोई मुझे द्वंद युद्ध में संतुष्ट करे लंका के युद्ध में रावण भी उनके सम्मुख टिक नहीं सका था ।
द्वापर में श्री कृष्ण चंद्र का अवतार हुआ द्वापर में द्वारका आने पर यादव श्रेष्ठ सत्राजित जिसने सूर्य की आराधना करके स्यमन्तक मणि प्राप्त की।
एक दिन श्रीकृष्ण ने सत्राजित से कहा कि वह मणि महाराज उग्रसेन को दे दें। किंतु लोभ वश सत्राजित ने यह बात स्वीकार नहीं की ।
संयोगवश उस मणि को गले में बांधकर सत्राजित का भाई प्रसेनजित आखेट के लिए वन में गया और वहां उसे शेर ने खा लिया।
शेर मणि लेकर गुफा में गया तो जामवंत जी ने शेर को मार कर मणि ले ली और गुफा के भीतर अपने बच्चों को खेलने के लिए दे दी।
द्वारका में जो प्रसेनजित नहीं लौटा तब सत्राजित को शंका हुई कि श्री कृष्ण चंद्र ने मेरे भाई को मारकर मणि छीन ली है ।
धीरे-धीरे यह बात फैलने लगी इस अपयश को दूर करने के लिए भगवान श्री कृष्ण मणि का पता लगाने निकले वह मरे घोड़े को फिर मृत सिंह को देखते हुए जामवंत की गुफा में पहुंचे एक अपरिचित पुरुष को देख बच्चे की धार मां चिल्ला उठी जामवंत उस चिल्लाहट को सुन क्रोध में भर दौड़े ।
कृष्ण के साथ उनका द्वंद युद्ध होने लगा था ।
सत्ताइस दिन रात बिना विश्राम कि ये दोनों एक-दूसरे पर वज्र के समान आघात करते रहे अंत में जामवंत का शरीर मधुसूदन के प्रहारों से शिथिल होने लगा
जामवंत जी ने सोचा मुझे पराजित कर सके ऐसा कोई देवता या राक्षस तो हो नहीं सकता अवश्य ही यह मेरे भगवान श्रीराम ही हैं।
वे यह सोचकर रुक गए भगवान ने उसी समय उन्हें अपने धनुषधारी राम स्वरूप का दर्शन दिया जामवंत जी प्रभु के चरणों में गिर पड़े। श्री कृष्ण चंद्र ने अपना हाथ उनके शरीर पर फेरकर समस्त पीड़ा और क्लेश दूर कर दिया जामवंत ने अपनी कन्या जामवंती को श्री कृष्ण के चरणों में समर्पित किया और वह मणि भी दे दी इस प्रकार उन्होंने अपने जीवन को भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया
ग़ज़ल # attitude shayari # dil shayrana#
मुझे तुम तुम ही रहने दो !कभी तुम आप मत कहना!
तेरी चाहत रहे मुझको मुझे बस इतना ही ...चाहना ।।
मेरे चेहरे पे नूर है तेरी मोहब्बत का
मेरा रुतबा बढ़ाता है तेरा यह इश्क का गहना ।।
तू दूर है मुझसे ...दिल पास है तेरे
बड़ा मुश्किल सा लगता है यह दर्द जुदाई का सहना।।
मेरी जन्नत मेरी मन्नत मेरी हर आरजू हो तुम
कभी ना घर बदलना यह सदा दिल में मेरे रहना।।
चलेंगे तेरी राहों पर मरेंगे तेरी बाहों में
तेरे कानों में धीरे से यही है अचला का कहना।। Achlasguleria
तेरी चाहत रहे मुझको मुझे बस इतना ही ...चाहना ।।
मेरे चेहरे पे नूर है तेरी मोहब्बत का
मेरा रुतबा बढ़ाता है तेरा यह इश्क का गहना ।।
तू दूर है मुझसे ...दिल पास है तेरे
बड़ा मुश्किल सा लगता है यह दर्द जुदाई का सहना।।
मेरी जन्नत मेरी मन्नत मेरी हर आरजू हो तुम
कभी ना घर बदलना यह सदा दिल में मेरे रहना।।
चलेंगे तेरी राहों पर मरेंगे तेरी बाहों में
तेरे कानों में धीरे से यही है अचला का कहना।। Achlasguleria
हिन्दी शायरी दिल से
ramayan # भरत # विष्णु के अंशावतार भरत लाल
विष्णु के अंशावतार श्री भरत जी
भरत सरिस को रामसनेही जगु-जप राम रामु जप जेही।।
श्री भरत जी श्री राम जी के स्वरूप हैं यह व्यूहावतार माने जाते हैं। और उनका वर्ण ऐसा है कि
भरतु रामही की अनुहारी सहसा लखि न सकहिं नर नारी
विश्व का भरण पोषण करने वाले होने से ही उनका नाम भरत पड़ा है। धर्म के आधार पर सृष्टि है।
जौं न होत जग जन्म भरत को ।सकल धरम धुर धरनि भरत को
जन्म से ही भरत श्री राम के प्रेम की मूर्ति थे।
वे सदा श्रीराम के सुख और उनकी प्रसन्नता में प्रसन्न रहते थे ।
महुं स्नेह सकोच बस सन्मुख कहीं ना वैन
दरसन तृप्ति ना आजु लगि प्रेम पिआसे नैन।।
बड़ा ही संकोची स्वभाव था भरत लाल का अपने बड़े भाई के सामने भी संकोच की मूर्ति बने रहते थे ऐसे संकोची ऐसे अनुरागी भाई को जब पता लगा कि माता कैकई ने उन्हें राज्य देने के लिए श्री राम जी को वनवास दिया है तब उनको बहुत दुख हुआ ।
कैकई को उन्होंने बड़े कठोर वचन कहे परंतु ऐसी अवस्था में भी दयानिधि किसी को कष्ट नहीं देते हैं ।जिस मंथरा ने यह सब उत्पात किया था उसी को जब शत्रुघ्न दंड देने लगते हैं तो वे उसकी जान बचाते हैं ।अयोध्या का जो साम्राज्य देवताओं को भी लुभाता है उस राज्य को उस संपति को भरत ने तृण से भी तुच्छ मानकर छोड़ दिया।
वे बार-बार यह सोचते हैं श्री राम माता जानकी और लक्ष्मण अपने सुकुमार चरणों से वन के कठोर मार्ग में भटकते होंगे यही व्यथा उन्हें व्याकुल किए थी
भरत सरिस को रामसनेही जगु-जप राम रामु जप जेही।।
श्री भरत जी श्री राम जी के स्वरूप हैं यह व्यूहावतार माने जाते हैं। और उनका वर्ण ऐसा है कि
भरतु रामही की अनुहारी सहसा लखि न सकहिं नर नारी
विश्व का भरण पोषण करने वाले होने से ही उनका नाम भरत पड़ा है। धर्म के आधार पर सृष्टि है।
जौं न होत जग जन्म भरत को ।सकल धरम धुर धरनि भरत को
जन्म से ही भरत श्री राम के प्रेम की मूर्ति थे।
वे सदा श्रीराम के सुख और उनकी प्रसन्नता में प्रसन्न रहते थे ।
महुं स्नेह सकोच बस सन्मुख कहीं ना वैन
दरसन तृप्ति ना आजु लगि प्रेम पिआसे नैन।।
बड़ा ही संकोची स्वभाव था भरत लाल का अपने बड़े भाई के सामने भी संकोच की मूर्ति बने रहते थे ऐसे संकोची ऐसे अनुरागी भाई को जब पता लगा कि माता कैकई ने उन्हें राज्य देने के लिए श्री राम जी को वनवास दिया है तब उनको बहुत दुख हुआ ।
कैकई को उन्होंने बड़े कठोर वचन कहे परंतु ऐसी अवस्था में भी दयानिधि किसी को कष्ट नहीं देते हैं ।जिस मंथरा ने यह सब उत्पात किया था उसी को जब शत्रुघ्न दंड देने लगते हैं तो वे उसकी जान बचाते हैं ।अयोध्या का जो साम्राज्य देवताओं को भी लुभाता है उस राज्य को उस संपति को भरत ने तृण से भी तुच्छ मानकर छोड़ दिया।
वे बार-बार यह सोचते हैं श्री राम माता जानकी और लक्ष्मण अपने सुकुमार चरणों से वन के कठोर मार्ग में भटकते होंगे यही व्यथा उन्हें व्याकुल किए थी
वह भारद्वाज से कहते हैं.......
⚘राम लखन सिय बिनु पग पनहीं करि मुनि वेष फिरहिं बन बनहीं।। अजिन वसन फल असन महि सयन डासि कुस पात।
बस तरु तर नित सहत हिम आते बरसात बात
एहि दुख दांह दहइ दिनछाती।भूख न बासर नीद न राती⚘
वे स्वयं मार्ग में उपवास करते कंदमूल खाते और भूमि पर शयन करते थे । साथ में घोड़े चलते थे किंतु भरत पैदल ही चलते थे उनके लाल-लाल कोमल चरणों में छाले पड़ गए थे ,किंतु उन्होंने सवारी अस्वीकार कर दी ।भरत का प्रेमभाव रामचरितमानस के अयोध्याकांड कांड में देखने योग्य है। ऐसा अलौकिक अनुराग कि जिसे देखकर पत्थर तक पिघल सकते हैं। कोई श्री राम कह दे कहीं श्री राम के स्मृति चिन्ह मिले किसी से सुन पड़े श्री श्रीराम का समाचार वहीं उसी से भरत व्याकुल होकर लिपट जाते थे।
हरषहिं निरखि रामपद अंका मानहुं पारसु पायउ रंका।।
रज सिर धरि हिंय नयनहिं लावहिं रघुवर मिलन सरिस सुख पावहिं
महर्षि भारद्वाज ने ठीक ही कहा है
तुम्ह तौ भरत मोर मत एहु धरें देह जनु रामसनेहु
महाराजा जनक भरत जी के बारे में अपनी पत्नी सुनयना से कहते हैं
परमारथ स्वारथ सुख सारे भरत न सपनेहुँ मनहुं निहारे
साधन सिद्धि राम पग नेहु मोहिलखि परत भरत मत एहु
श्री राम क्या आज्ञा दें? वे भक्तवत्सल हैं। भरत पर उनका असीम स्नेह है ।वे भरत के लिए सब कुछ त्याग सकते हैं उन्होंने स्पष्ट कह दिया
मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहुं करौं सोइ आजु
परंतु धन्य है भरत लाल !धन्य है उनका अनुराग! जिसमें श्री राम की प्रसन्नता हो जो करने में रघुनाथ जी को संकोच ना हो वही उन्हें प्रिय है।उन्हें चाहे जितना कष्ट सहना पड़े किंतु श्री राम को तनिक भी संकोच नहीं होना चाहिए ।अतएव राम की प्रसन्नता के लिए उनकी चरण पादुका लेकर भरत अयोध्या लौट आए सिंहासन पर पादुकाएं पधरायी गयीं। राम वन में रहे और भरत राज सदन के सुख भोगें यह संभव नहीं _अयोध्या से बाहर नंदीग्राम में भूमि में गड्ढा खोदकर कुश का आसन बिछाकर भरत जी ने वहां पर तपस्वी का जीवन व्यतीत किया ।चौदह बर्ष उनकी अवस्था कैसी रही है गोस्वामी तुलसीदास जी बताते हैं
पुलक गात हिंय सिय रघुबीरू जीह नामु जप लोचन नीरू ।।
भरत जी ने इसी प्रकार अवधि के वे वर्ष बिताए। उनका दृढ़ निश्चय था
बीतें अवधि रहहिं जौ प्राना अधम कवन जग मोहि समाना
श्रीराम भी इसी इस बात को भलीभांति जानते थे उन्होंने विभीषण से कहा
बीतें अवधि जांउ जौं जिअत न पावउं वीर ।।
इसलिए रघुनाथ जी हनुमान जी को पहले ही भरत के पास भेज देते हैं ।जब पुष्पक विमान से राघवेंद्र आए उन्होंने तपस्या से कृश हुए जटा बढ़ाए अपने भाई को देखा उन्होंने देखा कि भरत जी उनकी चरण पादुका है अपने सिर पर रख कर आ रहे हैं ।
प्रेम व्याकुल राम ने भाई को हृदय से लिपटा लिया ।
तत्वतः भरत और श्री राम नित्य अभिन्न हैं।अयोध्या में या नित्य साकेत में भरत लाल सदा श्री राम की सेवा में सलंग्न उनके समीप ही रहते हैं ।
स्रोत.... कल्याण
सौजन्य. ...shayaripub.com
Achlaguleria@gmail.com
⚘राम लखन सिय बिनु पग पनहीं करि मुनि वेष फिरहिं बन बनहीं।। अजिन वसन फल असन महि सयन डासि कुस पात।
बस तरु तर नित सहत हिम आते बरसात बात
एहि दुख दांह दहइ दिनछाती।भूख न बासर नीद न राती⚘
वे स्वयं मार्ग में उपवास करते कंदमूल खाते और भूमि पर शयन करते थे । साथ में घोड़े चलते थे किंतु भरत पैदल ही चलते थे उनके लाल-लाल कोमल चरणों में छाले पड़ गए थे ,किंतु उन्होंने सवारी अस्वीकार कर दी ।भरत का प्रेमभाव रामचरितमानस के अयोध्याकांड कांड में देखने योग्य है। ऐसा अलौकिक अनुराग कि जिसे देखकर पत्थर तक पिघल सकते हैं। कोई श्री राम कह दे कहीं श्री राम के स्मृति चिन्ह मिले किसी से सुन पड़े श्री श्रीराम का समाचार वहीं उसी से भरत व्याकुल होकर लिपट जाते थे।
हरषहिं निरखि रामपद अंका मानहुं पारसु पायउ रंका।।
रज सिर धरि हिंय नयनहिं लावहिं रघुवर मिलन सरिस सुख पावहिं
महर्षि भारद्वाज ने ठीक ही कहा है
तुम्ह तौ भरत मोर मत एहु धरें देह जनु रामसनेहु
महाराजा जनक भरत जी के बारे में अपनी पत्नी सुनयना से कहते हैं
परमारथ स्वारथ सुख सारे भरत न सपनेहुँ मनहुं निहारे
साधन सिद्धि राम पग नेहु मोहिलखि परत भरत मत एहु
श्री राम क्या आज्ञा दें? वे भक्तवत्सल हैं। भरत पर उनका असीम स्नेह है ।वे भरत के लिए सब कुछ त्याग सकते हैं उन्होंने स्पष्ट कह दिया
मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहुं करौं सोइ आजु
परंतु धन्य है भरत लाल !धन्य है उनका अनुराग! जिसमें श्री राम की प्रसन्नता हो जो करने में रघुनाथ जी को संकोच ना हो वही उन्हें प्रिय है।उन्हें चाहे जितना कष्ट सहना पड़े किंतु श्री राम को तनिक भी संकोच नहीं होना चाहिए ।अतएव राम की प्रसन्नता के लिए उनकी चरण पादुका लेकर भरत अयोध्या लौट आए सिंहासन पर पादुकाएं पधरायी गयीं। राम वन में रहे और भरत राज सदन के सुख भोगें यह संभव नहीं _अयोध्या से बाहर नंदीग्राम में भूमि में गड्ढा खोदकर कुश का आसन बिछाकर भरत जी ने वहां पर तपस्वी का जीवन व्यतीत किया ।चौदह बर्ष उनकी अवस्था कैसी रही है गोस्वामी तुलसीदास जी बताते हैं
पुलक गात हिंय सिय रघुबीरू जीह नामु जप लोचन नीरू ।।
भरत जी ने इसी प्रकार अवधि के वे वर्ष बिताए। उनका दृढ़ निश्चय था
बीतें अवधि रहहिं जौ प्राना अधम कवन जग मोहि समाना
श्रीराम भी इसी इस बात को भलीभांति जानते थे उन्होंने विभीषण से कहा
बीतें अवधि जांउ जौं जिअत न पावउं वीर ।।
इसलिए रघुनाथ जी हनुमान जी को पहले ही भरत के पास भेज देते हैं ।जब पुष्पक विमान से राघवेंद्र आए उन्होंने तपस्या से कृश हुए जटा बढ़ाए अपने भाई को देखा उन्होंने देखा कि भरत जी उनकी चरण पादुका है अपने सिर पर रख कर आ रहे हैं ।
प्रेम व्याकुल राम ने भाई को हृदय से लिपटा लिया ।
तत्वतः भरत और श्री राम नित्य अभिन्न हैं।अयोध्या में या नित्य साकेत में भरत लाल सदा श्री राम की सेवा में सलंग्न उनके समीप ही रहते हैं ।
स्रोत.... कल्याण
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हरे कृष्णा
श्री राधा जी के बारे में प्रचलित है कि वह बरसाना की थीं लेकिन सच्चाई है कि उनका जन्म बरसाना से पचास किलोमीटर दूर हुआ था। यह गांव रावल के नाम से प्रसिद्ध है। यहां पर राधा जी का जन्म स्थान है।
*कमल के फूल पर जन्मी थीं राधा*
रावल गांव में राधा जी का मंदिर है। माना जाता है कि यहां पर राधा जी का जन्म हुआ था। पांच हजार वर्ष पूर्व रावल गांव को छूकर यमुना जी बहती थी। राधा जी की मां कृति यमुना में स्नान करते हुए अराधना करती थी और पुत्री की लालसा रखती थी। पूजा करते समय एक दिन यमुना से कमल का फूल प्रकट हुआ। कमल के फूल से सोने की चमक सी रोशनी निकल रही थी। इसमें छोटी बच्ची के नेत्र बंद थे। अब वह स्थान इस मंदिर का गर्भगृह है। इसके ग्यारह माह पश्चात् तीन किलोमीटर दूर मथुरा में कंस के कारागार में भगवान श्री कृष्ण जी का जन्म हुआ था व रात में गोकुल में नंदबाबा के घर पर पहुंचाए गए। तब नंद बाबा ने सभी स्थानों पर संदेश भेजा और कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया गया। जब बधाई लेकर वृषभानु जी अपनी गोद में राधारानी को लेकर यहां आए तो राधारानी जी घुटने के बल चलते हुए बालकृष्ण के पास पहुंची। वहां बैठते ही तब राधारानी के नेत्र खुले और उन्होंने पहला दर्शन बालकृष्ण का किया।
*राधा और कृष्ण क्यों गए बरसाना*
कृष्ण के जन्म के बाद से ही कंस का प्रकोप गोकुल में बढ़ गया था। यहां के लोग परेशान हो गए थे। नंदबाबा ने स्थानीय राजाओं को एकत्रित किया। उस समय ब्रज के सबसे बड़े राजा वृषभानु जी थे। इनके पास ग्यारह लाख गाय थीं। जबकि नंद जी के पास नौ लाख गाय थीं। जिसके पास सबसे अधिक गाय होतीं थीं, वह वृषभान कहलाते थे। उससे कम गाय जिनके पास रहती थीं, वह नंद कहलाए जाते थे। बैठक के बाद निर्णय हुआ कि गोकुल व रावल छोड़ दिया जाए। गोकुल से नंद बाबा और जनता पलायन करके पहाड़ी पर गए। उसका नाम नंदगांव पड़ा। वृषभान, कृति जी राधारानी को लेकर पहाड़ी पर गए। उसका नाम बरसाना पड़ा।
*रावल में मंदिर के सामने बगीचा, इसमें पेड़ स्वरूप में हैं राधा व श्याम*
रावल गांव में राधारानी के मंदिर के ठीक सामने प्राचीन उपवन है। कहा जाता है कि यहां पर पेड़ स्वरूप में आज भी श्री राधा जी और श्री कृष्ण जी विद्यमान हैं। यहां पर एक साथ दो वृक्ष हैं। एक श्वेत है तो दूसरा श्याम रंग का। इसकी पूजा होती है। माना जाता है कि श्री राधा जी और श्री कृष्ण जी वृक्ष स्वरूप में आज भी यहां से यमुना जी को निहारते हैं।
चहक उठी है सृष्टि सारी।
बज उठी है देखो शहनाई।
कीरत जू के अंगना में।
नन्ही-सी लाली है जाई।
सब मिल कर गाओ बधाई।
आँखों मे बस गया नज़ारा आज अटारी का।
धरती पर अवतार हुआ वृषभानु दुलारी का।
झूमो नाचो गाओ जन्मदिन श्यामा प्यारी का।
🙏🌷जय श्री राधे राधे।🌷🙏
हिन्दी शायरी दिल से
सप्तर्षियों का अवतरण # जाने कौन है सप्तऋषि
सप्त ऋषियों का अवतरण
⚘⚘⚘⚘⚘"परम ऋषि यों को नमस्कार!!⚘⚘⚘⚘⚘
सप्तर्षियों का प्रादुर्भाव श्री ब्रह्मा जी के मानस संकल्प से हुआ है। सृष्टि के विस्तार के लिए ब्रह्मा जी ने अपने ही समान 10 मानस पुत्रों को उत्पन्न किया उनके नाम हैं
मरीचि
अत्रि
अंगिरा
पुलस्त्य
पुलह
क्रतु
भृगु
वशिष्ठ
दक्ष
नारद
यह ऋषि गुणों में श्री ब्रह्मा जी के समान ही है अतः इन्हें पुराणों में ⚘नौ ब्रह्मा⚘ भी कहा जाता है। यह सब भगवान के अनन्य भक्त हैं और उन्हीं के कृपा प्रसाद से समर्थ होकर जीवों का कल्याण करते रहते हैं। यह एक रूप से "नक्षत्र लोक" में सप्त ऋषि मंडल में स्थित रहते हैं और दूसरे रूप में तीनों लोकों में विशेष रुप से" भूलोक" में स्थित रह कर लोगों को धर्म आचरण तथा सदाचार की शिक्षा देते हैं।
तथा ज्ञान, भक्ति ,वैराग्य, तप ,पर भगवत प्रेम ,सत्य ,परोपकार, क्षमा, अहिंसा, आदि।सात्विक गुणों की प्रतिष्ठा करते हैं ।
प्रति चार युगबीतने पर ...वेदविप्लव... होता है, इसलिए सप्त ऋषि गण भूतल पर अवतीर्ण होकर वेद का उद्धार करते हैं। अलग-अलग मन्वंतरों में सप्त ऋषि बदल जाते हैं।
मनु काल ही मन्वंतर कहलाता है ।ब्रह्मा जी के 1 दिन में 14 मनु होते हैं 14 मनु और मनु पुत्र एक-एक कर समस्त पृथ्वी के राजा होकर धर्म पूर्वक प्रजा का पालन करते हैं ।मनुओं के नामानुसार ही 14 मन्वंतरों 14 भिन्न-भिन्न नाम पड़े हैं ।
इन 14 मनुओं में प्रथम मनु का नाम *स्वायंभू मनु* है ।
भगवान विष्णु के नाभिपदम से चतुर्मुख ब्रह्मा जी ने आविर्भूत होकर मैथुनी सृष्टि के संकल्प को लेकर अपने ही शरीर से *स्वायंभू मनु* तथा महारानी *शतरूपा *को प्रकट किया ।यह आदि मनु ही प्रथम मनु हैं जिसके नाम से स्वायंभुव मन्वंतर का नाम पड़ा।
प्रत्येक मन्वंतर में सप्त ऋषि भिन्न-भिन्न रामरूपों से अवतरित होते हैं पुराणों में इस बात का विस्तार से वर्णन है यहां विष्णु पुराण के अनुसार 14 मन्वंतरों के सप्तर्षियों का प्रथक प्रथक नाम दिया जा रहा है
1: प्रथम स्वायंभुव मन्वंतर में
मरीचि
अत्रि ,
अंगिरा
पुलस्त्य
पुलह
विशिष्ट आते हैं
2: द्वितीय सवारोचिष मन्वंतर में
ऊर्ज्ज
स्तंभ
वात
प्राण
पृषभ
निरय
और परीवान
3: तृतीय उत्तम मन्वंतर में
महर्षि वशिष्ठ के सातों पुत्र
4: चतुर्थ तामस मन्वंतर में
ज्योतिर्धामा
पृथु
काव्य
चैत्र
अग्नि
वनक
और पीवर
5: पंचम रैवत मन्वंतर में
हिरण निरुमा वेद श्री उधर बाहु वेद बाहु सुदामा भजन और महामुनी
6: षष्ठ चाक्षुष मन्वंतर में
सुमेधा
बिरजा
हविष्मान
उत्तम
मधु
अति नामा
और सहिष्णु
वर्तमान.......✍
7: सप्तम वैवस्वत मन्वंतर में
कश्यप
अत्रि
वशिष्ठ
विश्वामित्र
गौतम
जमदग्नि
भारद्वाज
8:अष्टम सावर्णिक मन्वंतर में
गालव
दीप्तिमान
राम
अश्वथामा
कृप
व्यास
9: नवम दक्षसावर्णी मन्वंतर में
मेधातिथि
बसु
सत्य
ज्योतिष्मान
द्युतिमान
सवन
भव्य
10: दशम ब्रह्मासावर्णि मन्वंतर में
तपोमूर्ति
हविष्मान
सुकृत
सत्य
नाभाग
अप्रतिमौझा
सत्यकेतु ।
11: एकादश धर्मसावर्णी मन्वंतर में
वपुष्मान
घृणि
आरुणि
निःस्वर
हविष्मान
अनघ
अग्नितेजा
12: द्वादश रूद्र सावर्णी मन्वंतर में
तपोद्युती
तपस्वी
सुतपा
तपोमूर्ति
तपोधन
तपोरति
तपोधृति
13: त्रयोदश देव सावर्णी मन्वंतर में
धृतिमान
अव्यय
तत्वदर्शी
निरुत्सुक
निर्मोह
सुतपा
निष्प्रकम्प
14: चतुर्दश इन्द्रसावर्णी मन्वंतर में
अग्निध्र
अग्निबाहु
शुची
युक्त
मागध
शुक्र
जित
इस प्रकार 14 मन्वंतरों में सप्तऋषियों का परिगणन पृथक पृथक नाम रूप से हुआ है
इन ऋषियों की अपार महिमा है यह सभी तपोधन है।
⚘⚘⚘⚘⚘"परम ऋषि यों को नमस्कार!!⚘⚘⚘⚘⚘
सप्तर्षियों का प्रादुर्भाव श्री ब्रह्मा जी के मानस संकल्प से हुआ है। सृष्टि के विस्तार के लिए ब्रह्मा जी ने अपने ही समान 10 मानस पुत्रों को उत्पन्न किया उनके नाम हैं
मरीचि
अत्रि
अंगिरा
पुलस्त्य
पुलह
क्रतु
भृगु
वशिष्ठ
दक्ष
नारद
यह ऋषि गुणों में श्री ब्रह्मा जी के समान ही है अतः इन्हें पुराणों में ⚘नौ ब्रह्मा⚘ भी कहा जाता है। यह सब भगवान के अनन्य भक्त हैं और उन्हीं के कृपा प्रसाद से समर्थ होकर जीवों का कल्याण करते रहते हैं। यह एक रूप से "नक्षत्र लोक" में सप्त ऋषि मंडल में स्थित रहते हैं और दूसरे रूप में तीनों लोकों में विशेष रुप से" भूलोक" में स्थित रह कर लोगों को धर्म आचरण तथा सदाचार की शिक्षा देते हैं।
तथा ज्ञान, भक्ति ,वैराग्य, तप ,पर भगवत प्रेम ,सत्य ,परोपकार, क्षमा, अहिंसा, आदि।सात्विक गुणों की प्रतिष्ठा करते हैं ।
प्रति चार युगबीतने पर ...वेदविप्लव... होता है, इसलिए सप्त ऋषि गण भूतल पर अवतीर्ण होकर वेद का उद्धार करते हैं। अलग-अलग मन्वंतरों में सप्त ऋषि बदल जाते हैं।
मनु काल ही मन्वंतर कहलाता है ।ब्रह्मा जी के 1 दिन में 14 मनु होते हैं 14 मनु और मनु पुत्र एक-एक कर समस्त पृथ्वी के राजा होकर धर्म पूर्वक प्रजा का पालन करते हैं ।मनुओं के नामानुसार ही 14 मन्वंतरों 14 भिन्न-भिन्न नाम पड़े हैं ।
इन 14 मनुओं में प्रथम मनु का नाम *स्वायंभू मनु* है ।
भगवान विष्णु के नाभिपदम से चतुर्मुख ब्रह्मा जी ने आविर्भूत होकर मैथुनी सृष्टि के संकल्प को लेकर अपने ही शरीर से *स्वायंभू मनु* तथा महारानी *शतरूपा *को प्रकट किया ।यह आदि मनु ही प्रथम मनु हैं जिसके नाम से स्वायंभुव मन्वंतर का नाम पड़ा।
प्रत्येक मन्वंतर में सप्त ऋषि भिन्न-भिन्न रामरूपों से अवतरित होते हैं पुराणों में इस बात का विस्तार से वर्णन है यहां विष्णु पुराण के अनुसार 14 मन्वंतरों के सप्तर्षियों का प्रथक प्रथक नाम दिया जा रहा है
1: प्रथम स्वायंभुव मन्वंतर में
मरीचि
अत्रि ,
अंगिरा
पुलस्त्य
पुलह
विशिष्ट आते हैं
2: द्वितीय सवारोचिष मन्वंतर में
ऊर्ज्ज
स्तंभ
वात
प्राण
पृषभ
निरय
और परीवान
3: तृतीय उत्तम मन्वंतर में
महर्षि वशिष्ठ के सातों पुत्र
4: चतुर्थ तामस मन्वंतर में
ज्योतिर्धामा
पृथु
काव्य
चैत्र
अग्नि
वनक
और पीवर
5: पंचम रैवत मन्वंतर में
हिरण निरुमा वेद श्री उधर बाहु वेद बाहु सुदामा भजन और महामुनी
6: षष्ठ चाक्षुष मन्वंतर में
सुमेधा
बिरजा
हविष्मान
उत्तम
मधु
अति नामा
और सहिष्णु
वर्तमान.......✍
7: सप्तम वैवस्वत मन्वंतर में
कश्यप
अत्रि
वशिष्ठ
विश्वामित्र
गौतम
जमदग्नि
भारद्वाज
8:अष्टम सावर्णिक मन्वंतर में
गालव
दीप्तिमान
राम
अश्वथामा
कृप
व्यास
9: नवम दक्षसावर्णी मन्वंतर में
मेधातिथि
बसु
सत्य
ज्योतिष्मान
द्युतिमान
सवन
भव्य
10: दशम ब्रह्मासावर्णि मन्वंतर में
तपोमूर्ति
हविष्मान
सुकृत
सत्य
नाभाग
अप्रतिमौझा
सत्यकेतु ।
11: एकादश धर्मसावर्णी मन्वंतर में
वपुष्मान
घृणि
आरुणि
निःस्वर
हविष्मान
अनघ
अग्नितेजा
12: द्वादश रूद्र सावर्णी मन्वंतर में
तपोद्युती
तपस्वी
सुतपा
तपोमूर्ति
तपोधन
तपोरति
तपोधृति
13: त्रयोदश देव सावर्णी मन्वंतर में
धृतिमान
अव्यय
तत्वदर्शी
निरुत्सुक
निर्मोह
सुतपा
निष्प्रकम्प
14: चतुर्दश इन्द्रसावर्णी मन्वंतर में
अग्निध्र
अग्निबाहु
शुची
युक्त
मागध
शुक्र
जित
इस प्रकार 14 मन्वंतरों में सप्तऋषियों का परिगणन पृथक पृथक नाम रूप से हुआ है
इन ऋषियों की अपार महिमा है यह सभी तपोधन है।
स्रोत कल्याण
गीताप्रेस सौजन्य अचलाएसगुलेरिया
।हिन्दी शायरी दिल से
ओम नमः शिवाय
"स्वार्थ "की रफ्तार भले ही तेज हो "किन्तु"
मंजिल तक" निःस्वार्थ "ही पहुँचता है..!!
इसलिये अपनो के बीच निःस्वार्थ रहने का प्रयास करे..
Goodmorning # सुप्रभात
“ हंसना ,मुस्कुराना ,खुश रहना, ये सब अभ्यास की चीजें हैं,
लगातार करते रहना चाहिए..,
अगर एक बार इन्हें भूल गए तो दोबारा याद करने में बहुत प्रयास लगते हैं..!”
हिन्दी शायरी दिल से
Good morning # सुप्रभात
*ज़िन्दगी की राहों में*
*ऐसा अक्सर होता है....*
*फैसला जो मुश्किल हो*
*वही बेहतर होता है...!!*
🌹💐 *Jai Shree Krishna*💐🌹
हिन्दी शायरी दिल से
Goodmorning
🌹 सुप्रभात 🌹
बहुत फर्क होता है किसी को "जानने" और "समझने" में..
जानता वो है जो "पास" होता है।
और
समझता वो है जो "खास" होता है !!
हिन्दी शायरी दिल से
Good morning
हिन्दुत्व तो पूर्ण विज्ञान है
एक बार सनातनीय संस्कृति के पुरोधा *ब्रह्मनिष्ठ स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज* के पास एक स्वयं को *सेकुलर* समझने वाली महिला पत्रकार आई । यह महोदया हमेशा हिन्दुत्व की अन्य धर्मों की तुलना में ओछी आलोचना करती रहती थी ।
पत्रकार ने कुछ प्रश्नोत्तर की इच्छा जाहिर की । स्वामीजी ने हामी भर दी....
*पत्रकार*: इस्लाम धर्म का प्रवर्तक कौन है ?
*स्वामीजी* : पैगम्बर मोहम्मद
*पत्रकार* : ईसाई धर्म का ?
*स्वामीजी* : ईसा मसीह
*पत्रकार* : हिन्दू धर्म का ?
*स्वामीजी* : मौन रहे...
*स्वामीजी के उत्तर न देने के बाद कहने लगी कि जिस धर्म का कोई प्रवर्तक ही न हो , वो कैसा धर्म ! यह कोई धर्म है ही नहीं...*
तब स्वामीजी बोले : आप सही कह रही है । हिन्दू धर्म है ही नहीं... *हिन्दुत्व तो विज्ञान है*
पत्रकार इस बात को समझी नहीं । उसने कुछ और प्रश्न करने चाहे...
*पत्रकार* : रसायनशास्त्र का आविष्कारक कौन ?
*स्वामीजी* : कोई एक व्यक्ति नहीं ।
*पत्रकार* : भौतिकशास्त्र का ?
*स्वामीजी* : कोई एक व्यक्ति नहीं ।
*पत्रकार* : शल्य चिकित्साशास्त्र का ?
*स्वामीजी* : उसका भी कोई एक व्यक्ति नहीं... समय समय पर अनेक वैज्ञानिकों द्वारा ये शास्त्र स्थापित होते रहे हैं ।
हिन्दू धर्म तो एक विज्ञान है , पूरे विश्व में अनेकानेक साधु-संतों ने तपस्या करके ज्ञान अर्जित किया और फिर प्रसारित किया । इस्लाम धर्म में एक ग्रंथ है : कुरान । उसी तरह ईसाई धर्म में है : बाइबल । लेकिन *हिन्दुत्व के विज्ञान हेतु समय समय पर इतने प्रामाणिक ग्रंथ लिखे गए हैं कि पूरा पुस्तकालय बन जाय । इन ग्रंथों के प्रमाण अकाट्य है और कोई भी एक ग्रंथ दूसरे ग्रंथ में लिखी बात को काटता नहीं है ।*
*🔥यही तो विज्ञान है ।🔥*
ओशो नमन
हिन्दी शायरी दिल से
Universal Truth # सत्य बचन
अक्सर वही लोग उठाते हैं सूरज पर उंगलियां……!
एक जुगनू तक को छूने की जिन की औकात नहीं होती….!!
सत्य बचन
ये ज़िन्दगी का रंगमंच है दोस्तो!!
हर किसी को नाटक करना पड़ता है।
माचिस की ज़रूरत नहीं पड़ती,
यहाँ आदमी आदमी से जलता है।।
हिन्दी शायरी दिल से
emotional shayari #love shayari
अगर तुम न होते तो ग़ज़ल कौन कहता!
इस चेहरे को कमल कौन कहता!
यह तो करिश्मा है मोहब्बत का!
वरना पत्थर को ताज महल कौन कहता। ।
inspirational thoughts # inspirational quotes
लफ़्ज़ों के इस्तेमाल में,
कुछ.. बदलाव करके देख।।
तू देख कर न मुस्कुरा!!
बस.... मुस्कुरा के देख ।।
हिन्दी शायरी दिल से
hare krishna # Geeta # हरे कृष्ण
⚘परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।⚘
⚘धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।⚘
अर्थात साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग युग में प्रकट हुआ करता हूं।।
⚘धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।⚘
अर्थात साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग युग में प्रकट हुआ करता हूं।।
🙏 "उद्धव-गीता" 🙏
उद्धव बचपन से ही सारथी के रूप में श्रीकृष्ण की सेवा में रहे, किन्तु उन्होंने श्री कृष्ण से कभी न तो कोई इच्छा जताई और न ही कोई वरदान माँगा।
जब कृष्ण अपने *अवतार काल* को पूर्ण कर *गौलोक* जाने को तत्पर हुए, तब उन्होंने उद्धव को अपने पास बुलाया और कहा-
"प्रिय उद्धव मेरे इस 'अवतार काल' में अनेक लोगों ने मुझसे वरदान प्राप्त किए, किन्तु तुमने कभी कुछ नहीं माँगा! अब कुछ माँगो, मैं तुम्हें देना चाहता हूँ।
तुम्हारा भला करके, मुझे भी संतुष्टि होगी।
उद्धव ने इसके बाद भी स्वयं के लिए कुछ नहीं माँगा। वे तो केवल उन शंकाओं का समाधान चाहते थे जो उनके मन में कृष्ण की शिक्षाओं, और उनके कृतित्व को, देखकर उठ रही थीं।
उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा-
"भगवन महाभारत के घटनाक्रम में अनेक बातें मैं नहीं समझ पाया!
आपके 'उपदेश' अलग रहे, जबकि 'व्यक्तिगत जीवन' कुछ अलग तरह का दिखता रहा!
क्या आप मुझे इसका कारण समझाकर मेरी ज्ञान पिपासा को शांत करेंगे?"
श्री कृष्ण बोले-
“उद्धव मैंने कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अर्जुन से जो कुछ कहा, वह *"भगवद्गीता"* थी।
आज जो कुछ तुम जानना चाहते हो और उसका मैं जो तुम्हें उत्तर दूँगा, वह *"उद्धव-गीता"* के रूप में जानी जाएगी।
इसी कारण मैंने तुम्हें यह अवसर दिया है।
तुम बेझिझक पूछो।
उद्धव ने पूछना शुरू किया-
"हे कृष्ण, सबसे पहले मुझे यह बताओ कि सच्चा मित्र कौन होता है?"
कृष्ण ने कहा- "सच्चा मित्र वह है जो जरूरत पड़ने पर मित्र की बिना माँगे, मदद करे।"
उद्धव-
"कृष्ण, आप पांडवों के आत्मीय प्रिय मित्र थे। आजाद बांधव के रूप में उन्होंने सदा आप पर पूरा भरोसा किया।
कृष्ण, आप महान ज्ञानी हैं। आप भूत, वर्तमान व भविष्य के ज्ञाता हैं।
किन्तु आपने सच्चे मित्र की जो परिभाषा दी है, क्या आपको नहीं लगता कि आपने उस परिभाषा के अनुसार कार्य नहीं किया?
आपने धर्मराज युधिष्ठिर को द्यूत (जुआ) खेलने से रोका क्यों नहीं?
चलो ठीक है कि आपने उन्हें नहीं रोका, लेकिन आपने भाग्य को भी धर्मराज के पक्ष में भी नहीं मोड़ा!
आप चाहते तो युधिष्ठिर जीत सकते थे!
आप कम से कम उन्हें धन, राज्य और यहाँ तक कि खुद को हारने के बाद तो रोक सकते थे!
उसके बाद जब उन्होंने अपने भाईयों को दाँव पर लगाना शुरू किया, तब तो आप सभाकक्ष में पहुँच सकते थे! आपने वह भी नहीं किया? उसके बाद जब दुर्योधन ने पांडवों को सदैव अच्छी किस्मत वाला बताते हुए द्रौपदी को दाँव पर लगाने को प्रेरित किया, और जीतने पर हारा हुआ सब कुछ वापस कर देने का लालच दिया, कम से कम तब तो आप हस्तक्षेप कर ही सकते थे!
अपनी दिव्य शक्ति के द्वारा आप पांसे धर्मराज के अनुकूल कर सकते थे!
इसके स्थान पर आपने तब हस्तक्षेप किया, जब द्रौपदी लगभग अपना शील खो रही थी, तब आपने उसे वस्त्र देकर द्रौपदी के शील को बचाने का दावा किया!
लेकिन आप यह यह दावा भी कैसे कर सकते हैं?
उसे एक आदमी घसीटकर हॉल में लाता है, और इतने सारे लोगों के सामने निर्वस्त्र करने के लिए छोड़ देता है!
एक महिला का शील क्या बचा? आपने क्या बचाया?
अगर आपने संकट के समय में अपनों की मदद नहीं की तो आपको आपाद-बांधव कैसे कहा जा सकता है?
बताईए, आपने संकट के समय में मदद नहीं की तो क्या फायदा?
क्या यही धर्म है?"
इन प्रश्नों को पूछते-पूछते उद्धव का गला रुँध गया और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
ये अकेले उद्धव के प्रश्न नहीं हैं। महाभारत पढ़ते समय हर एक के मनोमस्तिष्क में ये सवाल उठते हैं!
उद्धव ने हम लोगों की ओर से ही श्रीकृष्ण से उक्त प्रश्न किए।
भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए बोले-
"प्रिय उद्धव, यह सृष्टि का नियम है कि विवेकवान ही जीतता है।
उस समय दुर्योधन के पास विवेक था, धर्मराज के पास नहीं।
यही कारण रहा कि धर्मराज पराजित हुए।"
उद्धव को हैरान परेशान देखकर कृष्ण आगे बोले- "दुर्योधन के पास जुआ खेलने के लिए पैसाऔर धन तो बहुत था, लेकिन उसे पासों का खेल खेलना नहीं आता था, इसलिए उसने अपने मामा शकुनि का द्यूतक्रीड़ा के लिए उपयोग किया। यही विवेक है। धर्मराज भी इसी प्रकार सोच सकते थे और अपने चचेरे भाई से पेशकश कर सकते थे कि उनकी तरफ से मैं खेलूँगा।
जरा विचार करो कि अगर शकुनी और मैं खेलते तो कौन जीतता?
पाँसे के अंक उसके अनुसार आते या मेरे अनुसार?
चलो इस बात को जाने दो। उन्होंने मुझे खेल में शामिल नहीं किया, इस बात के लिए उन्हें माफ़ किया जा सकता है। लेकिन उन्होंने विवेक-शून्यता से एक और बड़ी गलती की!
और वह यह-
उन्होंने मुझसे प्रार्थना की कि मैं तब तक सभा-कक्ष में न आऊँ, जब तक कि मुझे बुलाया न जाए!
क्योंकि वे अपने दुर्भाग्य से खेल मुझसे छुपकर खेलना चाहते थे।
वे नहीं चाहते थे, मुझे मालूम पड़े कि वे जुआ खेल रहे हैं!
इस प्रकार उन्होंने मुझे अपनी प्रार्थना से बाँध दिया! मुझे सभा-कक्ष में आने की अनुमति नहीं थी!
इसके बाद भी मैं कक्ष के बाहर इंतज़ार कर रहा था कि कब कोई मुझे बुलाता है! भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव सब मुझे भूल गए! बस अपने भाग्य और दुर्योधन को कोसते रहे!
अपने भाई के आदेश पर जब दुस्साशन द्रौपदी को बाल पकड़कर घसीटता हुआ सभा-कक्ष में लाया, द्रौपदी अपनी सामर्थ्य के अनुसार जूझती रही!
तब भी उसने मुझे नहीं पुकारा!
उसकी बुद्धि तब जागृत हुई, जब दुस्साशन ने उसे निर्वस्त्र करना प्रारंभ किया!
जब उसने स्वयं पर निर्भरता छोड़कर-
*'हरि, हरि, अभयम कृष्णा, अभयम'*-
की गुहार लगाई, तब मुझे उसके शील की रक्षा का अवसर मिला।
जैसे ही मुझे पुकारा गया, मैं अविलम्ब पहुँच गया।
अब इस स्थिति में मेरी गलती बताओ?"
उद्धव बोले-
"कान्हा आपका स्पष्टीकरण प्रभावशाली अवश्य है, किन्तु मुझे पूर्ण संतुष्टि नहीं हुई!
क्या मैं एक और प्रश्न पूछ सकता हूँ?"
कृष्ण की अनुमति से उद्धव ने पूछा-
"इसका अर्थ यह हुआ कि आप तभी आओगे, जब आपको बुलाया जाएगा? क्या संकट से घिरे अपने भक्त की मदद करने आप स्वतः नहीं आओगे?"
कृष्ण मुस्कुराए-
"उद्धव इस सृष्टि में हरेक का जीवन उसके स्वयं के कर्मफल के आधार पर संचालित होता है।
न तो मैं इसे चलाता हूँ, और न ही इसमें कोई हस्तक्षेप करता हूँ।
मैं केवल एक 'साक्षी' हूँ।
मैं सदैव तुम्हारे नजदीक रहकर जो हो रहा है उसे देखता हूँ।
यही ईश्वर का धर्म है।"
"वाह-वाह, बहुत अच्छा कृष्ण!
तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप हमारे नजदीक खड़े रहकर हमारे सभी दुष्कर्मों का निरीक्षण करते रहेंगे?
हम पाप पर पाप करते रहेंगे, और आप हमें साक्षी बनकर देखते रहेंगे?
आप क्या चाहते हैं कि हम भूल करते रहें? पाप की गठरी बाँधते रहें और उसका फल भुगतते रहें?"
उलाहना देते हुए उद्धव ने पूछा!
तब कृष्ण बोले-
"उद्धव, तुम शब्दों के गहरे अर्थ को समझो।
जब तुम समझकर अनुभव कर लोगे कि मैं तुम्हारे नजदीक साक्षी के रूप में हर पल हूँ, तो क्या तुम कुछ भी गलत या बुरा कर सकोगे?
तुम निश्चित रूप से कुछ भी बुरा नहीं कर सकोगे।
जब तुम यह भूल जाते हो और यह समझने लगते हो कि मुझसे छुपकर कुछ भी कर सकते हो, तब ही तुम मुसीबत में फँसते हो! धर्मराज का अज्ञान यह था कि उसने माना कि वह मेरी जानकारी के बिना जुआ खेल सकता है!
अगर उसने यह समझ लिया होता कि मैं प्रत्येक के साथ हर समय साक्षी रूप में उपस्थित हूँ तो क्या खेल का रूप कुछ और नहीं होता?"
भक्ति से अभिभूत उद्धव मंत्रमुग्ध हो गये और बोले-
प्रभु कितना गहरा दर्शन है। कितना महान सत्य। 'प्रार्थना' और 'पूजा-पाठ' से, ईश्वर को अपनी मदद के लिए बुलाना तो महज हमारी 'पर-भावना' है। मग़र जैसे ही हम यह विश्वास करना शुरू करते हैं कि 'ईश्वर' के बिना पत्ता भी नहीं हिलता! तब हमें साक्षी के रूप में उनकी उपस्थिति महसूस होने लगती है।
गड़बड़ तब होती है, जब हम इसे भूलकर दुनियादारी में डूब जाते हैं।
सम्पूर्ण श्रीमद् भागवद् गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इसी जीवन-दर्शन का ज्ञान दिया है।
सारथी का अर्थ है- मार्गदर्शक।
अर्जुन के लिए सारथी बने श्रीकृष्ण वस्तुतः उसके मार्गदर्शक थे।
वह स्वयं की सामर्थ्य से युद्ध नहीं कर पा रहा था, लेकिन जैसे ही अर्जुन को परम साक्षी के रूप में भगवान कृष्ण का एहसास वह ईश्वर की चेतना में विलय हो गया!
यह अनुभूति थी, शुद्ध, पवित्र, प्रेममय, आनंदित सुप्रीम चेतना की!
तत-त्वम-असि!
अर्थात...
वह तुम ही हो।।
attitude shayari
*सुर्ख आंखों में जब वह देखते हैं....*
*हम घबरा कर आंखें झुका लेते हैं....*
*क्यों मिलाएं उन आंखों से आंखें..*.
*सुना है वह आंखों से अपना बना लेते हैं*
हिन्दी शायरी दिल से
emotional shayari
खुद को बढ़ती उम्र के साथ स्वीकारना एक तनावमुक्त जीवन देता है।
हर उम्र एक अलग तरह की खूबसूरती लेकर आती है उसका आनंद लीजिये🙏
बाल रंगने है तो रंगिये,
वज़न कम रखना है तो रखिये,
मनचाहे कपड़े पहनने है तो पहनिए,
बच्चों की तरह खिलखिलाइये,
अच्छा सोचिये,
अच्छा माहौल रखिये,
शीशे में दिखते हुए अपने अस्तित्व को स्वीकारिये।
कोई भी क्रीम आपको गोरा नही बनाती,
कोई शैम्पू बाल झड़ने नही रोकता,
कोई तेल बाल नही उगाता,
कोई साबुन आपको बच्चों जैसी स्किन नही देता।
चाहे वो प्रॉक्टर गैम्बल हो या पतंजलि .....सब सामान बेचने के लिए झूठ बोलते हैं।
ये सब कुदरती होता है।
उम्र बढ़ने पर त्वचा से लेकर बॉलों तक मे बदलाव आता है।
पुरानी मशीन को Maintain करके बढ़िया चला तो सकते हैं, पर उसे नई नही कर सकते।
ना किसी टूथपेस्ट में नमक होता है ना किसी मे नीम।
किसी क्रीम में केसर नही होती, क्योंकि 2 ग्राम केसर भी 500 रुपए से कम की नही होती !
कोई बात नही अगर आपकी नाक मोटी है तो,
कोई बात नही आपकी आंखें छोटी हैं तो,
कोई बात नही अगर आप गोरे नही हैं
या आपके होंठों की shape perfect नही हैं....
फिर भी हम सुंदर हैं,
अपनी सुंदरता को पहचानिए।
दूसरों से कमेंट या वाह वाही लूटने के लिए सुंदर दिखने से ज्यादा ज़रूरी है, अपनी सुंदरता को महसूस करना।
हर बच्चा सुंदर इसलिये दिखता है कि वो छल कपट से परे मासूम होता है और बडे होने पर जब हम छल व कपट से जीवन जीने लगते है तो वो मासूमियत खो देते हैं
...और उस सुंदरता को पैसे खर्च करके खरीदने का प्रयास करते हैं।
मन की खूबसूरती पर ध्यान दो।
पेट निकल गया तो कोई बात नही उसके लिए शर्माना ज़रूरी नही।
आपका शरीर आपकी उम्र के साथ बदलता है तो वज़न भी उसी हिसाब से घटता बढ़ता है उसे समझिये।
सारा इंटरनेट और सोशल मीडिया तरह तरह के उपदेशों से भरा रहता है,
यह खाओ, वो मत खाओ
ठंडा खाओ, गर्म पीओ,
कपाल भाती करो,
सवेरे नीम्बू पीओ,
रात को दूध पीओ
ज़ोर से सांस लो, लंबी सांस लो
दाहिने से सोइये ,
बाहिने से उठिए,
हरी सब्जी खाओ,
दाल में प्रोटीन है,
दाल से क्रिएटिनिन बढ़ जायेगा।
अगर पूरे एक दिन सारे उपदेशों को पढ़ने लगें तो पता चलेगा
ये ज़िन्दगी बेकार है ना कुछ खाने को बचेगा ना कुछ जीने को !!
आप डिप्रेस्ड हो जायेंगे।
ये सारा ऑर्गेनिक, एलोवेरा, करेला, मेथी, पतंजलि में फंसकर दिमाग का दही हो जाता है।
स्वस्थ होना तो दूर स्ट्रेस हो जाता है।
अरे! अपन मरने के लिये जन्म लेते हैं,
कभी ना कभी तो मरना है अभी तक बाज़ार में अमृत बिकना शुरू नही हुआ।
हर चीज़ सही मात्रा में खाइये,
हर वो चीज़ थोड़ी थोड़ी जो आपको अच्छी लगती है।
*भोजन का संबंध मन से होता है*
*और मन अच्छे भोजन से ही खुश रहता है।*
*मन को मारकर खुश नही रहा जा सकता।*
थोड़ा बहुत शारीरिक कार्य करते रहिए,
टहलने जाइये,
लाइट कसरत करिये,
व्यस्त रहिये,
खुश रहिये,
शरीर से ज्यादा मन को सुंदर रखिये
कभी राहे - मोहब्बत में कुछ ऐसे मोड़ आते हैं ।
हिन्दी शायरी दिल से
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कौन समझेगा यहां की वीरानी देख के... इस जगह भी ठहरे थे कभी काफ़िले मोहब्बत के...... Shayaripub.in पूछा जो उसने कैसे रहोगे ताउम्र तुम मेरे सा...
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वो हमारे दिल से निकलने का रास्ता भी नहीं ढूंढ सके जो कहते थे.. तुम्हारी रग रग से वाकिफ हैं हम.. Shayaripub.in